दलित अस्मिता की समस्या अभी भी हल नहीं हुई है। दलित बुद्धिजीवी आज भी पूछता है हमारी पहचान क्या है? हम कौन हैं? समाज में हमारी जगह क्या है? क्या शेड्यूल्ड कास्ट कहे जाने से कहीं छुटकारा है? हमें हर जगह हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता है? इन प्रश्नों का दंश कोई गैर-दलित नहीं महसूस कर सकता। इसका अहसास तो दलित को ही हो सकता है। इस अहसास का तीखापन वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तीन अध्ययन केंद्रों द्वारा डॉ. अंबेडकर जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देखने को मिला। कार्यक्रम में अनुसूचित जाति जनजाति अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. लेला कारुण्यकरा के उत्तेजित भाषण में बहुत ताप था। उन्होंने बताया कि जब इस पद के लिए वह इंटरव्यू दे रहे थे तो बार-बार उनसे पूछा गया कि आप कौन हैं? मैं कारुण्यकरा हूं, मैंने जेएनयू से पीएचडी की है, मैं बौद्ध हूं आदि उत्तरों से इंटरव्यू लेने वाले संतुष्ट नहीं हुए। अंत में जब उन्होंने जवाब दिया कि मैं शेड्यूल्ड कास्ट हूं, तब जाकर उन्हें संतोष हुआ और बात आगे बढ़ी। कारुण्यकरा यह साबित करना चाहते थे कि इस पद के लिए सर्वथा उपयुक्त तथा दूसरे उम्मीदवारों से बेहतर होने के बावजूद उनकी योग्यता पर तब तक विचार नहीं हो सका जब तक यह स्पष्ट नहीं हो गया कि वह दलित हैं। उनकी इस पीड़ा को सुनकर दलित प्रश्न का मर्म आत्मसात हुए बिना न रह सका। दरअसल, उनकी योग्यता इतनी है कि उन्हें सामान्य श्रेणी में रखकर भी उनकी पात्रता पर विचार किया जा सकता था। यह भी हो सकता है कि चूंकि पद दलित तथा जनजाति अध्ययन केंद्र के निदेशक का था इसलिए इंटरव्यू लेने वाले संतुष्ट होना चाहते थे, लेकिन डॉ. कारुण्यकरा का आशय यह था कि विषय का विद्वान होने के बावजूद दलित होना ही उनके लिए निर्णायक साबित हुआ। ऐसे वातावरण में दलित अपनी अस्मिता को ले कर चिंतित न हों तो क्या करें? इस प्रश्न को मैं जरा घुमाकर रखना चाहता हूं। दलित अस्मिता समाज में सम्माननीय स्थान पाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसका एक दूसरा चेहरा भी हो सकता है। इस संदर्भ में मैं पूंजीवादी समाज में सर्वहारा की भूमिका को सामने रखना चाहता हूं। जाहिर है, पूंजीपतियों और मध्य वर्ग की महफिल में सर्वहारा का अस्तित्व एक हेय उपस्थिति है। मार्क्स का कहना था कि अपनी क्रांतिकारी भूमिका को पहचान कर सर्वहारा वर्ग अपने आपको समाज का नायक भी बना सकता है, लेकिन इसके लिए उसे एक अलग संस्कृति का विकास करना होगा। सर्वहारा को समाज का नायक बनने के लिए वे सभी गुण अर्जित करने होंगे जो क्रांतिकारी व्यक्तित्व का विकास बनने के लिए आवश्यक हैं। इससे सर्वहारा की अपनी एक विशिष्ट पहचान बनेगी और वह आत्मगौरव का अधिकारी बन सकेगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह कुछ नहीं से सब कुछ बनने की यात्रा है। भारत में दलितों की स्थिति सर्वहारा में भी सर्वहारा जैसी है। वर्ग ही नहीं, जाति की दृष्टि से भी उनकी सामाजिक हैसियत सबसे निचले पायदान पर है। इस स्थिति में निर्णायक परिवर्तन के लिए अगर वे सवर्ण समाज की ओर देखते हैं तो उनका यह सपना शायद कभी पूरा होने वाला नहीं है। इसके लिए पहल तो उन्हें अपने आपसे ही करनी होगी। मेरा प्रश्न यह है कि दलित वर्ग अपने को समाज के हरावल दस्ते के रूप में क्यों नहीं देखता और अपना बौद्धिक, सांस्कृतिक विकास कर अपने को समाज के सबसे आदर्श वर्ग के रूप में क्यों नहीं प्रस्तुत करता? यह भारतीय समाज के प्रति उसकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी का निर्वाह करके ही वह अपने समुदाय के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है। पूछा जा सकता है, इसके लिए पैसा कहां से आएगा? नि:संदेह दलित वर्ग खेती की जमीन तथा रोजगार के अच्छे अवसरों से सबसे ज्यादा वंचित है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बदौलत ही इस वर्ग में एक लघु मध्य वर्ग का विकास हुआ है। वस्तुत: इसी मध्य वर्ग की नींव पर काशीराम ने दलित नेतृत्व का विस्मयकारी विकास किया। अगर डीएस-फोर न होता तो बसपा भी न होती। दुख की बात है कि यह मध्य वर्ग भी, देश के बाकी मध्य वर्ग की तरह, अपनी निजी आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील है। अच्छे और कमाऊ पदों पर बैठे हुए दलित और बुद्धिजीवी भी यही कर रहे हैं। इस संदर्भ में दलित नेताओं की चर्चा करना दुखदायक है। उन्हें दलित वोट की जितनी फिक्र है उतनी दलितों के उत्थान में नहीं, लेकिन ध्यान देने की बात यह भी है कि मार्क्स ने यह सवाल कभी नहीं उठाया कि अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के लिए सर्वहारा के पास पैसा कहां से आएगा? सभी साधन जुट जाएं तभी क्रांति करेंगे यह टालू लोगों का आम बहाना है। सच्चे योद्धा जो कुछ भी उपलब्ध है उसी से लड़ते हैं। और यहां किसी समूह पर हमला करने का सवाल तो है नहीं। सवाल अपने व्यक्तित्व, चरित्र और जीवन शैली का विकास करने का है। ज्यादा पैसा आदमी को आरामपसंद और समाज-विमुख बनाता है। पैसे से ज्यादा बड़ी भूमिका होगी दलितों के बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नेतृत्व की। ये दलित समाज को ऐसा स्वरूप दे सकते हैं कि उनके उच्चतर जीवन मूल्यों को देखकर बाकी समाज न केवल लज्जित हों, बल्कि दलित अस्मिता से कुछ सीखने की जरूरत महसूस करे।
No comments:
Post a Comment