Sunday, April 10, 2011

निषिद्ध जीवन की हकीकत और फसाना


बात वेश्यावृत्ति की हो या सेक्स वर्करों की, यह हमारे समाज के लिए नया नहीं है। हां, सेक्स वर्कर, गणिकाओं या वेश्याओं का समय के साथ परिवर्तित नाम जरूर है। वेश्यावृत्ति कदाचित मानव इतिहास के सबसे पहले व्यापारों में से एक है। अन्य व्यापारों की तरह ही वेश्यावृत्ति की उत्पत्ति का कारण मनुष्य की आवश्यकता नहीं बल्कि विलासिता रही है। पुरुषों के लिए वेश्यालय आज भी हैं तथा कुछ देशों की सरकारों ने वेश्यावृत्ति को कुछ शर्तो के साथ कानूनी पाबंदियों से मुक्त कर दिया है। यह कानूनी मान्यता पाने और उसे बनाए रखने के लिए इनके ठेकेदारों ने नियमों को स्वीकार भी किया है लेकिन आज भी बहुत से देश और समाज ऐसे हैं जो इसे गंदगी या एक अभिशाप के रूप में ही देखते हैं जिनमें भारत एवं भारतीय समाज भी शामिल है। हालांकि विभिन्न आंकड़ों तथा वास्तविकता देखें तो इस बात का सहज आभास हो जाता है कि वेश्यावृत्ति पर प्रतिबंध के बावजूद व्यावहारिक रूप में इसे कभी भी रोका नहीं जा सका तथा इनकी संख्या एवं क्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी होती रही। 8 मार्च 2009 को महिला दिवस के अवसर पर ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मुद्दे पर आयोजित एक सम्मेलन में पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी का कहना था कि भारत में वेशयाओं को लाइसेंस देने और सेक्स वर्करों को वैधता देने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। इसके पीछे उनके इस तर्क को नजरअंदाज करना मुश्किल जान पड़ता है कि क्या कोई सेक्स वर्कर अपनी बेटी को स्वेच्छा से इस व्यवसाय में भेजना चाहेगी? बहरहाल, भारतीय महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि वेश्यावृत्ति जैसी समस्या के समाधान के लिए कई कदम उठाने बाकी हैं तथा इस सदियांे पुरानी समस्या को एक दम से खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक सुनियोजित एवं ठोस योजना तैयार करनी होगी तथा सही ढंग से उसका कार्यान्वयन भी करना होगा। इसके लिए पुरुषों को अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा जिसके लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर उनको जागरूक बनाना होगा।वेश्यावृत्ति की एक नई समस्या पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों के विस्तार से उत्पन्न हो गई है। इन वेबसाइटों ने सबसे अधिक नुकसान युवा पीढ़ी तथा बच्चों का किया है। इनके कारण मानसिक रूप से बीमार तथा कुंठाग्रस्त लोगों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। इसमें आग में घी डालने का काम एडल्ट लाइव चैट करता है। तबलों की थाप व घुंघरुओं की झंकार में अब भी दम तोड़ रही है सैकड़ों स्त्रियों की मासूमियत। सूर्योदय से सूर्यास्त तक दरिंदगी के शिकंजों में जकड़ी रेडलाइट के सेक्स वर्करों को मुक्ति कब मिलेगी? इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो। मुजरा तथा नृत्य-संगीत के आड़ में लम्बे समय से विभिन्न शहरों के रेड लाइट इलाकों में देह व्यापार का धंधा बेरोक-टोक चल रहा है। अब तो यह धंधा मसाज पार्लर, एस्कॉर्ट सेवा एवं साइबर कैफे में चल रही वेश्यावृत्ति के रूप में भी अपना पांव पसार चुका है। ऐसा भी नहीं कि इस कुकृत्य की जानकारी आला अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं को नहीं है। रेड लाइट एरिया के निवासियों का ही कहना है कि कई बार तो उनके लिए काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों के द्वारा ही लड़कियों की मांग की जाती है। कठोर यातनाओं का सामना कर रही लड़कियां एक मददगार के इंतजार में समय गुजारने को विवश हैं। इनकी मुक्ति की उम्मीदें रेत की मीनार तब साबित होती हैं, जब दलालों को मोटी रकम देकर लड़कियों को खरीदने वाले धंधेबाजों का गुस्सा इन पर कहर ढाने लगता है। समाज में अकेले पड़ जाने का भय इन्हें चुप रहने पर विवश करता है। इन महिलाओं में इतना भी आत्मबल नहीं होता कि वे अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपनी इच्छानुसार कर सकें। चाहे यह इच्छा उनके स्वास्थ्य लाभ से संबंधित ही क्यों न हो। वेश्यालयों में रहने वाली महिलाएं अपनी मर्जी से डॉक्टर के पास जाकर अपना इलाज तक नहीं करवा सकती हैं। अगर किसी तरह डॉक्टर के पास चली भी गई तो अपने साथ होने वाला भेद-भाव उन्हें मानसिक तथा शारीरिक रूप से अधिक बोझिल बना देता है।

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