प्रकृति की तरफ से ही मनुष्य को सामाजिक परिवेश मिला है। इस परिवेश को जितना वृहत तौर पर देखा जाए, समझा जाए या अपनाया जाए, श्रेष्ठकर है। मानव के लिए भी और प्रकृति के लिए भी है। इसलिए हम गौर करते हैं कि हमारे आस-पास सिंबायोटिक रिलेशन (सहजीवी सम्बंध) है। इस तरह के सम्बंध में पेड़-पौधे, पशु- पक्षी और मनाव समाज के विभिन्न तबके भी शामिल हैं। शास्त्रों ने तो यहां तक कि निर्जीव पदार्थो मसलन, पहाड़ों, सागर और बादल से भी किरदार की बातचीत कराई है। जहां अभिव्यक्ति का जरिया नहीं मिला, वहां हाव-भाव से ही आपस में सम्बोधन हुआ है। इसीलिए तो मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, मनुष्य का प्रकृति से कटाव हो गया है। इस कटाव के चलते ही प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा जैसे मामले बढ़े। मध्य आधुनिक जीवन शैली के चलते विकासवाद, बाजारवाद और पूंजीवाद का वर्चस्व रहा। तदुपरांत आज का समाज अत्याधुनिक जीवन शैली या उत्तर आधुनिक जीवन शैली में प्रवेश कर चुका है, जहां आदमी का आदमी से कटाव हो गया है। चाहे वह रिश्ते-नाते के स्तर पर हो या पड़ोसी के स्तर पर। इसलिए शहरों में मानसिक रोग के मामले बढ़े हैं। गांवों में आज भी सामाजिक आवरण को कमोबेश ढोया जा रहा है लेकिन शहरों में यह छिन्न-भिन्न हो चुका है। बहरहाल, जिसे हम अवसाद, अलगाव, अकेलापन, मानसिक तनाव या डिप्रेशन का नाम देते हैं, वस्तुत: वह मानसिक रोग है। इसलिए किसी मरीज के बारे में यह कह देना कि यह डिप्रेशन में है, मेडिकल साइंस की भाषा में गलत है। मानसिक रोग के कई प्रकार होते हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक अब तक मनुष्य में 200 तरह के मानसिक रोग पाए गए हैं। इसकी संख्या साल दर साल बढ़ भी रही है लेकिन सामान्यत: 12 प्रकार के मानसिक रोग आम हैं। इनमें ही एक रोग डिप्रेशन है जिसके मामले भारत समेत दुनिया भर के देशों में काफी ज्यादा हैं। हाल ही में नोएडा में दो बहनों के डिप्रेशन का मामला सामने आया था, जिनमें एक की बाद में मौत हो गई थी; उसे डिप्रेशन नहीं, साइकोसिस था। ये भी मानसिक रोग का एक और प्रकार है। वैसे हम यह नहीं कह सकते हैं कि मानसिक रोग आधुनिक या उत्तर आधुनिक जीवनशैली के विकास का नतीजा है, क्योंकि इससे काफी नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। इससे हम काफी हद तक किसी के आधुनिक जीवन शैली से मानसिक तनाव में जा सकते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हम जीवनशैली के मुद्दे को उठाने के बावजूद मानसिक रोग के कारकों को तलाशें। मसलन मानसिक रोग के जैविक कारक क्या हैं, सोचने के नजरिये में किस तरह का बदलाव आ रहा है और सामाजिक परिवेश में क्या बदलाव हुआ है? इन कारकों पर सार्थक बहस करके हम आधुनिक जीवन शैली को अपनाते हुए भी इनकी खामियों से दूर रह पाएंगे। वैसे जैविक कारक को छोड़ दें तो बाकी बचे दो कारकों को परिवेश की मदद, परामर्शदाताओं की सलाह से दूर कर सकते हैं। जैविक कारक में मस्तिष्क में रासायिनक बदलाव आते हैं यानी कि दिमाग में केमिकल लोचा होता है। इसे दवाइयों की मदद से दूर किया जाता है। बहरहाल, सवाल यह भी उठने लगा है कि मानसिक रोग एक काल्पनिक उपज तो नहीं बनकर रह गया है क्योंकि शहरों में इसे गम्भीर बीमारी के तौर पर देखा जा रहा है। बाजार इसके मुताबिक अपनी दवाइयों को उतार रहा है। डॉक्टरों का धंधा चल रहा है। दरअसल इसके पीछे कुछ लोगों का तर्क यह है कि मानसिक रोग एक नई बीमारी है, पहले यह बीमारी नहीं थी। निजी तौर पर मैं इससे असहमत हूं। यह बीमारी सभी सजीवों में पाई जाती है। आपने देखा होगा कि कभी-कभी एक चिड़िया किसी कारणवश खुद को अपनों से अलग कर लेती है। ये भी मानसिक रोग की निशानी है। मानसिक रोग सब में पाया जाता है और हर दौर में यह समस्या बनी रही है। अहम यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति इसे किस तौर पर लेता है। अब्राहम लिंकन और गालिब भी उसके दौर से गुजर चुके हैं फिर भी वे महान बने क्योंकि उन्होंने इस पर चिंतन कर सकारात्मक रवैया अपनाया। इसलिए अवसादग्रस्त शख्स चाहे तो खुद अपने आत्मबल से इस समस्या से निजात पा सकता है। वहीं इस समस्या की शुरु आत के साथ ही अपने चारों तरफ एक तरह का आवरण बना लेने से, आपस में संवाद तोड़ लेने से, नकारात्मक सोच को बढ़ावा देने से यह बीमारी भयंकर रूप धारण कर लेती है। (डॉ. अचल भगत से प्रभाकर की बातचीत पर आधारित)
Thursday, April 28, 2011
सोच, जीवन शैली, और केमिकल लोचा
प्रकृति की तरफ से ही मनुष्य को सामाजिक परिवेश मिला है। इस परिवेश को जितना वृहत तौर पर देखा जाए, समझा जाए या अपनाया जाए, श्रेष्ठकर है। मानव के लिए भी और प्रकृति के लिए भी है। इसलिए हम गौर करते हैं कि हमारे आस-पास सिंबायोटिक रिलेशन (सहजीवी सम्बंध) है। इस तरह के सम्बंध में पेड़-पौधे, पशु- पक्षी और मनाव समाज के विभिन्न तबके भी शामिल हैं। शास्त्रों ने तो यहां तक कि निर्जीव पदार्थो मसलन, पहाड़ों, सागर और बादल से भी किरदार की बातचीत कराई है। जहां अभिव्यक्ति का जरिया नहीं मिला, वहां हाव-भाव से ही आपस में सम्बोधन हुआ है। इसीलिए तो मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, मनुष्य का प्रकृति से कटाव हो गया है। इस कटाव के चलते ही प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा जैसे मामले बढ़े। मध्य आधुनिक जीवन शैली के चलते विकासवाद, बाजारवाद और पूंजीवाद का वर्चस्व रहा। तदुपरांत आज का समाज अत्याधुनिक जीवन शैली या उत्तर आधुनिक जीवन शैली में प्रवेश कर चुका है, जहां आदमी का आदमी से कटाव हो गया है। चाहे वह रिश्ते-नाते के स्तर पर हो या पड़ोसी के स्तर पर। इसलिए शहरों में मानसिक रोग के मामले बढ़े हैं। गांवों में आज भी सामाजिक आवरण को कमोबेश ढोया जा रहा है लेकिन शहरों में यह छिन्न-भिन्न हो चुका है। बहरहाल, जिसे हम अवसाद, अलगाव, अकेलापन, मानसिक तनाव या डिप्रेशन का नाम देते हैं, वस्तुत: वह मानसिक रोग है। इसलिए किसी मरीज के बारे में यह कह देना कि यह डिप्रेशन में है, मेडिकल साइंस की भाषा में गलत है। मानसिक रोग के कई प्रकार होते हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक अब तक मनुष्य में 200 तरह के मानसिक रोग पाए गए हैं। इसकी संख्या साल दर साल बढ़ भी रही है लेकिन सामान्यत: 12 प्रकार के मानसिक रोग आम हैं। इनमें ही एक रोग डिप्रेशन है जिसके मामले भारत समेत दुनिया भर के देशों में काफी ज्यादा हैं। हाल ही में नोएडा में दो बहनों के डिप्रेशन का मामला सामने आया था, जिनमें एक की बाद में मौत हो गई थी; उसे डिप्रेशन नहीं, साइकोसिस था। ये भी मानसिक रोग का एक और प्रकार है। वैसे हम यह नहीं कह सकते हैं कि मानसिक रोग आधुनिक या उत्तर आधुनिक जीवनशैली के विकास का नतीजा है, क्योंकि इससे काफी नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। इससे हम काफी हद तक किसी के आधुनिक जीवन शैली से मानसिक तनाव में जा सकते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हम जीवनशैली के मुद्दे को उठाने के बावजूद मानसिक रोग के कारकों को तलाशें। मसलन मानसिक रोग के जैविक कारक क्या हैं, सोचने के नजरिये में किस तरह का बदलाव आ रहा है और सामाजिक परिवेश में क्या बदलाव हुआ है? इन कारकों पर सार्थक बहस करके हम आधुनिक जीवन शैली को अपनाते हुए भी इनकी खामियों से दूर रह पाएंगे। वैसे जैविक कारक को छोड़ दें तो बाकी बचे दो कारकों को परिवेश की मदद, परामर्शदाताओं की सलाह से दूर कर सकते हैं। जैविक कारक में मस्तिष्क में रासायिनक बदलाव आते हैं यानी कि दिमाग में केमिकल लोचा होता है। इसे दवाइयों की मदद से दूर किया जाता है। बहरहाल, सवाल यह भी उठने लगा है कि मानसिक रोग एक काल्पनिक उपज तो नहीं बनकर रह गया है क्योंकि शहरों में इसे गम्भीर बीमारी के तौर पर देखा जा रहा है। बाजार इसके मुताबिक अपनी दवाइयों को उतार रहा है। डॉक्टरों का धंधा चल रहा है। दरअसल इसके पीछे कुछ लोगों का तर्क यह है कि मानसिक रोग एक नई बीमारी है, पहले यह बीमारी नहीं थी। निजी तौर पर मैं इससे असहमत हूं। यह बीमारी सभी सजीवों में पाई जाती है। आपने देखा होगा कि कभी-कभी एक चिड़िया किसी कारणवश खुद को अपनों से अलग कर लेती है। ये भी मानसिक रोग की निशानी है। मानसिक रोग सब में पाया जाता है और हर दौर में यह समस्या बनी रही है। अहम यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति इसे किस तौर पर लेता है। अब्राहम लिंकन और गालिब भी उसके दौर से गुजर चुके हैं फिर भी वे महान बने क्योंकि उन्होंने इस पर चिंतन कर सकारात्मक रवैया अपनाया। इसलिए अवसादग्रस्त शख्स चाहे तो खुद अपने आत्मबल से इस समस्या से निजात पा सकता है। वहीं इस समस्या की शुरु आत के साथ ही अपने चारों तरफ एक तरह का आवरण बना लेने से, आपस में संवाद तोड़ लेने से, नकारात्मक सोच को बढ़ावा देने से यह बीमारी भयंकर रूप धारण कर लेती है। (डॉ. अचल भगत से प्रभाकर की बातचीत पर आधारित)
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