नोइडा में दो युवा लड़कियों को लेकर पिछले दिनों जो घटना सामने आई है, उसे कई पहलुओं से समझने की जरूरत है। इसका एक पहलू सामाजिक भी है। मेरा आशय यह कि एक संगठित समाज में कैसे यह सम्भव हुआ कि एक घर में रहने वाली दो लड़कियां स्वयं को सबसे अलगथ लग कर इस हालत में ले गई? आखिर क्या वजहें हो सकती हैं कि वे समाज के साथ जिंदा रहने में कठिनाई महसूस कर रही थीं? क्या उनके कोई पड़ोसी नहीं थे, या उनके जानने वाले नहीं थे जो उन्हें इस सिलसिले में समझाते या उनकी मदद करते। इस पहलू पर गौर करने के लिए यह आवश्यक है कि हम पिछले दो दशकों से समाज में जो परिवर्तन आ रहे हैं, उनका मूल्यांकन करें। प्राय: समाज तब मजबूत होता है जब उसमें समर्थन की पण्राली या प्रक्रिया होती है, जिसके माध्यम से यदि व्यक्ति किसी कठिनाई में हो या किसी पीड़ा का शिकार हो तो वह दूसरों से अपनी बात कह सके। इसमें व्यक्ति अपनी समस्याओं का हल समाज के माध्यम से ढूंढ सकता है। पहले यह प्रक्रिया हमारे यहां पारम्परिक रूप से मजबूत थी और व्यक्ति को ऐसी किसी स्थिति में सबसे बड़ा सहारा या समर्थन पारिवारिक पण्राली से मिलता था। उसके साथ-साथ मित्रों, पड़ोसियों और आसपास के निवासियों से भी व्यक्ति को कमोबेश मदद मिलती रहती थी। तब समाज भी इतना सचेत था कि ऐसी कोई घटना किसी जगह हो रही हो तो लोग उसमें न केवल रुचि रखते थे बल्कि हस्तक्षेप करने की भी कोशिश करते थे। वह एक व्यापक प्रक्रिया थी।
विलगाव से टूटे सरोकार
पहले यदि कोई अपने किसी मित्र के बेटे को शराब पीते या बुरी संगति में देखता था तो अधिकारपूर्वक डांट सकता था। उसके पिता से शिकायत कर सकता था। आज समाज में वह प्रवृत्ति नहीं रही जबकि समय के साथ लोगों में एक दूसरे के प्रति विलगाव बढ़ता गया है। आज हमारे यहां व्यक्तिवाद इतनी तेजी से आया है कि व्यक्ति यह समझने लगा है कि 'हमारा सरोकार सिर्फ ख़्ाुद से है और हमारे आसपास जो भी रहते हैं उनसे हमारा कोई सम्बंध नहीं है।'
लोगों का एक दूसरे की समस्याओं से कोई सरोकार रहा नहीं रह गया है। इससे एक ऐसी सामाजिक परिस्थिति खड़ी हो गई है जिसमें पहले का जो सहयोग वाला ढांचा था और जिसके माध्यम से आदमी अपनी समस्याओं का हल ढूंढ पाता था, लगभग ध्वस्त हो चुका है। इस परिवर्तन का नतीजा यह हुआ है कि व्यक्ति खुद को पूरी तरह से अलग-थलग पाता है। प्रभावस्वरूप अकेलेपन की भावना आती है और व्यक्ति अपने को समाज से काटने की प्रक्रिया में जुट जाता है।
व्यक्तिवाद ने जमाई जड़ें
इस पूरी प्रक्रिया में कई नई चीजें शामिल हो चुकी हैं। एक तो व्यक्तिवाद अपनी जडें़ जमा चुका है, दूसरी आज जिस प्रकार का प्रतियोगी समाज पैदा हुआ है, उसमें लोगों के पास समय नहीं है कि वे दूसरों की चिंताओं को अपनाने की कोशिश करें। तीसरी बात समाज को हम अलग भी कर दें तो सरकार के पास भी ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें समाज के समर्थन ढांचे के खत्म होने के बाद राज्य उस भूमिका को पूरी करे। राज्य से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए पर आज राज्य भी समाज में इस रिक्ति को अपनी भूमिका से पूरी नहीं कर पा रहा है, इसलिए व्यक्ति पृथक है, अकेला है। हालांकि यदि वह चाहता है कि समाज से अपना नाता तोड़ ले तो वह सम्भव है। यही इन दोनों लड़कियों के साथ हुआ।
दूसरों की चिंता से मुक्ति का नतीजा
प्रसंग नोएडा की जिन दो लड़कियों का है, शायद अपने पिता के जीवनकाल में वे समाज से कटी-छंटी नहीं थीं, उनमें एक नौकरी भी करती थी। लेकिन पिता के जाने के बाद यह समाज और उनके परिवार की जिम्मेदारी थी कि उनके अकेलेपन में वे सहारा देते, जो हुआ नहीं। क्योंकि समाज में वह चेतना जो अनिवार्यकर देती है कि हम दूसरों में रुचि रखें, वह धीरे-धीरे खत्म होती गई है। सिर्फ यही नहीं, बल्कि कई सारी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं कि लोग दूसरों में कोई रुचि नहीं रखते। बड़े शहरों में स्थिति ज्यादा खराब है जबकि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में परिस्थिति थोड़ी ठीक है। हालांकि जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ेगा, वहां भी यह प्रक्रिया प्रबल होगी।
सामाजिक दायित्व की भावना आवश्यक
मुझे लगता है कि यह एक सामाजिक समस्या है और सरकार इसका हल इस माध्यम से ढूंढ सकती है कि समाज की कमजोर होती समर्थन पण्राली की जगह राज्य द्वारा स्थापित समर्थन पण्राली पैदा करे। या फिर समाज को यह सोचना पड़ेगा कि उसकी जो परिवर्तन की प्रक्रिया है क्या वह उसे स्वीकार्य है। अगर स्वीकार्य नहीं है तो लोगों को यह सोचना पड़ेगा कि 'हमारा भी समाज में कोई उत्तरदायित्व बनता है।' हमारा यह रवैया कि हमारा खुद से ही सरोकार है, शायद बुनियादी तौर पर गलत है।
मानसिक विकृति भी हो सकती है वजह
मैं समझता हूं कि इसका दूसरा पहलू व्यक्तिगत मानसिक विकृति है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी हमें इस समस्या को देखना चाहिए। क्या वे परिस्थितियां या क्या वे कारण थे कि दो लड़कियों ने अपने को दूसरों से अलग किया। जब कोई व्यक्ति इस किस्म का अतिवादी कदम उठाता है तो उसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। सामान्य प्रक्रिया यह है कि किसी व्यक्ति के पिता की मृत्यु होती है तो वह दस दिन या महीना भर शोक मनाता है। उसके बाद जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। नोएडा की लड़कियों के प्रकरण में घटनाचक्र से लगता है कि कहीं न कहीं इसके लिए इनकी खुद की मानसिक स्थिति भी जिम्मेदार हो सकती है। शायद उनमें इतना आत्मबल नहीं था। इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण यह भी हो सकता है कि उनका अपने पिता से बहुत ज्यादा जुड़ाव रहा हो। शायद वे अपने पिता के मरने के बाद इस वेदना कि 'वह अकेली रह गई हैं' से उबर नहीं पाई। इसका तीव्र अहसास उन्हें तब फिर हुआ जब उसका भाई शादी कर अलग रहने लगा। उसके बाद ये लड़कियां पूरी तरह से टूट गई।
अति जुड़ाव का दंश
अपने किसी रिश्तेदार से बहुत अधिक जुड़ाव भी एक किस्म की मानसिक विकृति की श्रेणी में आती है। कुछ दिन पहले यूरोप में एक ऐसा ही केस आया था जब किसी बाप ने अपनी बेटी को बीस साल तक तहखाने में बंद रखा। कई केसेस आते हैं कि अपने प्रियजन की मृत्यु के बाद लोग उसके शव को दफनाने या जलाने के बजाय घर में रखे रहते हैं। यह एक किस्म की मनोविकृति है और हो सकता है कि ये लड़कियां भी इसी मनोविकृति की शिकार हो गई हों। यह एक मानसिक समस्या है और इसका समाज से •यादा ताल्लुक़ नहीं है। हालांकि यह उनके परिवार और पालन पोषण की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि उनको कमरा तोड़ कर बाहर नहीं निकाला जाता तो शायद दोनों ही मर जातीं। हालांकि एक की बाद में मौत हो गई। इसका तीसरा पहलू यह है जिसकी तरफ इशारा दिलाना मैं जरूरी समझता हूं। अगर हम मान लें कि यह सारी प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक कारणों से पैदा हुई। हम मान लें कि उनके अलगथ लग होने की एक प्रमुख वजह ये भी रही होगी कि उनको सामाजिक समर्थन के ढांचे उपलब्ध नहीं थे तो महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आज हमारे समाज में इतना विलगाव पैदा हो गया है जिसके कारण संवेदनशीलता इतनी खत्म हो गई है कि हम सामूहिक समाज की तरह रह सकें। मैं समझता हूं कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है कि जब तक समाज अपने उत्तरदायित्व को नहीं समझता, ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी। समाज तो आखिरकार हम सब लोगों को मिलाकर ही बनता है, इसलिए हर एक को अपने उत्तरदायित्व को समझना चाहिए। हम जहां, जिस समाज, जिस मोहल्ले में रहते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी बनती है कि कुछ हम उसे भी दें। यह प्रक्रिया हालांकि हमारे समाज में हमेशा से कमजोर थी, लेकिन पिछले 20-25 सालों में तेजी से कमजोर हुई है। (इम्तियाज अहमद से शशि भूषण कुमार की बातचीत पर आधारित)
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