क्या पागलपन व्यवस्थाजन्य भी हो सकता है? अपराध, शराबखोरी, जुआखोरी, तलाक, आत्महत्या अथवा सीधे-सीधे पागलपन के बढ़ते आंकड़ों से प्रश्न स्वाभाविक है कि अपने लक्ष्यों के निकट पहुंच गए देशों में इतने बड़े पैमाने पर मानसिक उलझनों की वजह क्या हो सकती है? कहीं हमसे कोई बुनियादी भूल तो नहीं हो रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन की सार्थकता, अर्थवत्ता, संपन्नता हम गलत दिशा में खोज रहे हैं? क्या यह संभव नहीं कि आदमी का मन कुछ और भी खोजता है, जो वर्तमान व्यवस्था में सुलभ नहीं हो पा रहा है?
क्या पागलपन व्यवस्थाजन्य भी हो सकता है? अपराध, शराबखोरी, जुआखोरी, तलाक, आत्महत्या अथवा सीधे-सीधे पागलपन के बढ़ते आंकड़ों से प्रश्न स्वाभाविक है कि अपने लक्ष्यों के निकट पहुंच गए देशों में इतने बड़े पैमाने पर मानसिक उलझनों की वजह क्या हो सकती है? कहीं हमसे कोई बुनियादी भूल तो नहीं हो रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन की सार्थकता, अर्थवत्ता, संपन्नता हम गलत दिशा में खोज रहे हैं? क्या यह संभव नहीं कि आदमी का मन कुछ और भी खोजता है, जो वर्तमान व्यवस्था में सुलभ नहीं हो पा रहा है?म गली-कूचों में गाहे-बगाहे दिखने वाले उन लोगों की बात नहीं कर रहे, जिन्हें ‘पागल’ पहचानना कठिन नहीं। हम तो उन बहुसंख्यक लोगों की बात कर रहे हैं, जिन्हें अपने पागल नहीं होने का भ्रम है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया में जो कुछ चल रहा है- हम-आप, नेता, धर्मगुरु, पंडे-पुजारी, वैज्ञानिक, पत्रकार, व्यापारी, डॉक्टर, अफसर, उोगपति, मास्टर आदि यानी निन्यानबे के फेर में पड़े सभी लोग पूरे पागलपन के सांचे में भले न फिट हों, मगर सबके शेखचिल्लीपन साफ हैं। प्रमाण यही है कि पिछले सौ सालों के दौरान दुनिया ने अकूत दौलत पैदा की, लेकिन छोटे-बड़े हजारों युद्धों में असंख्य बेगुनाहों की जान भी ली है इसने। सारे युद्ध आदमी की आन-बान-शान के लिए लड़े गए हैं। दुनिया का सत्ता-समीकरण बार-बार बदला, दुश्मन मुंहलगे दोस्त बने, लेकिन सबके सिर पर एटमी तलवार अब भी लटक रही है। अब तो हर देश में आए दिन बम-गोले चलते हैं। आर्थिक दिशा भी बेढब है। संपन्न देशों में अच्छी फसल होती है तो दाम गिरने के भय से अन्न नष्ट कर दिया जाता है, भले ही दुनिया में करोड़ों लोग भूख से बिलबिलाते रहें। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन समेत सभी देशों में संसाधनों की बर्बादी छिपी नहीं है। सभी जगह लोग शिकायत करते हैं कि राजनीतिक वर्ग नागरिकों से पूरा कटा हुआ है।
दौलत पैदा करने वाली आधुनिक अर्थव्यवस्था ‘सफल’ बताई जाती है। यह सफलता घातक हथियारों पर बेतहाशा हो रहे खर्च पर टिकी है। सिर्फ अटकल लगाई जा सकती है कि हथियारों के बजाय रकम अगर मकान, स्कूल, अस्पताल जैसे कल्याणकारी कामों पर खर्च हो तो दुनिया का रूप क्या हो जाएगा। धनी माने गए देशों में साक्षरता 90 प्रतिशत से ज्यादा है। रेडियो-टीवी, पत्र-पत्रिकाएं, फिल्म, खेलकूद, इंटरनेट वगैरह सभी को सुलभ हैं, लेकिन स्वस्थ मनोरंजन, बढ़िया साहित्य के बजाय हर जगह नागरिक मुनाफे पर आधारित मीडिया से दो-चार हैं। सस्ता, फूहड़ मनोरंजन और प्रभाष जोशी के शब्दों में ‘लुगदी पत्रकारिता’ हम सबकी आंखों के सामने बच्चों के दिमाग में जहर भर रही है, लेकिन हम इस अनैतिकता पर दांत नहीं पीस सकते। ‘सवरेदय’ की बात उठाना मानो र्बे का छत्ता छेड़ना है!
लेकिन पागलपन के लक्षण साफ हैं और हर कहीं हैं। कितना भी बचें, मगर तनातनी, कलह, भ्रष्टाचार, आबोहवा, ऊब, अकाल, हिंसा, अभाव, बेगानापन, प्रकृति-दोहन, व्यक्तिगत अथवा सामाजिक जीवन में चालबाजी, एटम बम, भेदभाव, गृहयुद्ध, बेरुखी, मारकाट, आतंक, मानवाधिकार हनन यानी ‘जीवन’ की दृष्टि से घातक ये विध्वंसक प्रवृत्तियां आंखों से छिपी नहीं रह सकतीं। हमारे निजी जीवन और बात-व्यवहार में बेईमानी, झगड़ालूपन, संवेदनहीनता, असहिष्ण्णुता, स्वार्थीपन, लालच, चालबाजी यानी ‘ध्वसं’ के लक्षण देखकर कोई हमें पागल कहने में तनिक नहीं हिचकिचाएगा, बल्कि हमारे इनकार करने को पागलपन का पुख्ता लक्षण समझा जाएगा। अगर हम ‘पागल’ ठहराए जा सकते हैं तो फिर भला इन्हीं लक्षणों वाला ‘समाज’ क्या पागल नहीं हो सकता? पागलपन की ‘महामारी’ की बात अटपटी लग सकती है, पर अमेरिकी प्रशासन के अनुसार देश में मानसिक बीमारी ‘अनियंत्रित’ हो गई है- 25 प्रतिशत नागरिक सीधे तौर पर मनोरोगी हैं, 50 प्रतिशत से ज्यादा के बारे में कहा जा सकता है कि वे इस रोग के कगार पर हैं और 20 प्रतिशत बच्चों में मानसिक रोगों के लक्षण साफ देखे जा सकते हैं। एक तरफ 40 प्रतिशत वयस्क आबादी व्यग्रता, उन्माद, अनिद्रा के लिए दवाएं लेती है तो दूसरी ओर बड़े बुजुर्गो और किशोर-किशोरियों में आत्महत्या की दर सर्वाधिक है। इसी तरह आर्थिक व वैचारिक तनाव के कारण एक तिहाई परिवारों पर टूटने का खतरा है। 50 प्रतिशत स्त्रियां घरेलू मारपीट का शिकार बनती हैं। यानी लगभग 60 प्रतिशत आबादी व्यवस्था में ‘फिट’ नहीं हो रही है। इस मामले में ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान आदि भी ज्यादा पीछे नहीं।
दुनिया के ताकतवर संपन्न देशों के इन भयावह आंकड़ों से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों हो रहा है? अमेरिका के सबसे बड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सर्जन-जनरल की रिपोर्ट सिर्फ यह गोलमोल बात कहकर चुप हो गई कि ‘जैविक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से मानसिक संतुलन प्रभावित होता है!’ जीवन का कौन-सा हिस्सा भला ‘सामाजिक, जैविक और सांस्कृतिक’ कारकों से बचा रह सकता है? क्या अमेरिका के सर्वोच्च स्वास्थ्य विशेषज्ञ महोदय यह कह रहे हैं कि इस देश में जन्म लेना मानसिक रूप से रुग्ण होना है? इलाज को लेकर भी यह रिपोर्ट कम भ्रामक नहीं है। इसी दावे को लें कि मानसिक व्याधियां अब लाइलाज नहीं हैं। प्रश्न उठता है कि अगर पक्की वजह ही पता नहीं तो इलाज किसका और कैसे? कुछ दशकों तक प्रतिबंधित रहने के बाद दिमाग को बिजली के झटके देना फिर बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है। मनोचिकित्सक इसकी आधुनिक पद्धति को ‘सुरक्षित’ बताते नहीं अघाते, लेकिन इससे तौबा कर चुके पूर्व डॉक्टरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘कमेटी फॉर ट्रूथ इन साइकिएट्री’ के इस आरोप में दम है कि बिजली के झटके से स्मृति लोप जैसे अनचाहे गंभीर और स्थाई नुकसान आम बात है। इस संगठन का यह आरोप भी कम चिंताजनक नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन ने जिन 19 विशेषज्ञों का हवाला दिया है, उनमें 15 के आर्थिक हित बिजली के झटके देनेवाली इन मशीनों को बनाने और बेचने वाली कंपनियों से सीधे जुड़ते हैं।
दौलत पैदा करने वाली आधुनिक अर्थव्यवस्था ‘सफल’ बताई जाती है। यह सफलता घातक हथियारों पर बेतहाशा हो रहे खर्च पर टिकी है। सिर्फ अटकल लगाई जा सकती है कि हथियारों के बजाय रकम अगर मकान, स्कूल, अस्पताल जैसे कल्याणकारी कामों पर खर्च हो तो दुनिया का रूप क्या हो जाएगा। धनी माने गए देशों में साक्षरता 90 प्रतिशत से ज्यादा है। रेडियो-टीवी, पत्र-पत्रिकाएं, फिल्म, खेलकूद, इंटरनेट वगैरह सभी को सुलभ हैं, लेकिन स्वस्थ मनोरंजन, बढ़िया साहित्य के बजाय हर जगह नागरिक मुनाफे पर आधारित मीडिया से दो-चार हैं। सस्ता, फूहड़ मनोरंजन और प्रभाष जोशी के शब्दों में ‘लुगदी पत्रकारिता’ हम सबकी आंखों के सामने बच्चों के दिमाग में जहर भर रही है, लेकिन हम इस अनैतिकता पर दांत नहीं पीस सकते। ‘सवरेदय’ की बात उठाना मानो र्बे का छत्ता छेड़ना है!
लेकिन पागलपन के लक्षण साफ हैं और हर कहीं हैं। कितना भी बचें, मगर तनातनी, कलह, भ्रष्टाचार, आबोहवा, ऊब, अकाल, हिंसा, अभाव, बेगानापन, प्रकृति-दोहन, व्यक्तिगत अथवा सामाजिक जीवन में चालबाजी, एटम बम, भेदभाव, गृहयुद्ध, बेरुखी, मारकाट, आतंक, मानवाधिकार हनन यानी ‘जीवन’ की दृष्टि से घातक ये विध्वंसक प्रवृत्तियां आंखों से छिपी नहीं रह सकतीं। हमारे निजी जीवन और बात-व्यवहार में बेईमानी, झगड़ालूपन, संवेदनहीनता, असहिष्ण्णुता, स्वार्थीपन, लालच, चालबाजी यानी ‘ध्वसं’ के लक्षण देखकर कोई हमें पागल कहने में तनिक नहीं हिचकिचाएगा, बल्कि हमारे इनकार करने को पागलपन का पुख्ता लक्षण समझा जाएगा। अगर हम ‘पागल’ ठहराए जा सकते हैं तो फिर भला इन्हीं लक्षणों वाला ‘समाज’ क्या पागल नहीं हो सकता? पागलपन की ‘महामारी’ की बात अटपटी लग सकती है, पर अमेरिकी प्रशासन के अनुसार देश में मानसिक बीमारी ‘अनियंत्रित’ हो गई है- 25 प्रतिशत नागरिक सीधे तौर पर मनोरोगी हैं, 50 प्रतिशत से ज्यादा के बारे में कहा जा सकता है कि वे इस रोग के कगार पर हैं और 20 प्रतिशत बच्चों में मानसिक रोगों के लक्षण साफ देखे जा सकते हैं। एक तरफ 40 प्रतिशत वयस्क आबादी व्यग्रता, उन्माद, अनिद्रा के लिए दवाएं लेती है तो दूसरी ओर बड़े बुजुर्गो और किशोर-किशोरियों में आत्महत्या की दर सर्वाधिक है। इसी तरह आर्थिक व वैचारिक तनाव के कारण एक तिहाई परिवारों पर टूटने का खतरा है। 50 प्रतिशत स्त्रियां घरेलू मारपीट का शिकार बनती हैं। यानी लगभग 60 प्रतिशत आबादी व्यवस्था में ‘फिट’ नहीं हो रही है। इस मामले में ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान आदि भी ज्यादा पीछे नहीं।
दुनिया के ताकतवर संपन्न देशों के इन भयावह आंकड़ों से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों हो रहा है? अमेरिका के सबसे बड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सर्जन-जनरल की रिपोर्ट सिर्फ यह गोलमोल बात कहकर चुप हो गई कि ‘जैविक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से मानसिक संतुलन प्रभावित होता है!’ जीवन का कौन-सा हिस्सा भला ‘सामाजिक, जैविक और सांस्कृतिक’ कारकों से बचा रह सकता है? क्या अमेरिका के सर्वोच्च स्वास्थ्य विशेषज्ञ महोदय यह कह रहे हैं कि इस देश में जन्म लेना मानसिक रूप से रुग्ण होना है? इलाज को लेकर भी यह रिपोर्ट कम भ्रामक नहीं है। इसी दावे को लें कि मानसिक व्याधियां अब लाइलाज नहीं हैं। प्रश्न उठता है कि अगर पक्की वजह ही पता नहीं तो इलाज किसका और कैसे? कुछ दशकों तक प्रतिबंधित रहने के बाद दिमाग को बिजली के झटके देना फिर बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है। मनोचिकित्सक इसकी आधुनिक पद्धति को ‘सुरक्षित’ बताते नहीं अघाते, लेकिन इससे तौबा कर चुके पूर्व डॉक्टरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘कमेटी फॉर ट्रूथ इन साइकिएट्री’ के इस आरोप में दम है कि बिजली के झटके से स्मृति लोप जैसे अनचाहे गंभीर और स्थाई नुकसान आम बात है। इस संगठन का यह आरोप भी कम चिंताजनक नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन ने जिन 19 विशेषज्ञों का हवाला दिया है, उनमें 15 के आर्थिक हित बिजली के झटके देनेवाली इन मशीनों को बनाने और बेचने वाली कंपनियों से सीधे जुड़ते हैं।
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