Thursday, April 28, 2011

उपजी त्रासदी सामाजिक ताना-बाना टूटने से


जीवन शैली के पश्चिमी मॉडल के अपनाए जाने के बाद से हमारा सामाजिक ताना- बाना बिखराव का शिकार हुआ है, हमारी मूल्य पद्धति, सामाजिक आचार- व्यवहार सब टूट रहे हैं। इन हालात में अगर इस किस्म की घटनाएं नहीं होंगी तो कब होंगी? महानगरीय जीवनशैली के कारण पैदा हुए इस अलगाव के कारण पश्चिम में अवसाद की समस्या काफी सामने आई थी, पर उन्होंने अपने यहां ऐसी व्यवस्था निर्मित की जहां ऐसे लोगों को देखभाल से लेकर उपचार और सहयोग प्राप्त हो सके। हालांकि आगे चल कर उन्हें भी यह मानना ही पड़ा कि यह व्यवस्था भी बहुत कारगर नहीं है और उन्हें दुबारा परिवार तथा समाज जैसी संस्थाओं की तरफ लौटना ही होगा। पर दुर्भाग्य से हमारे देश में विकास के इस नजरिये और तौर-तरीके से उत्पन्न होने वाली सामाजिक समस्याओं के निराकरण की बात सोची ही नहीं गई। नोएडा की घटना इसी आपाधापी और गहरी उदासीनता का एक नतीजा है।
अवसाद अपने आप में काबू हो जाने वाली बीमारी
अवसाद या डिप्रेशन भी अन्य बीमारियों की तरह एक सच्चाई है। मुश्किल तो यह है कि लोग इसे बीमारी मानते ही नहीं जबकि यह एक मानसिक बीमारी है। अवसाद की एक वजह तो शारीरिक होती है जैसे हमारे शरीर में न्यूरो ट्रांसमीटर्स का बढ़ जाना और दूसरी वजह कोई ऐसी घटना या आपदा भी हो सकती है जिससे आप गहरी निराशा में चले जाते हैं। दोनों ही हालत में हमारी सोच, भावनाओं और व्यवहार तीनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। इन तीनों का ऐसा चक्र बन जाता है जिससे आप चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाते। नोएडा की घटना पहली नजर में अवसाद से जुड़ी नहीं लगती। यह गम्भीर प्रकार की सीजोफ्रेनिया या मानसिक बीमारी हो सकती है। वैज्ञानिक सोच यह बताती है कि अवसाद सेल्फ मोटीवेटिंग या अपने आप काबू में आ जाने वाली बीमारी है। एक निश्चित समय-सीमा में यह स्वत: ठीक हो जाती है पर खतरे की बात तब होती है जब आप उससे पूरी तरह निकल नहीं पाते और एक अगले चक्र में फंस जाते हैं। ऐसे लोगों को उपचार की जरूरत होती है। अधिकतर अवसाद के मामलों में किसी दवा या मनोचिकित्सक की जरूरत नहीं पड़ती। आचरण में बदलाव कर और सायकोथेरेपी से अधिकतर मामले ठीक हो जाते हैं।
नकारात्मक मनोवृत्तियों से आता है डिप्रेशन
अवसाद का अकेलेपन से बड़ा ही गहरा नाता है। जो भी सामाजिक परिवर्तन हमें अपनों से या समाज से अलग ले जाता है, चाहे आप उसे भूमंडलीकरण का नाम दें या आधुनिकता का, वह अवसाद का कारण बन जाता है। जब व्यक्ति अकेला होता है तो उसे अपनी खबर नहीं होती, खुद को परखने का मौका नहीं मिल पाता। कोई उसे यह नहीं बताता कि तुम कैसे दीख रहे हो, क्या कर रहे हो। इस हालत में व्यक्ति गहरी निराशा और नकारात्मक मनोवृत्तियों का शिकार बन जाता है और धीरे-धीरे वह अवसाद की चपेट में आ जाता है। अवसाद कभी एक दिन का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे एक प्रक्रिया रही होती है। अगर हम इस प्रक्रिया के बीच में ही हस्तक्षेप करें तो आने वाले दुष्परिणाम को रोक सकते हैं। विडम्बना है कि स्वास्थ्य से जुड़े हमारे सरकारी आंकड़ों में आज भी टी.बी., अस्थमा, मलेरिया, एड्स जैसी बीमारियों को तो शामिल किया जाता है पर मुझे नहीं लगता कि वहां अवसाद जैसी बीमारियों की कोई र्चचा भी होती है।
सिर्फ पढ़े-लिखों को ही नहीं होता अवसाद
अवसाद से सम्बंधित कई प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचलित हैं जैसे यही कि यह ज्यादा पढ़े-लिखे और बहुराष्ट्रीय निगमों जैसे बड़े संस्थानों या सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों में काम करने वाले लोगों को अपना शिकार बनाती है। मेरे विचार से यह सोच सही नहीं है। जब हम देखते हैं कि पिछले एक दशक में ही देश के दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या करने जैसा कदम उठाया है तो यह धारणा देर तक नहीं ठहरती। हाँ पुरुषों के मुकाबले स्त्रियाँ बड़ी संख्या में अवसाद का शिकार होती हैं यह बात एक हद तक ठीक है पर वे ऐसी परिस्थितियों से ज्यादा मजबूती से निपट लेती हैं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसकी एक बड़ी वजह स्त्रियों का अभिव्यक्ति सम्पन्न होना है। वे रो लेती हैं, बतिया लेती हैं और आसानी से अपना गुबार बाहर निकाल लेती हैं। स्त्रियों के अवसादग्रस्त होने की कई वजहें हैं। जैसे- काम का दबाव, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का न होना, उत्पादन पर स्वामित्व का न होना और सामाजिक कायदे- कानूनों का पालन करने की अधिक अपेक्षा। अवसाद का उपचार सम्भव है पर सबसे पहले तो हमें यही समझने की जरूरत है कि यह वाकई एक बीमारी है और पीड़ित इंसान मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रहा है। यदि हम ऐसे लोगों को अहमियत दें, उनके साथ थोड़ा वक्त गुजारें तभी वे अपनी समस्याएं हमारे साथ बांटेंगे। हो सकता है इसमें थोड़ा अधिक वक्त लगे। जो व्यक्ति ऐसी स्थिति में हो उसके लिए सबसे अच्छा है कि वह अपना व्यवहार, अपनी दिनर्चया बदले। पर यदि कोई ऐसा करने के लिए कोई उस पर दबाव डाले तो शायद यह सम्भव नहीं होगा। अवसाद से जुड़े बहुत कम ऐसे मामले होते हैं जिनमें दवाएं लेने की जरूरत होती है। अधिकतर मामलों में बातचीत, सायकोथेरेपी से उपचार किया जा सकता है। सामुदायिक व्यवहार को हम हमेशा निर्धारित नहीं कर सकते। चूंकि वह एक समूह की तरह काम करता है इसलिए ऐसे मामलों में वह ज्यादा सहायक नहीं हो सकता। यहां सबसे अधिक जिम्मेदारी परिवार की बनती है, समाज उसकी जगह नहीं ले सकता। हालांकि यदि समाज में भागीदारी की, सहयोग की भावना हो तो ऐसी नौबत आए ही नहीं। एक बात और यह कि हम अवसाद को आलस्य, कामचोरी, इच्छाशक्ति में कमी आदि न समझें। हमारी उदासीनता ही अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। (श्री अरविंदर, डॉ. मोनिका और डॉ. शर्मा के विचार राजेश चंद्र की बातचीत पर आधारित)

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