अरुणिमा सिन्हा उर्फ सोनू कुछ दिन पहले तक उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थीं। अब वह एक पैर वाली विकलांग लड़की है। इसमें न उसका कोई दोष है और न ही यह दुर्घटना है। अगर दुर्घटना में उसका पैर क्षतिग्रस्त हो जाता और डॉक्टरों को उसे काटना पड़ता तो इसे एक त्रासदी कहा जाता और हम आप दुख व्यक्त करते हुए उसके प्रति सहानुभूति के कुछ शब्द निकालते। लेकिन उनके अनुसार पद्मावत एक्सप्रेस से लखनऊ से दिल्ली आने वाली ट्रेन में बदमाशों ने छेड़छाड़ की, उसकी चेन छीनने की कोशिश की और विरोध करने पर उसे बाहर गिरा दिया। उसका दुर्भाग्य देखिए कि जिस रेलवे ट्रैक पर वह गिरी, उस पर आ रही दूसरी गाड़ी उसके एक पैर के ऊपर से गुजरती चली गई। अरुणिमा की इस त्रासदपूर्ण दशा के लिए शब्द ढूंढ़ना मुश्किल है। कुछ घंटे पहले तक जो लड़की केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में भर्ती के इंटरव्यू की कल्पना और अपनी खेल प्रतिभा के बेहतर प्रदर्शन की सोच में डूबी रही होगी, वह अचानक भविष्य की चिंता को लेकर गहरे अवसाद में चली गई। इस घटना के ऐसे कई पहलू हैं, जो हमारे अंदर गहरे आक्रोश के साथ कई चिंताएं भी पैदा कर रहे हैं। रेलवे में यात्रियों की सुरक्षा एक अहम पहलू है। यदि रेलवे में पर्याप्त सुरक्षा होती तो अरुणिमा के साथ ऐसा नहीं होता। बदमाशों के इतने दुस्साहस का अर्थ ही है कि सुरक्षा को लेकर उनके मन में कोई भय नहीं था। रेलवे के प्रवक्ता कह रहे हैं कि प्रतिदिन करीब 11 हजार रेलें चलती हैं, जिनमें से 3500 रेलों को चिह्नित कर रेलवे सुरक्षा बल और सामान्य रेलवे पुलिस एस्कॉर्ट करती है। कुछ क्षेत्रों को भी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील मानकर व्यवस्था की गई है। यह अभाव का रोना है। सतही तौर पर बात ठीक भी लगती है कि कैसे एक-एक ट्रेन को पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जा सकती है। रेलवे यह न भूले कि चप्पे-चप्पे पर जवानों की व्यवस्था से ज्यादा महत्व माहौल का है। रेलवे अगर अभियान चलाकर रेलों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था का प्रचार करे तो बदमाश दुस्साहस से परहेज करने लगेंगे। आखिर ट्रेन में बदमाश एक लड़की के साथ इतना दुस्साहस कैसे कर गए? रेलवे सुरक्षा महकमा इस पर गंभीरता से विचार करे तो इसका उत्तर व इसकी पुनरावृत्ति न होने का रास्ता भी उसे सूझ जाएगा। वास्तव में रेलवे के अंदर सुरक्षा व्यवस्था के अभाव पर पहले भी प्रश्न उठते रहे हैं और इस भयावह वारदात ने उन प्रश्नों को वाजिब ठहराया है। किंतु कोई सुरक्षा व्यवस्था आम यात्रियों के सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकती। बदमाश एक लड़की के साथ सबके सामने जबरदस्ती करते रहे, वह उनसे संघर्ष करते हुए दरवाजे तक आ गई, लेकिन किसी ने उसकी सहायता नहीं की। भोर के समय लोग नींद में रहे होंगे, किंतु उनके हो-हल्ले में नींद न खुले, ऐसा संभव नहीं। जाहिर है, ज्यादातर लोगों ने अरुणिमा को अकेले उन बदमाशों के हवाले छोड़ दिया। मनुष्य के नाते इससे कायराना और शर्मनाक व्यवहार और क्या हो सकता है? किसी ने यह नहीं सोचा कि उसकी जगह उनकी अपनी बच्ची भी हो सकती थी। अगर बदमाश उसके साथ ऐसा करते तो वे उस कोच के यात्रियों के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द प्रयोग कर रहे होते। वस्तुत: समाज के सामूहिक कायराना आचरण से ही अपराधियों का हौसला बढ़ता है और कुछ मुट्ठी भर की संख्या में होते हुए भी वे हजारों लाखों के बीच वारदात को अंजाम देकर निकल भागते हैं। बदमाशों की संख्या केवल चार थी। अगर कुछ लोग भी उठ खड़े होते तो बदमाशों की शामत आ जाती। हालांकि ऐसी घटनाओं के समय हर व्यक्ति के अंदर उठ खड़े होने की आवाज आती है, पर ऐसा होता नहीं। यही नहीं, घटना के बाद जब कानूनी कार्रवाई की बारी आती है तो बहुसंख्य लोग प्रत्यक्षदर्शी होते, सब कुछ जानते हुए भी सामने नहीं आते। परिणामत: अपराधी बच निकलते हैं और पीडि़त को न्याय नहीं मिल पाता। इससे भी अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। इसलिए अरुणिमा के प्रकरण से फिर एक बार यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि कैसे समाज को भीरु मनोविज्ञान से बाहर निकालकर उसके सामूहिक व्यवहार को स्वाभाविक स्पंदनशीलता में परिणत किया जाए ताकि ऐसे वारदातों के समय उसकी प्रतिक्रिया में साहस, ओज और वीरत्व प्रदर्शित हो सके। वस्तुत: समाज का ऐसा स्वभाव बनाना होगा, जिसमें सामने कुछ भी होता रहे, हम अपने दरबे में ही सिमटे रहेंगे के आचरण को निंदनीय माना जाए और विरोध व प्रतिक्रिया को प्रशंसनीय। बगैर इसके अपराध से किसी अबला या अकेले की रक्षा संभव नहीं। जरा सोचिए, अरुणिमा का लक्ष्य लड़कियों की एक ऐसी फुटबॉल टीम बनानी थी, जो देश का नाम रौशन कर सके। हालांकि कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इम्पोर्टेड लिंब लगाने के बाद वह सामान्य दौड़कूद कर सकेगी, लेकिन इस बात की कल्पना आसानी से की जा सकती है कि किसी कृत्रिम पैर से अरुणिमा के ब्राजील के फुटबॉल खिलाड़ी रोनाल्डो बनने का सपना पूरा नहीं होने वाला। अगर कोच के यात्रियों ने थोड़ा भी साहस दिखाया होता तो बदमाशों को या तो भागना पड़ता या वे इस समय पुलिस के कब्जे में होते और हमारे देश की एक होनहार लड़की खिलाड़ी अपने लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सक्रिय होती। समाज के जिस तबके से वह आती है, उसमें सामान्यत: लड़कियों के खिलाड़ी बनने का माहौल नहीं है। यहां तक आने के लिए उसे कितना संघर्ष करना पड़ा होगा, कितना विरोध झेलना पड़ा होगा, इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। वह वॉलीबॉल और फुटबॉल दोनों खेलती थी। इन दोनों खेलों में उसने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया है। एक खिलाड़ी के तौर पर किसी लड़की के लिए यह उपलब्धि सामान्य नहीं है। आज उसका संघर्ष एकबारगी बेकार हो गया। वस्तुत: ऐसा होने में अपराधियों से ज्यादा दोष तो हमारा है। अपराधी अपराध करने की ही कोशिश करेंगे। उनसे संघर्ष करना आम नागरिकों का दायित्व है। इस दृष्टि से अरुणिमा के असली अपराधी तो कोच के यात्री हैं। ऐसी अनेक अरुणिमाएं आम समाज की सामूहिक भीरुता का शिकार होती हैं। हालांकि स्थानीय लोगों द्वारा उसे बरेली अस्पताल तक ले जाना और वहां डॉक्टरों द्वारा केवल उचित चिकित्सा ही नही, उसे बचाने के लिए अपना खून तक देना प्रशंसनीय है। वे सब अभिनंदन के पात्र हैं। इससे यह भी साबित होता है कि समाज अभी बिल्कुल संवेदनशून्य नहीं हुआ है। निस्संदेह, सामाजिक आचरण के इस पक्ष को और सबल कैसे बनाया जाए, इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है। किंतु सरकारी पक्ष की आरंभिक प्रतिक्रिया फिर निराश करने वाली थी। खेलमंत्री अजय माकन का आरंभ में 25 हजार रुपये और प्रदेश के खेल महकमे से पांच हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा क्षोभ पैदा करने वाली थी। यह तो मीडिया की भूमिका से बने दबाव का नतीजा है कि खेल मंत्री ने भी सहायता राशि बढ़ाई और प्रदेश सरकार ने भी तथा रेलवे ने उसे नौकरी देने का निर्णय किया। उसे रेलवे के न्यायाधिकरण से भी मुआवजा मिल जाएगा, लेकिन रेलवे अपनी जिम्मेवारी कैसे भूल गई थी? हमारा सरकारी महकमा अपने-आप संवदेनशील क्यों नहीं होता? इसे संवदेनशील बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए, यह प्रश्न भी ऐसी भिन्न-भिन्न घटनाओं के समय उभरता रहता है। अरुणिमा का हौसला देखिए, इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद वह कह रही है कि पैर चला गया तो क्या हुआ, सब कुछ पैर से ही तो नहीं होता। अगर एक क्षेत्र में नहीं कर पाई तो किसी दूसरे क्षेत्र में देश के लिए काम करूंगी। उसके शब्द हैं, हिम्मत हो तो आसामान छूआ जा सकता है। वाह रे हिम्मत! रेलवे, खेल मंत्रालय सहित देश एवं प्रदेश के दूसरे सरकारी विभाग अपने गिरेबां में झांककर यह प्रश्न पूछें कि कितना धन खर्च करके आप ऐसा जज्बा पैदा कर सकते हैं। ऐसे जज्बे का कोई मूल्य हो सकता है क्या? कम से कम आम समाज और सरकार अपने आचारण से तो किसी का अपराधी न बने। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं).
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