Thursday, April 28, 2011

सामूहिकता में करें जिंदगी के अर्थ की तलाश


पहले हमारे संयुक्त परिवार हुआ करते थे, आपसी मेल-जोल होता था, सहभागिता वाली एक सामाजिक व्यवस्था हुआ करती थी जिससे काफी फायदा मिलता था। अकेलेपन की कोई जगह नहीं थी। लोग एकदू सरे का हाल-चाल लेते रहते थे। संयक्त परिवार के टूटने और पति-पत्नी के कामकाजी होने से ज्यादा मुश्किल खड़ी हुई है। मां-बाप बच्चों को सप्ताहांत में ही दिखाई देते हैं। जीवनशैली पूरी तरह से बदल गई है। नोएडा की घटना यह दर्शाती है कि यह हममें से किसी के भी घर में हो सकता है। लोगों ने सोच लिया कि यह उनका स्वभाव है। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोग जागरूक नहीं हैं। जब तक मां-बाप जिंदा रहे उनकी परेशानी दबी रही। उनके जाने के बाद भाई अपनी बहनों की स्थिति से अनजान रहा। यही वह परिस्थिति थी जिसकी वजह से दोनों बहनें मानसिक कमजोरी का शिकार हो गई। इस दशा में शुरुआती लक्षण के साथ ही उपचार की जरूरत होती है पर इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा सका।
किसी मकसद से जोड़ना हो सकता है इलाज
अवसाद के कई कारण हो सकते हैं पर क्लिनिकल अवसाद का कारण तो मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन होने को ही माना जाता है। मानसिक आघात आदि में जो अवसाद उत्पन्न होते हैं उनमें यदि दो-चार सप्ताह में ही मदद न मिले, सपोर्ट सिस्टम मजबूत न हो, कोई ध्यान न दे तो हालात खराब हो जाते हैं। कुछ आघात तो इतने सख्त होते हैं कि लोग उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाते। अकेलापन भी कई बार अवसाद की वजह बन जाता है। आज हम निजी जिंदगी में सिमटते जा रहे हैं, महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पातीं। बढ़ती उम्र में जब महिलाओं के पास समय होता है तो उन्हें यह अहसास होता है कि उन्होंने अपने लिये तो कुछ किया ही नहीं। इससे उनके अवसाद में जाने का खतरा बढ़ता है। महानगरीय जीवन की भागमभाग में अकेले पड़ जाना बहुत असामान्य बात नहीं है, पर हम किसी मकसद के साथ या किसी संगठन के साथ खुद को जोड़े रखकर इस परिस्थिति से बच सकते हैं। अवसाद जैविक कारणों से हुआ हो तब भी पीड़ित को चिकित्सकीय उपचारों के साथ अन्य सहायता भी उपलब्ध करानी चाहिए। आजकल बच्चों और महिलाओं में अवसाद की घटनाएं बढ़ी हैं। बच्चों में परीक्षाएं, प्रतिस्पर्धा आदि इसके लिए माहौल तैयार करती हैं। महिलाओं में चूंकि संवेदनशीलता ज्यादा होती है और वे खुद को अभिव्यक्त भी ज्यादा कर पाती हैं पर जब ऐसा नहीं हो पाता तो इससे मुश्किल स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पुरुषों में अभिव्यक्ति का अभाव होता है, जब वे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते तो उन्हें अवसाद होता है। मूल रूप से अवसाद का जो सबसे प्रमुख कारक है वह है आत्म-गौरव की कमी या आंतरिक आघात। जीवन-चक्र में बदलाव भी इसका एक बड़ा कारक है। हम अपनी जिंदगी में किसी खास चीज के पीछे भागते हैं। बच्चे घर में लौटते हैं तो घर मे नाना-नानी, दादा-दादी नहीं होते। मां-बाप अकेले हैं। ऐसा कोई मौजूद नहीं होता जिनके साथ वे अपनी भावनाएं साझा कर सकें। धीरे-धीरे उन्हें अकेले रहने की आदत हो जाती है। आगे चल कर यह अवसाद का कारण बन जाता है।
नकल की फेर ने बढ़ाई समस्या
आज जैसे-जैसे पश्चिमीकरण में तेजी आ रही है, जिंदगी में भूमिकाओं को लेकर एक विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। हम एक ऐसी 'सैंडविच जेनरेशन' हैं जिनके लिए सब कुछ या तो बदल चुका है या बदलने वाला है। हम अपनी जिंदगी में वैसे ही रह पाते हैं जैसे कि हम पले-बढ़े हैं पर दूसरों की नकल के फेर में पड़कर हम अच्छे-बुरे का फर्क तक भूलते जा रहे हैं। समाज का इकट्ठापन समाप्त हुआ है और सामूहिकता की भावना भी कमजोर पड़ चुकी है। अवसाद के बढ़ते मामलों की पृष्ठभूमि में सबसे महत्वपूर्ण कारक भी यही है। मैं यह नहीं कहता कि हम नएपन को न अपनाएं पर हम इसके चक्रव्यूह में न फंसें और और न ही खुद को खोएं। पूरी दुनिया आज एक इल्यूजन के पीछे भाग रही है। कुछ लोग लैंगिक भेदभाव को भी अवसाद की वजह मानते हैं पर मुझे ऐसा नहीं लगता। इस सम्बंध में जो आंकड़े भी उपलब्ध हैं वे भ्रमित करने वाले ही हैं। एक स्त्री भेदभाव का शिकार भी हो सकती है और मौका मिले तो वह 'झांसी की रानी' भी बन सकती है। मुक्त बाजार वाली नई विश्व व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के बढ़ने से बड़ी कम्पनियों या संस्थानों में अपने कामगारों से ज्यादा काम लेने के रुझान बढ़े हैं जिसकी वजह से लोगों पर दबाव बढ़ गया है और वे अधिकांश वक्त में तनाव में रहने लगे हैं। ऐसे संस्थानों की नीतियां अधिक मानसिक दबाव या असंतोष उत्पन्न कर सकती हैं। हम चाहें तो इसे भी एक किस्म के अवसाद की श्रेणी में रख सकते हैं।
अशांति से अवसाद का खतरा अधिक
मेरे विचार से जिन लोगों के परिवार में अशांति रहती है, जिनका जीवन व्यवस्थित नहीं है वैसे लोग अवसाद के आसान शिकार बनने की ज्यादा सम्भावना रखते हैं। इसलिए अगर आपको कोई चीज परेशान कर रही हो तो इसे छिपाएं नहीं, किसी सही व्यक्ति के साथ बांटने की कोशिश करें। बंद कमरे में खिड़की खोलने से जिस प्रकार ताजा हवा आती है और घुटन बाहर निकल जाती है उसी तरह किसी सही व्यक्ति का साथ मिले तो हम अपनी परेशानियों को कम कर सकते हैं। जिंदगी में किसी अच्छे मकसद से जुड़कर, किसी सामूहिक भागीदारी वाले कार्य-कलाप में शामिल होकर हम अपनी जिंदगी को मायने दे सकते हैं। इससे हमारा अकेलापन हमसे दूर रहता है। हमें अपने से अलग लोगों के लिए, समाज के लिए कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए जो हमारी जिंदगी को एक सार्थकता का अहसास कराए। पेंटिंग, गायन, संगीत आदि के अलावा रीडर्स क्लब आदि भी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अपने आपको अहमियत देना भी बहुत जरूरी है। इन सबके बावजूद यदि कभी मानसिक कमजोरी के लक्षण महसूस हों तो हमें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। संकोच को पूरी तरह त्याग कर समय पर उपचार और काउंसिलिंग लेकर हम निश्चित रूप से खुद को उस किस्म के अवसाद से बचा सकते हैं जो आगे चल कर जानलेवा भी हो सकता है। हालात अक्सर इस संकट को बढ़ा देते हैं। समाज को इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है कि अवसाद एक सामान्य बात है पर अगर यह महीने भर तक जारी रहे तो इसकी अवहेलना करना नुकसानदेह हो सकता है।


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