Thursday, April 28, 2011

आधुनिकता पर सवाल नहीं खड़ा करता अवसाद


हमारी परम्परागत संयुक्त परिवार पण्राली के साथ कुछ नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियां जुड़ी थीं। लेकिन आज शहरीकरण की प्रक्रिया के चलते शहरों में रहने और रोजगार प्राप्त करने के लिए जो दबाव पैदा हुआ है उसका पुरानी पद्धति के साथ द्वंद्व स्वाभाविक है। नोएडा की घटना से जो तथ्य सामने आए हैं उससे यही जाहिर होता है। उसके साथ-साथ यह भी समझना जरूरी होगा कि यद्यपि ये प्रक्रियाएं चल रही हैं और इससे संयुक्त परिवार पर काफी दबाव पड़ रहा है, फिर व्यापक रूप से यह कहना कि देश में यह विलगाव बहुत ही सर्वव्यापी हो गया है, सही नहीं होगा। इसके कई कारण हैं जिनमें एक तो यह है कि हमारी जो आधुनिकता है वह बहुत ही संकुचित किस्म की है। एक दृष्टि यह कि नगरीकरण की प्रक्रिया, गांवों से शहरों में पलायन की प्रक्रिया, नौकरियां लेने के लिए दूरदराज जाने की प्रक्रिया एक संकुचित वर्ग तक ही सीमित है। हमें देखना होगा कि आज भी हमारे यहां 50 प्रतिशत से अधिक लोग गांवों में रहते हैं। एक तरह से इस प्रकार की प्रक्रिया दिखाई पड़ती है, जहां अवसाद के कारण इन लड़कियों ने समाज से अपने को बिल्कुल अलग-थलग कर लिया। उनमें अब समाज से कोई उम्मीद नहीं बची और एक निराशा, एक परित्याग की भावना से वे पीड़ित दिखाई पड़ती हैं। दूसरी तरफ और भी प्रक्रियाएं मौजूद दिखती हैं जहां पर परम्परा अपने को दबाव डालकर, अपने ढंग से संयुक्त परिवार की, बिरादरी की या जाति की जिम्मेदारियों को लागू करना चाहती है। जैसा कि खाप पंचायतों में देखने को आता है या फिर डिसऑनर किलिंग जैसी घटनाएं होती हैं। या फिर लड़कियों-महिलाओं के अधिकारों का दमन कर और उसे नजरअंदाज कर नियम लागू किए जाते हैं।
जरूरी है सामंजस्य
भारतवर्ष अब भी एक संक्रमण की प्रक्रिया में है और इस प्रक्रिया में नोएडा की घटना जैसा जो केस है, उसमें कई मुद्दे सामने आते हैं। पहला मुद्दा यह है कि ये घटना मात्र आधुनिकीकरण का नतीजा नहीं है क्योंकि यदि आधुनिकीकरण समग्र होता तो ये लड़कियां सबल और सशक्त होतीं। इनके पास स्वावलम्बी बनने की उपलब्धि होती। वह क्यों नहीं हो पाया जिससे ये लड़कियां असहाय होने की हालत में पहुंच गई, इसमें सामाजिक तंत्र का मुद्दा भी अंगों और प्रक्रियाओं को ध्यान में रखना होगा। अपने आप में यह घटना बहुत ही दु:खदायी है। यह एक चरमसीमा है इस अभिव्यक्ति की कि उनमें पूर्ण रूप से अवसादमात्र ही नहीं बल्कि परित्याग की भावना ही है। इससे समाज को एक संदेश जाना चाहिए। दूसरी प्रक्रिया यह है कि जब कभी इस प्रकार का नगरीकरण होता है जहां पर नगर में, शहरों में, मुहल्लों में लोग अपने-अपने फ्लैट्स या घरों में रहते हैं तो वहां पर गुमनाम होने का वातावरण होता है। गुमनाम होना अपने में ही एक प्रकार की समस्या है। एक तरफ तो यह व्यक्ति को सशक्त करती है कि उसके ऊपर कोई बाहर का दबाव नहीं होता, जबकि दूसरी तरफ यह विलगाव भी उत्पन्न करती है। यदि कोई सामाजिक दबाव या मनोवैज्ञानिक दबाव सामने आता है, या किसी प्रकार के आर्थिक या सामाजिक कारणों से उसके ऊपर दबाव आया तो अपने दु:ख को उसे दूसरों से अभिव्यक्त करने या बांटने का मौका नहीं मिलता। हालांकि अभी हमारे नगरों में कुछ हद तक सामाजिक संस्था के परम्परागत तत्व बरकरार हैं। कम्युनिटीज हैं, क्लब हैं, वेलफेयर एसोसिएशन हैं, इत्यादि। फिर भी क्रियात्मक रूप से उनके काम में बहुत कमी दिखाई पड़ती है। क्योंकि एक तरफ तो कम्युनिटी लिविंग और उसकी जिम्मेदारियां और दूसरी तरफ एकाकीपन। तो इन दोनों के बीच में भी एक सामंजस्य होना चाहिए। जैसा कि इस केस में सामने आता है कि बहुत दिनों तक ये लड़कियां अलग-थलग रहीं। कोई अगर उनके पास आता- जाता भी था तो वे उन्हें अस्वीकार करती थीं। फिर भी किसी सामाजिक संस्था या कार्यकर्ता समूह ने या किसी सिविल ' सोसाइटी संस्था उनकी समस्या को नजदीक से जानने-समझने की कोशिश नहीं की। वह तो जब मामला अंत तक पहुंच गया, तब इसमें हाथ डाला गया।
आधुनिकता के फेल होने का उदाहरण
यह प्रकरण इस बात को उजागर करता है कि इस तरह की जो नई समस्याएं सामने आ रही हैं, यद्यपि वे सीमित हैं लेकिन बढ़ती जा रही हैं। यह आधुनिकता का अंग नहीं है बल्कि यह तो आधुनिकता के फेल हो जाने का उदाहरण है। अगर आधुनिकता पूरी तरह से लागू होती तो ये लड़कियां सशक्त होतीं। उनका त्रास आधुनिकता के नाते नहीं है बल्कि आधुनिकता से वंचित रह जाने के कारण है। तो हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि आधुनिकता इसके लिए दोषी है। इससे यह संदेश मिलता है कि हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी जो आधुनिकता है वह सर्वागीण हो और संस्थापित हो। उसके लिए नए-नए जो संस्थात्मक पण्रालियां हैं, उनको हम सार्थक ढंग से आगे बढ़ाएं और लागू करें। अगर विश्वव्यापी दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमें परिवार को लेकर पुरातन और आधुनिक दोनों प्रक्रियाएं दिखाई पड़ती हैं। एक तरफ इसमें बिखराव भी दिखाई पड़ता है, नए मूल्यों का उजागर होना भी दिखाई पड़ता है, जिसका यौन विचारधारा से सम्बंध है। इसमें बिना शादी किए साथ रहना भी संस्थात्मक दृष्टि से स्वीकार्य है। बहुत से देशों में भारतवर्ष समेत इसे वैधानिक रूप दे दिया गया है। एक तरफ तो यह दिखाई पड़ता है कि स्त्री और पुरुष के अधिकारों और जिम्मेदारियों की जो परिभाषा थी उसमें भी बदलाव आ रहा है और एक नया आयाम धीरे-धीरे उभर रहा है। दूसरी तरफ विकसित देशों में अब भी परिवार कायम हैं। भारतवर्ष में तो हम अभी भी परम्परा से काफी हद तक जुड़े हुए हैं क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वह बदलाव अभी नहीं आ पाया है जिसे आधुनिकीकरण की समग्र शक्तियां उजागर हो सकें। आज भी हम कृषि प्रधान देश हैं, अब भी हमारे यहां बहुत बड़ी संख्या शिक्षा से वंचित है। अब भी अशिक्षित लोगों में स्त्रियों की संख्या बच्चों से ज्यादा है। अब भी हम कृषि प्रधान देश हैं। अब भी हम नवीनतम तकनीकों को पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर पाए हैं।
अभी आनी है आधुनिकता की बड़ी प्रक्रिया
हमारे देश में बहुसंख्यक आबादी आर्थिक दृष्टि से अत्यंत निर्बल है, तो आर्थिक आधुनिकता यहां पूरी तरह नहीं आ पाई है। आर्थिक आधुनिकता एक आधार होता है जिससे दूसरी किस्म की आधुनिकता उभरती है। शिक्षा और अर्थव्यवस्था इसके दो अंग हैं। हालांकि आंकड़े आ रहे हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं तो अगले दस वर्षो में एक बहुत बड़ी आधुनिकता की प्रक्रिया यहां कदम रखेगी। उसके साथ-साथ हमें इस बात का भी ध्यान रखना है कि परिवार से संबंधित जो हमारे मूल्य हैं, जिसमें मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी। स्त्री-पुरु ष के बीच लैंगिक भेदभाव के प्रति हमारा नजरिया और रवैया, साथ ही साथ एक दूसरे के दु:ख-सुख बांटने की प्रक्रिया में किस प्रकार बदलाव आया है। यदि समग्र रूप से देखा जाए जो अध्ययन हुए हैं, उनमें युवा वगरे के मूल्य अब भी वे पुरानी जिम्मेदारियां हैं जो परम्परागत मूल्य हैं उसे वे खारिज नहीं करते। किसी मजबूरी के नाते उसे वे नहीं कर पाएं, यह दूसरी बात है। लेकिन मूल्य के आधार पर व अब भी जुड़े हैं। अब भी लोग शहरों से जाकर अपने गांव में अपने त्योहार परम्पराओं और जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। तो जाहिर है कि एक ओर तो आधुनिकता आ रही है जबकि दूसरी तरफ लोग अपने परम्परागत मूल्यों को भी नहीं भूले हैं। अब तो परम्पराएं गांवों से निकलकर शहरों में आ रही हैं। आधुनिकता और परम्परा की दोनों प्रक्रियाएं आज साथ-साथ उजागर हो रही हैं। कुल मिलाकर नोएडा की घटना से सबक मिलता है कि जब आधुनिकता की प्रक्रिया बढ़ती है तो उसमें मैलएडोप्टेशन यानी उनके साथ सामंजस्य स्थापित न कर पाने की कमी स्वाभाविक है जो कुछ केसेस और घटनाओं में आगे भी आएगी। ये एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है लेकिन यह होती है। ऐसी प्रक्रियाएं तभी रोकी जा सकती हैं जब उसकी संस्थागत जवाबदेही निर्धारित हो। इसलिए हमें ऐसी संस्थाएं बनानी चाहिए जो ऐसी घटनाओं पर नजर रखें और उन्हें रोकने में सहयोग दे। (योगेन्द्र सिंह से शशिभूषण कुमार की बातचीत पर आधारित)


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