बीते दिनों दिल्ली से सटे नोएडा के एक फ्लैट में दो बहनों द्वारा खुद को पिछले सात महीनों से बंद रखने की घटना ने कई बातों पर विचारिवमर्श करने की जरूरत पैदा कर दी है। सबसे पहली बात तो यह है कि आखिर वे कौन सी वजहें थीं जिनसे इन दोनों ने खुद को धीमे-धीमे मारने का फैसला कर लिया। खबरों के आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों बहनें मानसिक तौर पर बीमार थीं। इनकी बीमारी इनके पिता की मौत के बाद और बढ़ गई थी। हालांकि बीमारी बढ़ाने में और भी कोई कारण जिम्मेदार है या नहीं, इस बारे में अभी स्पष्ट तौर पर कुछ पता नहीं चल पाया। इन बहनों को जिस तरह की मानसिक बीमारी की बात बताई जा रही है, उसमें मरीज की देखरेख बेहद जरूरी होती है। खतरा इतना ज्यादा होता है कि थोड़ी सी भी चूक अगर हो तो मरीज को संभालना मुश्किल हो जाता है। ऐसा लगता है कि जब तक इन दोनों लड़कियों के पिता जीवित थे, तब तक इनका इलाज ठीक से हो रहा था। इस तरह की मानसिक बीमारी में समय पर दवाई और समय पर संतुलित खाना के अलावा और भी कई तरह के देखरेख की जरूरत होती है।
साथ होने का भरोसा
ऐसे लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है सामाजिक मदद की। इन्हें बताना ही नहीं बल्कि भरोसा दिलाना पड़ता है कि उनका परिवार या उनसे सम्बंधित लोग पूरी तरह से उनके साथ हैं। अगर ऐसा नहीं होगा तो ऐसे मानसिक रोगियों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इस मामले में यह लग रहा है कि जब तक पिता जिंदा रहे तब तक तो इन दोनों बहनों को सोशल सपोर्ट सिस्टम मिला लेकिन उनकी मौत के बाद यह नहीं मिला। लड़कियों का भाई भी अलग रह रहा था। सम्भव है कि उसे अपनी बहनों की बीमारी के बारे में पहले से पता हो। पर ऐसे रोगियों का खयाल रखने के लिए जिस तरह के धैर्य की जरूरत होती है, वह सबमें नहीं होती है। यह भी सम्भव है कि इस भाई में इतना धैर्य नहीं हो कि वह अपनी बहनों को सही इलाज और सही देखरेख कर सके। मुमकिन यह भी है कि महानगरों की भागदौड़ वाली जिंदगी में शायद इस भाई के पास इतना वक्त ही नहीं हो कि वह बहनों की देखरेख कर सके क्योंकि ऐसे रोगी बहुत भला-बुरा भी बोलते हैं। पर इन्हें प्रेम से समझाने और इनका भरोसा जीतने की जरूरत होती है। यह भी सम्भव है कि इन लड़कियों के भाई का धैर्य जवाब दे गया हो। कुछ भी हो सकता है। पारिवारिक स्थितियां किस तरह की थीं, भाई-बहन के रिश्ते का समीकरण क्या था और अन्य रिश्तेदारों के साथ सम्बंध कैसे थे, ऐसी कई बातें हैं जिस पर स्थिति बहुत साफ नहीं है। यह भी देखने वाली बात है कि इन कामकाजी लड़कियों का कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिसने गुजरे सात महीने में इनकी कोई खोज-खबर ली हो।
खाना छोड़ना बीमारी का सिम्ट्म्स
जिस तरह की मानसिक बीमारी इन लड़कियों को थी, उसमें रोगी बात- बात पर खाना छोड़ने की बात करता है और ऐसा कर भी देता है। इस मामले में भी यही लग रहा है कि जब पिता की मौत हुई और किसी वजह से भाई ने अलग रहना शुरू किया तो इन लड़कियों का अवसाद और बढ़ा और इन्होंने खाना छोड़ दिया। इन्हें कोई प्यार से मनाने वाला नहीं था कि खाना लेना कितना जरूरी है। खाना छोड़ते ही कई तरह की समस्याएं पैदा होने लगती हैं। शरीर की ताकत घटने लगती है। शरीर के कामकाज पर असर पड़ता है। पाचन तंत्र समस्याएं पैदा करने लगता है। शरीर के अंदर नमक का स्तर बहुत गड़बड़ हो जाता है। ऐसा होने पर हृदय, किडनी और दिमाग के कामकाज पर गहरा असर पड़ता है। इनसे ही पूरा शरीर नियंत्रित होता है इसलिए इन पर असर पड़ने से स्थिति गड़बड़ होती जाती है। ऐसी स्थिति में बीमारी और बढ़ती जाती है और जानलेवा भी साबित हो सकती है।
परिवार और समाज की बदली मानसिकता
दरअसल, इस तरह की घटनाओं के लिए खुद मरीज की मानसिक स्थिति के अलावा परिवार और समाज की मानसिकता में आया बदलाव भी काफी जिम्मेदार है। आज महानगरों के परिवार बिखर रहे हैं और इस कदर तक बिखर रहे हैं कि कोई भाई इतना खफा हो जा रहा है कि वह सात महीने तक अपनी दो सगी बहनों की कोई खोज-खबर नहीं लेता है। आखिर यह क्या हासिल करने की होड़ है? आखिर ऐसी कौन सी चीज है जिसने लोगों को इतना व्यस्त कर दिया है कि वे अपने परिजनों का खयाल न रखें? एक समय होता था जब पड़ोसी भी परिवार के हिस्से थे। आज बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्हें यह पता होगी कि उनके पड़ोस के फ्लैट में कौन रहता है। पिछले कुछ सालों में शहरी समाज का तानाबाना काफी बदला है और इसमें एकाकीपन बढ़ा है। इसे दूर करने के लिए रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन बने थे पर ये भी कामयाब नहीं रहे। आज हर आदमी अपने काम में इस कदर व्यस्त है कि उसके पास दूसरों की सुध लेने के लिए फुर्सत नहीं है। ऐसी स्थिति में पड़ोस के फ्लैट में बड़ी से बड़ी घटना होने के बावजूद अन्य पड़ोसियों का इससे अनजान रहना स्वाभाविक ही है। आज शहरी समाज का मनोविज्ञान पूरी तरह से पैसा कमाने पर केंद्रित है। हर कोई पैसे के पीछे, या यों कहें कि भौतिक सुख के पीछे भाग रहा है। यहां पैसे कमाने की होड़ लगी हुई है। इस होड़ में पड़ोस भी पीछे छूट जा रहा है और परिवार भी। बचता है तो सिर्फ पैसा। समाज को आखिर समझना होगा कि जिस पैसे के पीछे वे भाग रहे हैं, उससे कुछ देर के लिए भौतिक सुख तो मिल सकता है लेकिन यह दौड़ इंसान को इनसान से काटने का काम कर रही है। (अरुणा ब्रूटा से हिमांशु की बातचीत पर आधारित)
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