क्या डिप्रेशन एक बीमारी है, जिसे चंद दवाओं और परामर्श के जरिये ठीक किया जा सकता है, या डिप्रेशन एक सामाजिक समस्या है जो सामाजिकता के ध्वस्तीकरण का द्योतक है। जिंदगी की आपाधापी और मेडिकल साइंस के अत्याधुनिक युग में हमारे सामने ये दो यक्ष प्रश्न हैं। यह कह देना कि नोएडा की लड़कियां डिप्रेशन की शिकार रहीं और इसी के चलते उनमें एक की मौत हुई और दूसरी उस दशा में जा पहुंची, शायद गलत होगा। सच कहूं तो कभी-कभी मुझे लगता है कि डिप्रेशन का सरलीकरण हो गया है। वास्तव में यह काफी जटिल मुद्दा है। इस पर मनोचिकित्सकों को भी एक राय बनाने की जरूरत है। इसके अलावा समाज को भी इस समस्या पर प्रतिक्रिया देनी होगी।
दोष नव उदारवाद के सिद्धांत का भी
बहरहाल, जहां तक विषय का प्रश्न है, मौजूदा वक्त में डिप्रेशन की शुरुआत तनाव से होती है। तनाव के कारणों पर र्चचा की जाए तो महत्वाकांक्षा, प्रतियोगिता, नौकरी की चिंता इनमें पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर प्रेम, धोखा, तलाक को लिया जा सकता है। तीसरे स्थान पर सामाजिक कटाव, रिश्तेदारों से अनबन आदि है। इसके अलावा उम्र का पड़ाव भी बेहद अहम मुद्दा है। मसलन, यदि कोई शख्स खुद के अपने जिन्हें वह बहुत स्नेह करता है, से दूर हो जाए तो वह मौत के मुंह में जा सकता है। तनाव की शुरुआत पारिवारिक झगड़े, आर्थिक तंगी, महंगाई और नाकामियों से भी होती है। बहरहाल इससे डिप्रेशन होता है और इसके कायम रहने से भविष्य में नकारात्मक विचार प्रबल हो जाते हैं। इसके बाद या तो वह शख्स आत्महत्या कर लेता है या धीरे-धीरे खुद को एक मानसिक कवच के अंदर बंद कर लेता है। इस मानसिक कवच के अंदर सिर्फ वह मनमर्जी ही करता है। बाहरी दखल न तो उसे रास आती है और न ही उसे प्रेरित करती है। कभी इस दौरान मरीज की सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होने लगती है तो कभी भावनात्मक लगाव घटने लगता है। ये दोनों एक साथ भी मुमकिन है। यह काफी हद तक व्यक्तिगत होता है और इसे मरीज खुद भी बयान नहीं कर पाता है। हालांकि डिप्रेशन व्यक्तिगत समस्या होते हुए भी सामाजिक कारकों के चलते होता है। इसमें आधुनिक जीवन शैली और धन का नव उदारवाद सिद्धांत दोषी है।
पड़ोसी से दोस्ताने का व्यवहार
दरअसल, आधुनिक जीवन शैली ने हमसे अपने पड़ोसी से दोस्ताने व्यवहार के प्राचीन मॉडल को छीन लिया है। एक दौर रहा, कम से कम उदारवाद से पहले तक, पड़ोसी अमूमन हर पर्व-त्योहार पर पकवान एक दूसरे से बांटते थे, एक घर के बच्चों की देखरेख दूसरे घर के बुजुर्ग और वयस्क करते थे। सुख-दु:ख में एक दूसरे से मिलना होता था लेकिन पैसा कमाने की अंधाधुंध ललक में एक दूसरे के लिए अब वक्त ही नहीं रह गया है। यहां तक कि शहरी समाज की यह समस्या फ्लैट और अपॉर्टमेंट्स कल्चर में भी शामिल हो गई है जबकि फ्लैट और अपॉर्टमेंट्स की नींव इसलिए रखी गई ताकि अलग-अलग संस्कृति, सोच और धर्म-जाति के लोग आपस में घुल मिलकर सुखदु: ख साझा करें। बहरहाल अवसाद का असर बुजुर्ग लोगों पर व्यापक तौर पर पड़ा है। पढ़ाई, नौकरी या बंटवारे की वजह से बच्चे माता-पिता से अलग रहने लगे हैं। इससे बुजुर्ग माता-पिता खुद को तन्हा महसूस करने लगते हैं और अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। अवसाद की वजह से वे लापरवाह जीवन जीते हैं और असमय काल के गाल में समा जाते हैं। सवाल यह कि इस सामाजिक समस्या-बीमारी से कैसे निजात पाई जाए? क्या संयुक्त परिवार के बढ़ावे से यह मुमकिन हो पाएगा; बेशक, पर हमें अपने अंदर सामाजिकता को लाना होगा। सामाजिक कायरे में दिलचस्पी दिखानी होगी। आपसी मेलजोल को तवज्जो देना होगा। संयुक्त परिवार पद्धति लागू नहीं होने पर भी तन्हाई को दूर रखने के लिए अपने शौक को विकसित करना चाहिए। यानी दिल को तन्हा छोड़ने से बेहतर है कि दिल किसी काम में लगाएं।
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