इन दिनों युवाओं में एक अजीब तरह का जुनून दिखता है जिसमें कुछ नया करने की ललक है। हालांकि लोग हमेशा युवाओं को दोष देते हैं। कानफोडू संगीत के शोर में कदम थिरकाते युवाओं को देखकर तो यही लगता है कि आज की पीढ़ी दिशाहीन है। यह अलग बात है कि उंगली हमेशा युवाओं की ओर ही उठती है पर इसका दूसरा पक्ष देखने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि उन पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा। हाल ही कुछ घटनाओं ने मुझे चौंका दिया। मुझे लगता था कि आज के युवा पश्चिमी सभ्यता के मोह में भाग रहे हैं और इन्हें किसी की चिंता नहीं है। ये तो बस शॉर्टकट से किसी भी तरह अपना जीवन काट लेना चाहते हैं। अपने से बड़ों की इज्जत करना तो इन्होंने सीखा ही नहीं और यह भी कि युवा पीढ़ी कुछ भी समझने को तैयार नहीं है। लेकिन कुछ घटनाओं से वाकिफ होने पर लगा कि सचमुच इस पीढ़ी में सोचने-समझने की ताकत है। वह अपनी शक्ति और सोच को बखूबी जानती है। इस पर किसी तरह का लांछन लगाना उचित नहीं। यह पीढ़ी तो भावी भारत को दिशा देने में पूरी तरह से सक्षम है। अहमदाबाद में एक संस्था है बिना मूल्य अमूल्य सेवा, जिसके माध्यम से लोग अपने जीवनसाथी की तलाश करते हैं। अहमदाबाद के महेंद्र भाई रावल की पत्नी का देहांत कुछ समय पहले हो गया था। बाद में जब उन्होंने अपनी बेटी की शादी करनी चाही तो बेटी ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि पहले पिता के लिए जीवनसाथी मिल जाए फिर मैं अपना घर बसाऊंगी। इसी तरह दूसरी घटना है एक अनाथ आश्रम में पले-बढ़े दो युवाओं की जिन्होंने आपसी समझ दिखाते हुए शादी कर ली। इसी तरह की एक और अन्य घटना है अपनी विधवा मां के लिए जीवनसाथी की खोज में जुटे भाई-बहनों की। इस बारे में युवा पुत्र का कहना था कि मां ने केवल सात वर्ष तक ही वैवाहिक जीवन जिया, क्योंकि एक दुर्घटना में पिता की असामयिक मौत हो गई थी। बाद में उनकी मां ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। इसके बाद हमारे लालन-पालन में वह इतनी व्यस्त हो गई कि उन्हें अपने अकेलेपन का अहसास ही नहीं हुआ। बहन की शादी हो गई। मैं नौकरी के लए शहर से दूर हो गया और मां सेवानिवृत्त हो गईं। इस कारण मुझे लगा कि अब मां को एक जीवनसाथी की आवश्यकता है, हालांकि इस उम्र में ऐसा सोचना एक तरह से पाप ही है, लेकिन मेरा मानना है कि मां को अब एक ऐसा साथी मिल ही जाना चाहिए जो उसके सुख-दु:ख में काम आ सके। पीर पराई का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। जिस मैरिज ब्यूरो में बेटे ने मां के लिए जीवनसाथी की खोज का आवेदन दिया, उसी में मां ने अपने बेटे के लिए एक सुशील जीवनसाथी के लिए आवेदन किया। जब यह बात खुली तब मां ने बेटे की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अच्छी बात है कि बेटे ने मेरे लिए कुछ बेहतर सोचने की कोशिश की। पर मैं अपने बारे में तभी कुछ सोचूंगी जब मेरे बेटे का घर संवर जाए। इसे कहते हैं विचारों का बेहतर तालमेल। युवा कुछ नया करने की चाहत में समाज में अपना नया स्थान बना रहे हैं। अक्सर युवाओं से यह शिकायत रहती है कि यह पीढ़ी सुनती नहीं है, लेकिन उपरोक्त घटनाओं को जानकर युवाओं पर इस तरह का आरोप लगाना बेमानी होगा। युवा हमेशा से ही कुछ अलग सोचते हैं पर उनकी सोच को अक्सर दिशा नहीं मिल पाती। इसलिए वे कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे उनकी छवि धूमिल हो जाती है। जिन्हें दिशा मिल जाती है वे नाम पा जाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो इसके पीछे कुछ संस्कार हैं जो अनजाने में युवाओं को माता-पिता से प्राप्त होते हैं। पर अनाथ आश्रम में किस तरह के संस्कार मिलते हैं जो वहां पल-बढ़कर युवा कुछ नया सोच रहे हैं, यह एक शोध का विषय है।
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