Thursday, April 28, 2011

शहरी भारत का कड़वा सच


शहरी समाज की बदलती जीवन शैली, एकल परिवार को मिलता बढ़ावा, सामाजिक ताने-बाने की उलझन से बढ़ती दूरियां, युवाओं में महत्वाकांक्षा का उच्च स्तर, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए असुरक्षित माहौल और सबसे अहम सफलता-विफलता के बीच घटते फासले से लोगों की जिंदगी में तन्हाई, अकेलापन, अलगाव और अवसाद ने घर बना लिया है। नोएडा में दो बहनों के मामले पर नजर डालें तो समाज की इस स्याह सचाई से परदा उठने लगा। हालांकि मेट्रो और उसके आसपास के इलाकों में अवसाद का यह कोई पहला मामला नहीं है। आए दिन सुनते हैं कि किसी छात्र ने परीक्षा में पास नहीं होने पर खुदकुशी कर ली। किसी लड़की को प्यार में धोखा मिला और वह घर के पंखे से लटक गई। एक बार समाज से धोखा खाने के बाद किसी महिला ने खुद को सबसे अलग कर रखा है। यहां तक कि कई बुजुगरे की मौत इसलिए भी होती है कि उनके बेटे-बेटी ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। इस परिस्थिति में अक्सर बुजुगरे की मौत दिल का दौरा पड़ने से होती है। लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि दिल का दौरा पड़ने से पहले बुजुर्ग काफी सोच रहे थे, यानी मानिसक तनाव में जी रहे थे। बहरहाल, हमारे भारतीय समाज में अवसाद को आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के विकास परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है। सचमुच 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अगर वह समाज से बाहर है तो देवता है या दानव।' प्रख्यात दार्शनिक अरस्तू के इस कथन से इतर आज मनुष्य सामाजिकता से दूर जा रहा है और ऐसी अवस्था में वह न तो देवता ही बन पा रहा है और न दानव। तो इसकी क्या वजह है? इस पर गौर किया जाना चाहिए। दरअसल, इसके दो पहलू हैं। पहला यह कि अवसाद हर मनुष्य के जीवन में आता है। चाहे वह युवावस्था में हो या वृद्धावस्था में। चाहे जीवन के किसी क्षणिक मोड़ पर आए किसी दीर्घकालिक मोड़ पर। कह सकते हैं कि सुख का हम आलिंगन कर खुशियां मनाते हैं, इसे साझा करते हैं, या करने की कोशिश करते हैं। वहीं दुख से विचलित होकर एकाकीपन अपनाते हैं। तो अवसाद को बीमारी मानने से पहले हमें विकार के तौर पर देखना चाहिए और इस पर नकारात्मक राय बनाने से पहले उसे जीवन का एक हिस्सा भर मान लेना चाहिए। अगर अवसाद पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो यह दीर्घकालिक अवस्था में पहुंच जाएगा। ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सकों से परामर्श में संकोच नहीं करना चाहिए। वैसे भी समाज के ज्यादातर लोग अवसाद को पागलपन और मानसिक असंतुलन से भी जोड़कर देखते हैं। यह वाकई गलत है। अवसाद के लक्षण इन दोनों बीमारियों से काफी अलग है। अवसाद के प्राथमिक मरीज़ के लक्षणों को मनोचिकित्सक गौर कर विभिन्न उपभागों में बांटता है। मसलन, क्या मरीज़ के स्वभाव- व्यवहार में बदलाव आया है? कभी-कभी विचारों को लेकर भी दिक्कतें होती हैं। इससे जुड़े दूसरे सहयोगी लक्षणों को भी चिह्नित किया जा रहा है। मसलन, ब्लड प्रेशर और हॉर्ट प्रेशर की क्या स्थिति है? भूख का कम या ज्यादा लगना, प्यास, नींद और वजन के आधार पर अवसाद का पता लगाया जाता है। इसके बाद यह देखा जाता है कि मरीज़ में इन लक्षणों की वजह से जीवन शैली में क्या बदलाव आए हैं? इस अध्ययन के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है कि केमिकल बैलेंस इंड्यूड और परामर्श में कौन बेहतर होगा? हालांकि विकार और बीमारी अपने प्रसार के दौर से गुजरती ही है। लेकिन अवसाद जैसी बीमारी से समाज पर क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है, ये जानना-समझना जरूरी है। हालात विश्व भर में इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि आने वाले दशक में अवसाद दुनिया भर में दूसरे नम्बर की बीमारी हो जाएगी। सामाजिक ढांचे के बदलाव से अवसाद के कई घातक रूप समाज के सामने आएंगे। एक दौर था जब संयुक्त परिवार, पारिवारिक समर्थन और पारिवारिक आयामों के चलते इसे क्षणिक विकार माना जाता था। लेकिन परिवार के टूटने, विद्वेष बढ़ने से सामाजिक स्तर बिखर गया है। अब हम पड़ोसियों से कृत्रिम सम्बंध बनाने पर जोर दे रहे हैं लेकिन शहरी भारत की सचाई यही है कि घनी आबादी वाले इलाकों में भी लोगों को खुद से फुरसत नहीं है। छोटा परिवार, कामकाज के बढ़ते घंटे, ऑफिस में परफॉर्मेस का दबाव और जीवन के प्रति संकीर्ण नजरिये ने आदमी को तन्हा बना दिया है। जहां सोशल सपोर्ट सिस्टम भी पंगु है।



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