Monday, April 18, 2011

महानगरीय जीवन की त्रासदी


राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के एक बेहद पॉश इलाके की बहुमंजिला इमारत के एक फ्लैट में सात महीने से दो बहनें गुमनाम जिंदगी जी रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत अवसाद और असुरक्षा बोध की वजह से दोनों बहनें अनुराधा और सोनाली ने खुद को अपने फ्लैट में कैद कर लिया था। पिछले सात महीनों से दोनों बहनें न तो घर से बाहर निकल रही थीं और न ही बाहर की दुनिया से या फिर अपने नाते रिश्तेदारों से कोई संपर्क रख रही थीं। यह भी बेहद हैरान करने वाला और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि चंद फीट के फासले पर मौजूद दूसरे फ्लैट में रह रहे परिवारों से भी उन लोगों का किसी तरह का कोई नहीं संबंध था। सात महीने बाद जब मीडिया में खबर प्रकाशित होने के बाद पुलिस की मौजूदगी में एक गैर सरकारी संगठन की मदद से फ्लैट को दोनों बहनों के विरोध के बावजूद ताला तोड़ कर खोला गया तो अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था। फ्लैट में भयानक बदबू के बीच जिंदगी जी रही दोनों बहनों की हालत बेहद खराब हो चुकी थी। पूरे फ्लैट में खाने-पीने का कोई सामान मौजूद नहीं था। जाने कब से दोनों बहनों ने खाना भी नहीं खाया था। महीनों की तन्हाई और कुछ नहीं खाने-पीने की वजह से एक बहन तो नर कंकाल में तब्दील हो चुकी थी और दूसरी चलने-फिरने लायक तो थी, लेकिन अस्पताल पहुंचते ही उसकी हालत भी खराब हो गई। बड़ी बहन तो खुलेपन में चौबीस घंटे भी जिंदा नहीं रह सकी, जबकि दूसरी भी सदमे में और तमाम बीमारियों की वजह से अस्पताल में वेंटिलेटर पर पड़े-पड़े मौत और जिंदगी के बीच झूल रही है। नोएडा की इन बहनों की यह काहनी बेहद डरावनी लगती है, लेकिन उससे भी भयावह है समाज का और हमारा आपका संवेदनशून्य हो जाना। आपके पड़ोस में दो अकेली लड़की रहती है, उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है, भाई व्यक्तिगत कारणों से घर छोड़कर जा चुका होता है और दोनों की नौकरी चली जाती है। आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का बोध इतना गहरा हो जाता है कि वह खुद को अपने घर में कैद कर लेती हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी आस-पड़ोस के लोग दोनों बहनों की हालात से बेखबर रहते हैं और दो घरों के बीच की दीवार इतनी मोटी हो जाती है कि दीवार के उस पार तिल-तिल कर मर रही दो जिंदगियों की सिसकियां भी पड़ोसियों को सुनाई नहीं देतीं या फिर हम उन्हें सुनना नहीं चाहते। इन दोनों की कारुणिक दास्तान से हमारी खुद की और अपने समाज को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। क्या इन दोनों बहनों की इस खराब हालत के लिए हम और आप जिम्मेदार नहीं हैं? एक बहन की मौत होने को आत्महत्या की संज्ञा दिया जाना अथवा उसे इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह साफ तौर पर एक हत्या है, जिसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं। यह हत्या किसी व्यक्ति विशेष द्वारा भले ही अंजाम नहीं दिया गया, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि हमारे समाज की संवेदनशून्यता ने उनकी हत्या कर दी। यहां यह सवाल उठ खड़ा होता है कि हम और आप इतने संवेदनहीन आखिर क्यों हो गए हैं? क्यों समाज और आसपड़ोस को लेकर हमारी संवेदनाएं मर गई हैं या मरती जा रही हैं। वसुधैव कुटुंबकम की अपनी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा से हम इतने दूर क्यों चले गए हैं? इन सवालों का जबाव ढूंढ़ने की अगर हम कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि महानगर की भागदौड़ भरी जिंदगी और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने और भोगवादी जिंदगी जीने की हवस ने हमको न केवल संवेदनशून्य बना दिया है, बल्कि हम लगातार स्वकेंद्रित भी होते चले गए हैं। इस आपाधापी में हमारा परिवार और हमारा समाज हमसे लगातार दूर होता चला गया। हम महानगर की भागदौड़ की जिंदगी में अपने को स्थापित करने की होड़ में इतने डूब गए हैं कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराने लगे हैं। पश्चिमी सभ्यता के आक्रमण और उसके बाद उसके अंधानुकरण ने हमसे हमारे समाज को अलग कर दिया है। नतीजा यह हुआ कि महानगरों में न्यूक्लियर फेमिली यानी एकल परिवार की अवधारणा को बल मिलता चला गया है। मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे तक सिमटी नई सामाजिक और शहरी अवधारणा ने परिवार के बाकी बचे लोगों को एक-दूसरे अलग-थलग कर दिया है। यह अलगाव भौतिक और भावनात्मक दोनों ही रूपों में दिखाई देता है। इस अलगाव की वजह से परिवार के अन्य लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा होती गई। इस असुरक्षा की भावना ने हमें डिप्रेशन या कहें कि अवसाद का शिकार बना दिया है जिससे व्यक्ति मनोरोगों के शिकार बन रहे हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली में सिर्फ दस फीसदी लोग संयुक्त परिवारों में रहते हैं, जबकि 76 फीसदी लोग एकल परिवार का हिस्सा हैं। एकाकीपन का खौफ बहुत खतरनाक होता है। अपने परिवार से अलग होने या रहने की एक अलग अनुभूति और प्रभाव होता है जिसे हर कोई व्यक्त नहीं कर पाता है। इस तरह अंदर ही अंदर लगातार घुटते रहने और अपनी भावनाओं को जज्ब करते जाने के कारण हमारे मानसिक रोगों की गिरफ्त में आने का खतरा बढ़ जाता है। महानगरों में एकल परिवार की अवधारणा को बढ़ावा देने के दो अहम कारण हैं-पहला तो काम करने या फिर पढ़ाई-लिखाई के जगह का दूर होना और दूसरा परिवार में पर्सनल स्पेस की कमी। अभी कुछ दिनों पहले इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के तीन महानगरों में कराए गए सर्वेक्षण का नतीजा भी बेहद हैरान करने वाला आया है। आईसीएमआर के उस सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली में रहने वाले आठ प्रतिशत लोग तनाव के शिकार हैं, जबकि चंडीगढ़ और पुणे में स्थिति थोड़ी सी बेहतर है। चेन्नई में हालात बेहद खराब हैं और वहां तकरीबन सोलह फीसदी लोग किसी न किसी तरह के मानसिक रोग के शिकार हैं। अगर हम पूरे देश पर नजर डालें तो फिलहाल तकरीबन सवा करोड़ लोग किसी न किसी तरह के मानसिक रोग के शिकार हैं। सिर्फ दिल्ली में ही 2001 के मुकाबले 2010 में मानसिक रोगियों की संख्या में छह फीसदी का इजाफा हुआ है। यहां हमें यह याद रखना होगा कि इन दस वर्षो में देश ने आधुनिकता का दामन कसकर पकड़ा और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था ने अपने पांव पसारे। इसके अलावा अगर हम इंडियन साइकेट्रिक सोसाइटी की सालाना रिपोर्ट पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि एकांत अवसाद का प्रमुख कारण है और तकरीबन पचपन फीसदी लोगों की सामाजिक भागीदारी नगण्य है। इसमें ज्यादातर वह लोग हैं जो अन्य शहरों या सूबों से नौकरी की तलाश में यहां आए और अपना कोई समाज नहीं बना पाए। सामाजिक सहभागिता कम होने की वजह से लोग अवसाद के शिकार होते चले गए। मनोचिकित्सकों के मुताबिक सामाजिक, पारिवारिक या फिर आर्थिक असुरक्षा बोध के कारण महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा जल्दी अवसाद की शिकार हो जाती हैं और अकेलापन इस अवसाद को और बढ़ा देता है। महिलाओं के अलावा महानगरों में बुजुर्गो में भी असुरक्षा का बोध ज्यादा होता है। अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देने के बाद यही बच्चे माता-पिता को छोड़कर बाहर चले जाते हैं। कई परिवारों के साथ तो यह भी देखने को मिलता है कि बेटे-बहू एक ही शहर में अलग-अलग रहते हैं और बुजुर्ग मां-बाप भी उसी शहर में अलग मकानों में रह होते हैं। मां-बाप को उम्र के उस मुकाम पर जब अपने औलाद के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तभी वह उनसे अलग हो जाते हैं। इस अलगाव से जो मानसिक तनाव या फिर बच्चों की संवेदनहीनता से एकाकीपन का गहरा अहसास होता है वह उन्हें अंदर से तोड़ देता है जिसकी भरपाई ताउम्र नहीं हो पाता है। नोएडा में दोनों बहनों की इस घटना ने हमारे समाज को एक बार फिर से झकझोर दिया है और यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि महानगरों की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में एकाकीपन के कारण बढ़ रहे अवसाद या डिप्रेशन को कैसे रोका जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


No comments:

Post a Comment