Wednesday, April 20, 2011

बेइज्जत करने की मुनादी


सुनो-सुनो-सुनो बिंदेश्वरी प्रसाद, पिता शंकर दयाल शाह, सकीन पाइप लाइन, सिपरा, थाना बीड़, सेशन कोर्ट ट्रायल नंबर 1248/2003 घोषित अपराधी हैं। यदि वह एक हफ्ते के अंदर अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करता है तो उसकी अचल संपत्ति की कुर्की की जाएगी। घोषित अपराधियों को सार्वजनिक तौर पर बेइज्जत करने वाला यह नजारा तेज गति से बदलाव की ओर बढ़ रहे बिहार का है। विडबंना यह है कि राज्य की राजधानी पटना की पुलिस न्याय के ऐसे पुराने मध्ययुगीन तरीकों का इस्तेमाल शहर की बाहरी बस्तियों में कर रही है। यहां की पुलिस घोषित अपराधियों को अदालत में पेश होने का दबाव बनाने के लिए उनके इलाके में जाकर डुगडुगी बजाती है और फिर अपराधियों के नाम जोर से पढ़ती है ताकि हरेक को पता चल जाए कि यह घोषित अपराधी होने के बावजूद अदालत में नहीं पेश हो रहा। अगर यह इस बार हाजिर नहीं हुआ तो अदालत उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लेगी। पटना पुलिस का दावा है कि उसने इस कठोर तरीके से एक सौ से ज्यादा अपराधियों को शर्मसार कर आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया और उसकी सूची में करीब 3000 ऐसे घोषित अपराधियों के नाम हैं, जिन्हें अदालत में समर्पण करना है। वहां के आला पुलिस अधिकारी का मानना है कि इससे परिवार व समाज घोषित अपराधी पर दबाव बनाता है और ऐसे दबाव का मनोवैज्ञानिक असर यह पड़ता है कि अपराधी के सामने अदालत में जाकर आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। अगर वह अदालत में एक विशेष समय के अंदर हाजिर नहीं होता तो अदालत अपने कब्जे में ली गई उसकी अचल संपत्ति की कुर्की कर देती है। हालांकि पुलिस को इस बात की परवाह नहीं है कि उसके इस तरह व्यवहार करने से घोषित अपराधियों के बच्चों व रिश्तेदार खुद को सरेआम कितना बेइज्जत महसूस करते हैं। कई अपराधियों के रिश्तेदारों ने अपनाए जाने वाले इस कर्कश तरीके पर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई है और उनका कहना है कि अपराधी को अभी दोषी भी करार नहीं दिया गया है। इस कारण सरेआम बेइज्जत करने वाले इस तरह के मध्ययुगीन तरीकों का इस्तेमाल आज के युग में एक सदमे से कम नहीं है। आधुनिक जेलों की व्यवस्था से पहले अपराधियों को अक्सर आम जनता के हमलों और उपहास को सहना पड़ता था। उस समय गधे पर बिठाकर गांवों में उसे कई चक्कर लगाने के लिए विवश करना, भीड़ में उसका मुंह काला करना आदि तरीके प्रयोग में लाए जाते थे। इसी तरह अपराधी को लकड़ी के ढांचे में बुरी तरह जकड़कर रखा जाता था और भीड़ उस पर कूड़ा फेंकती थी। वर्ष 1800 से पहले अपराधियों को सजा देने वाले इस तरह के अप्रिय तरीके दुनिया के एक बहुत बडे़ हिस्से में प्रचलित थे, लेकिन आज भी यह सब कभी-कभी हमें देखने-सुनने को मिल जाते हैं। करीब डेढ़ साल पहले मध्य प्रदेश सरकार के नरसिंहपुर जिला प्रशासन ने अपने इलाके में गरीब व अति गरीब परिवारों को मिलने वाले नीले व पीले राशन कार्डो की सूची में घुसपैठ कर चुके फर्जी लोगों को बाहर करने के लिए जो तरीका अपनाया था, उसके सामाजिक आयाम को लेकर सरकार की काफी आलोचना हुई थी। जिला प्रशासन ने केरैना व तेंदुखेड़ा नामक गांवों में बीपीएल राशन कार्ड धारकों के बाहर मुख्य दीवार पर नीले रंग में मोटे अक्षरों में लिखा कि यह परिवार गरीब है और अंत्योदय अन्न योजना के तहत लाभ उठाने वाले राशन कार्ड धारक की दीवार के बाहर लिखा कि यह परिवार अति गरीब है। इसके पीछे स्थानीय प्रशासन की दलील थी कि इस तरह के वाक्य लिखने और कलर कोडिंग का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गरीब तबके के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ वही तबका उठा सके और अमीर लोग सार्वजनिक तौर पर अपने ऊपर लगे गरीबी के इस दाग से शर्मिदा महसूस करें। ऐसा करने से संभवत: वह ऐसे सरकारी संसाधनों पर जो उनके लिए नहीं हैं, पर अपना कब्जा खत्म कर दें। गौरतलब है कि बीपीएल व अंत्योदय राशन कार्ड धारकों की सूची में धांधलेबाजी के चलते असल में जो गरीब और अति गरीब हैं, वे लोग सस्ता अनाज, चीनी, मिट्टी का तेल आदि सुविधाएं लेने से वंचित हैं। यद्यपि ऐसी सरकारी योजनाओं के दायरे में वही लोग आते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार व सरकारी नियमों की अनदेखी का खामियाजा गरीब परिवार ही चुकाते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने गरीबों का हितैषी बनने व सरकारी नीतियों को लागू करवाने के लिए जो तरीका अपनाया, उसके सामाजिक व मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों के बावत सोचा तक नहीं गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसी योजनाओं का लाभ उठाने वालों दलित ज्यादा हैं। ऐसी योजनाओं के पीछे लक्ष्य सामाजिक विकास व आर्थिक विकास में पिछड़े लोगों की मदद करना होता है ताकि वह हमेशा के लिए पीछे न छूट जाएं। इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि किस तरह पहले ऊंची जाति व अमीर तबके ने दलित, निचली जाति के लोगों को गांव से बाहर अपनी बस्तियां बनाने के लिए मजबूर किया और इस 21वीं सदी में उनके घरों की दीवारों के बाहर लिखकर अपमानित किया गया। निम्न और कमजोर जाति के बच्चों व किशोर पीढ़ी के मन पर क्या गुजरी होगी, इसका अहसास सरकारी आला अधिकारियों को नहीं होता। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुर गांव में बाल्मीकि जाति में जन्मी डॉ. सुशीला टाकभौरे ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-कॉलेज में वजीफा आने पर हमें सूचना दी जाती थी। तब दफ्तर में जाकर वजीफा की रकम लेते समय अपनी जाति का बोध होता था। मुझे इस बात का संकोच होता था कि सब मुझे देख रहे हैं, मेरी जाति को समझ रहे हैं। बिहार व मध्य प्रदेश की इन घटनाओं के संदर्भ में सवाल खड़े होते हैं कि पुलिस व जिला प्रशासन ने सरेआम अपमानित करने वाले ऐसे तरीकों को क्यों अपनाया? नरसिंहपुरा जिला प्रशासन को सूची से खोटे लोगों को बाहर करने के लिए दूसरा कोई कारगर तरीका निकालना चाहिए था। प्रशासन पहले तो नीतियों को लागू कराने में पारदर्शिता नहीं बरतता और न ही नियमों को सख्ती से लागू कराने की दिशा में अपना दायित्व निभाता है। पहचान के काम को कठिन व पेचीदा करार देकर अपनी जवाबदेही से भागता है। फिर आनन-फानन में निंदनीय तरीकों को इस्तेमाल करने से पहले सोचता तक नहीं। पटना में घोषित अपराधियों को अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने से पहले ही इस तरह बेइज्जत करने का यह सरकारी कदम बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करता है। उनकी गरिमा पर इस तरह का प्रहार क्यों? आज के आधुनिक युग व प्रगतिशील समाज में इस तरह सरेआम निरादर करने की कोई जगह नहीं है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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