Monday, April 25, 2011

सर्कस में गुम होता बचपन


सर्कस में बालश्रम पर लेखक की टिप्पणी
सर्कस में बच्चों के काम करने पर रोक लगाने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सराहनीय है। भारत में बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे काम कर रहे हैं, जो उनके लिए खतरनाक हैं। बच्चों को नादान उम्र में ही आय का श्चोत बनाकर काम पर लगा देने से उनके बाल अधिकारों का हनन तो होता ही है, वे शिक्षा से भी वंचित हो जाते हैं। जबकि बच्चों को शिक्षा से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत उन्हें मिले मौलिक अधिकारों का हनन है। यह स्थिति उन्हें खेलने, अपने ढंग से सोचने और मर्जी का काम करने की स्वंतत्रता से भी बाधित करती है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह देशभर में सर्कस कंपनियों पर छापे डालकर उनमें कार्यरत मनोरंजन का साधन बने बच्चों को छुड़ाए। अदालत ने कहा है कि सर्कस में बच्चों की जान जोखिम में डालकर उनसे काम कराया जाता है। इन करतबों की ट्रेनिंग के दौरान बच्चों के साथ जोर जबरदस्ती भी की जाती है। इसलिए मानवीयता का तकाजा है कि तमाशे से मुक्ति दिलाकर उन्हें मौलिक आधिकारों से जोड़ा जाए। गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर जिंदगी का प्रलोभन देकर और आमदानी का जरिया बना देने का भरोसा दिलाकर बच्चों को सर्कस और इस प्रकार के अन्य खतरनाक कार्यो में लगा दिया जाता है। सर्कसों के लिए नेपाल से भी तस्करी कर बच्चे लाए जा रहे हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन भी बच्चों के क्रय-विक्रय से जुडे़ पाए गए हैं। ये मोटी रकम में बच्चों को सर्कस, खतरनाक उद्योगों और अवैध कारोबारियों को बेच देते हैं। यहां इन से बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता हैं। महाराष्ट्र उच्च न्यायालय में एक एनजीओ के खिलाफ गरीब बच्चों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा मामला विचाराधीन है। इससे यह सवाल भी खड़ा होता हैं कि कुकुरमुत्तों की तरह बाल अधिकार संरक्षण के लिए उग आए एनजीओ वाकई में किसके हित साधने में लगे हैं। सर्कस और उद्योगों में कार्यरत बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामले भी सामने आ रहे हैं। इसलिए अदालत ने बच्चों को सर्कसों के जंजाल से मुक्त कराने का आदेश देने के साथ ही उचित पुनर्वास की भी हिदायत दी है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय बच्चों के शारीरिक, मानसिक और यौनाचार से जुड़े मामलों पर नजर रखता है। बाल संरक्षण गृह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वजूद में लाए गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे ये महकमे भी बच्चों को अत्याचार और यौन शोषण से मुक्ति नहीं दिला पा रहे हैं। जबकि लिप्त पाए जाने वाले अधिकारी व कर्मचारी साफ बच निकलते हैं। बाल संरक्षण व बाल सेहत से जुड़े ऐसे विभाग ही अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन नहीं कर रहे तो अन्य विभागों से इनके सुरक्षित भविष्य की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है लेकिन जब देश का भविष्य ही भ्रष्टाचार की चौखट पर दम तोड़ रहा हो तो आशा और उम्मीद की किरण कहां से प्रकट हो? सर्कस में भी इन बच्चों को तब तक रखा जाता है जब तक इनके शरीर में लचीलापन बना रहता है। इसी लोच की नजाकत इन्हें करतब से जोड़ती है। उम्र बढ़ने के साथ जब शरीर में लोच समाप्त हो जाती है तो शरीर करतब दिखाने लायक नहीं रह जाता और बच्चों को नौकरी से निकाल दिया जाता है। ऐसे में परिवार से पहले ही बिछड़ चुके इन बच्चों की हालत बद से बदतर हो जाती है। चूंकि अन्य किसी काम में वे पांरगत नहीं होते इसलिए इनके सामने दो ही रास्ते बचे रहते हैं, भीख मांग कर गुजारा करें या अपराधी गिराह के हत्थे चढ़ जाएं। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को केंद्र सरकार को बेहद गंभीरता से लेने की जरूरत हैं। गरीब बच्चों की आशा इसी आदेश से बंधी है।

No comments:

Post a Comment