Thursday, April 28, 2011

महानगरीय जीवन की अनिवार्य नियति नहीं


जिस बीमारी को हम अवसाद कहते हैं उसका मुख्य लक्षण है मन में गहरी निराशा का घर कर जाना। थोड़ी-बहुत निराशा तो सबके अंदर आती है, पर जब कभी हमारी निराशा ऐसे चरण में पहुंच जाती है कि वह लम्बे समय तक जारी रहती है, तो अपनी रुचियों के प्रति, काम-काज एवं सामाजिक व्यवहार के प्रति हमारे अंदर एक अनिच्छा की मनोदशा उत्पन्न होने लगती है। हम किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते, धीरे-धीरे अकेलेपन की तरफ बढ़ने लगते हैं, किसी से बातचीत करने की इच्छा नहीं होती। ये सभी लक्षण किसी व्यक्ति के अवसादग्रस्त होने की तरफ इशारा करते हैं। आगे चलकर ऐसे व्यक्ति के मन में खुद को हानि पहुंचाने की इच्छा उत्पन्न होने लगती है, उसे खाने की इच्छा नहीं होती और धीरे-धीरे वह खाना भी छोड़ देता है। वह अपनी किसी दिनर्चया का पालन नहीं करता और उसके मन में यह विश्वास हो जाता है कि अब कुछ बदलेगा नहीं इसलिए उसकी रही-सही आशा भी टूट जाती है।
हर मानसिक कमजारी अवसाद नहीं
अवसाद यों तो कई प्रकार के हो सकते हैं पर सुविधा के लिए हम उन्हें दो भागों में बांट सकते हैंिरएक्टिव या प्रतिक्रियात्मक अवसाद और एजिटेटिव या उत्तेजनामूलक अवसाद। पहले किस्म के अवसाद में व्यक्ति शांत और सुस्त बैठा रहता है जबकि दूसरे में वह काफी चिड़चिड़ा हो जाता है। कुछ पीड़ित ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें उपयरुक्त में से कोई भी लक्षण न दिखाई दें। आम तौर पर लोग किसी भी तरह की मानसिक कमजोरी को अवसाद समझ लेते हैं पर ध्यान देना चाहिए कि जिस बीमारी में निराशा गहरी उदासी नहीं है वह अवसाद नहीं है। अवसाद चाहे जिस वजह से भी हुआ हो, उसमें व्यक्ति की मनोदशा कुछ अजीब-सी हो जाती है। दो तरह के लोगों के अवसादग्रस्त होने की अधिक सम्भावना हुआ करती है- पहले वे जिन्हें अपने रिश्तों में निराशा का सामना करना पड़ता है, तिरस्कार झेलना पड़ता है और दूसरे वे जिनका आत्मविश्वास कमजोर होता है या वह जल्दी डगमगा जाता है। जो लोग अवसाद में होते हैं अक्सर उनमें आत्मविश्वास की कमी पाई जाती है। हमारी संस्कृति ऐसी रही है कि यहां नकारात्मक भावनाएं सम्प्रेषित नहीं की जातीं। निषेधात्मक तत्वों की प्रभावशाली उपस्थिति की वजह से लोग अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के बजाय खुद को पीड़ा देना शुरू कर देते हैं, आत्मोत्सर्ग को ज्यादा महत्व देते हैं और यह चीज बहुत हद तक उन्हें अवसाद का शिकार बना डालती है। बहुत सारे लोगों की इच्छाएं अलग तरह की होती हैं पर सामाजिक मानदंडों एवं कायदे-कानूनों की वजह से वे उन्हें पूरी नहीं कर पाते। उन्हें इसके लिए जगह नहीं मिलती। ये सभी परिस्थितियां व्यक्ति को अवसाद की तरफ ले जाने का उपयुक्त माहौल तैयार करती हैं।
मिलनसारिता में कमी नहीं है मानसिक बीमारी
अवसाद के बारे में जागरूकता के अभाव में कई प्रकार की भ्रांतियां प्रचलित हो गई हैं। कई लोग यह सोचते हैं कि चूंकि अवसाद का वैज्ञानिक अर्थ मानव-मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन उत्पन्न होना है, इसलिए यह सम्पूर्ण रूप से चिकित्सकीय उपचार का विषय है पर वास्तविकता इससे अलग है। हमारे दैनंदिन व्यवहार में अक्सर हमारे मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन उत्पन्न होते रहते हैं, और हमारे विचार हमारे शरीर पर भी प्रभाव डालते ही हैं। दिक्कत तब होती है जब यह असंतुलन जल्दी समाप्त नहीं होता। आदमी उससे बाहर नहीं निकल पाता। हम देखते हैं कि जिन पत्नियों को अपने परिवार में घुलने-मिलने में दिक्कत आती है उनके बारे में अक्सर यह मान लिया जाता है कि वे मानसिक तौर पर बीमार हैं। पर क्या केवल इसी वजह से हम किसी को मानसिक तौर पर बीमार का दर्जा दे सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं। जब आपके जीवन में कोई ऐसी बड़ी घटना घटती है जो आपके मस्तिष्क पर बहुत गहरा असर छोड़ देती है तो अवसाद के खतरे बढ़ जाते हैं। यह स्थिति किसी भी उम्र में उत्पन्न हो सकती है। अक्सर सम्बंधों में तनाव या दबाव को न झेल पाने की वजह से स्त्री या पुरुष अवसाद का शिकार होते हैं। आम तौर पर यह कोई आनुवांशिक बीमारी नहीं है पर परिस्थितियां भी इनमें एक भूमिका अवश्य निभाती हैं। अगर परिवार में कोई अवसास्त (अवसादग्रस्त) हो तो दूसरों के भी उसके प्रभाव में आने की कुछ तो सम्भावना होती ही है। आज जितनी बड़ी तादाद में हमें अवसाद के मामले देखने या सुनने को मिल रहे हैं उसकी वजह है हमारी जीवनशैली में आया बदलाव।
अवसादग्रस्त व्यक्ति को दें हौसला
अगर किसी के घर में, पास-पड़ोस में कोई अवसाद का शिकार व्यक्ति हो तो उसे हौसला देना चाहिए। एक सकारात्मक तरीके से उसकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए। कभी भी ऐसे लोगों की समस्या को झुठलाने की कोशिश न करें। यह चीज किसी भी अवसास्त व्यक्ति के लिए काफी कष्टदायक बन जाती है। यह सही है कि महानगरीय जीवनशैली में हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं पर इन सबके बावजूद हम एक-दूसरे को समय दे सकते हैं, एक-दूसरे के जीवन में दिलचस्पी ले सकते हैं। इस चीज का आज एक बड़ा अभाव पैदा हुआ है। इसके लिए हम सभ्यता को दोष देकर बच नहीं सकते। हम अपनी आदतों में बदलाव करके ऐसी परिस्थितियों को पैदा होने से रोक सकते हैं।व्यक्तिगत स्तर पर हमारा प्रयास यह हो सकता है कि हम अपनी नकारात्मक भावनाओं को अपने पर हावी न होने दें। अगर हम कभी असफल होते हैं तो उसे महसूस अवश्य करें पर यह न सोचें कि आपके साथ बहुत बुरा हुआ है। परिवार के स्तर पर हम लोगों को समझाने की कोशिश कर सकते हैं। पर हमें उन पर अपनी राय थोपने की कोशिश न करें। उनकी बात ध्यान से सुनें और जरूरत के अनुसार सहयोग दें। सरकार के स्तर पर भी कुछ प्रयास किये जाने की जरूरत है। हमारे देश में एक खास वर्ग के अन्दर ही इन परेशानियों को लेकर जागरूकता है, वरना अधिकतर लोगों में काफी भ्रान्तियाँ हैं। सरकार लोगों को जागरूक बनाने की दिशा में पहल कर सकती है। हमारे देश में सरकारों का सारा ध्यान और सारे संसाधन गरीबी जैसी समस्याओं को दूर करने में लग जाते हैं। उनकी सीमाएँ हैं पर मेरा मानना है कि ये समस्याएँ भी अहम हैं जिन पर प्राथमिकता के साथ ध्यान दिये जाने की जरूरत है।


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