हमारा समाज जैसे-जैसे आधुनिक हुआ वैसे-वैसे उसमें आधुनिकता के दोष भी उत्पन्न हुए। बीते दो दशकों के दौरान मुल्क में बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हुई है। आए-दिन मासूम बच्चों के यौन शोषण की खबरें मीडिया में छाई रहती हैं। घर से लेकर स्कूल या फिर कार्यस्थल कहीं भी बच्चे महफूज नहीं हैं। यहां तक कि बाल सुधार गृहों में भी उनके यौन शोषण की खबरें आम बात हैं। भूमंडलीकरण, उदारीकरण के बाद हुए उपभोक्तावाद के हमले और सेटेलाईट टीवी चैनलों की बाढ़, मोबाइल, व इंटरनेट क्रांति ने इन अपराधों को फैलाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। हालांकि बाल यौन शोषण को रोकने के लिए हमारे यहां पहले से ही कई कानून मौजूद हैं, लेकिन फिर भी अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह कानून नाकाफी ही साबित हुए हैं। कमजोर कानून और पुलिस की चिर-परिचित उदासीनता के चलते अपराधी अक्सर बच निकलते हैं और बच्चों का शोषण किसी न किसी रूप में जारी रहता है। जाहिर है इसे रोकने के लिए गंभीर कदम उठाने की आवश्यकता है। बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों और यौन शोषण पर अंकुश लगाने के लिए हमारे यहां एक सख्त कानून की जरूरत बरसों से महसूस की जा रही है। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा हाल ही में बाल यौन शोषण निरोधक विधेयक की मंजूरी बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रस्तावित विधेयक में ऐसे अपराधों को अंजाम देने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। यहां तक कि अपराधियों को उम्र कैद की सजा तक दिया जा सकता है। विधेयक में बच्चों से दुष्कर्म के मामलों को तीन अलग-अलग वगरें में बांटा गया है। जिसमें क्रमश: पांच, सात और दस साल की कैद का प्रावधान है। सबसे संगीन अपराधों में सजा को उम्र कैद तक बढ़ाया जा सकता है। प्रस्तावित कानून में कुल नौ अध्याय और 44 धाराएं हैं। यह कानून कुछ इस तरह से बनाया गया है कि इसमें सभी तरह के बाल यौन शोषण के अपराधों को शामिल किया जा सके। बच्चों के यौन शोषण की सबसे ज्यादा घटनाएं घर, स्कूल, अस्पताल, बाल सुधार गृह और पुलिस थानों में होती हैं। इसके अलावा घर के बाहर जो बच्चे काम करते हैं, वे अक्सर अपने नियोक्ताओं के द्वारा यौन शोषण के शिकार होते हैं। अनेक अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाली ज्यादातर बच्चियां अपने मालिक की हवस का शिकार होती हैं। इसी तरह होटल, ढाबों, मोटर गैराज, चाय की दुकानों, कारखानों, ईट भट्टों जैसे जगहों में काम करने वाले लड़कों के साथ भी अप्राकृतिक दुष्कर्म होने की घटनाएं आम बात है। हाल के कुछ सालों में बच्चों की चोरी या तस्करी की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं। हर साल जारी होने वाली ऐन रिसर्च ऑन ट्रैफिकिंग इन वूमेन एंड चिल्ड्रेन रिपोर्ट बताती है कि अगवा अथवा अपहरण किए गए बच्चों को भीख मांगने के काम और सेक्स टूरिज्म अथवा अश्लील फिल्मों के घिनौने कारोबार में धकेल दिया जाता है। जाहिर है प्रस्तावित विधेयक में इन सभी तमाम पहलुओं पर न सिर्फ संजीदगी से विचार किया गया, बल्कि आरोपियों को सख्त सजा का भी प्रावधान किया गया है। ताकि भविष्य में कोई भी अपराध करने से पहले दस बार सोचे। अक्सर देखने में आता है कि बच्चों का सबसे ज्यादा यौन शोषण उनके संरक्षण का दायित्व निभाने वाले अभिभावक, सुरक्षा बल के सदस्य, पुलिस अधिकारी, लोक सेवक, बालसुधार गृह, अस्पताल या शैक्षणिक संस्थान के कर्मचारियों आदि के द्वारा किया जाता है। प्रस्तावित कानून में इन लोगों द्वारा बच्चों पर किए गए अपराध को सबसे ज्यादा संगीन अपराध माना है और इस संगीन अपराध की सजा उम्रकैद तक हो सकती है। जाहिर है विधेयक के मार्फत सरकार का इरादा उस पूरे परिवेश को बच्चों के परिवेश संवेदनशील बनाने का है जहां बच्चों को कायदे से सबसे ज्यादा सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। बहुत सारे मामलों में बच्चे डर के मारे इन दुष्कृत्यों को उजागर ही नहीं करते। वहीं जिन मामलों में उनके मां-बाप कानून की मदद लेना चाहते हैं उनमें भी गुनहगार को कड़ी सजा नहीं मिल पाती। ऐसे में अपराधियों के हौसले और भी बुलंद होते हैं। दरअसल ठीक तरह से सबूत पेश नहीं करने के चलते अकसर अपराधी बच निकलते हैं। कई मामलों में मां-बाप ही अपने खानदान की इज्जत को ध्यान में रखते हुए बच्चों पर मुंह न खोलने का दबाव बनाते हैं। स्कूलों में बच्चियों के साथ शिक्षकों के यौन दुर्व्यवहार की शिकायतें मिलने पर स्कूल प्रशासन तो उस पर पर्दा डालता ही है, मां-बाप भी चुप्पी साध जाते हैं। इसी तरह घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाली लड़कियां अपने मालिकों के यौन शोषण को इसलिए सहन कर जाती हैं कि उनके सामने अपना और अपने परिवार का पेट पालने की मजबूरी होती है। जाहिर है यह कुछ वजहें हैं, जिनके चलते बच्चों का यौन शोषण बदस्तूर जारी रहता है। सरकार ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े अभी तक के तमाम अध्ययनों को मद्देनजर रखते हुए ऐसे सख्त कानून की पहल नए विधेयक के जरिये की है जिसमें कोई भी अपराधी कानून से बच न पाए। प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक बच्चों के यौन शोषण, उत्पीड़न, बच्चों की पोर्नोग्राफी और बच्चों से जुड़ी पोर्नोग्राफी सामग्री रखने जैसे मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतें गठित की जाएंगी। बाल मजदूरी और सेक्स कारोबारियों से मुक्त बच्चों का उचित पुर्नस्थापन किया जाएगा। बहरहाल बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए हमेशा कड़े कानून की बात की जाती है, लेकिन जब इन पर अमल करने की बात आती है तो ठोस तौर पर कोई भी कार्रवाई नहीं हो पाती है। केंद्र सरकार बच्चों की सुरक्षा को लेकर इससे पहले भी वर्ष 2000 में जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट यानी केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन कानून लाई थी, लेकिन एक दशक गुजर जाने के बावजूद ज्यादातर राज्यों ने इन पर अमल ही नहीं किया है। जिन सूबों में बोर्ड बने भी हैं तो वहां बच्चों की सुरक्षा की दिशा में कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है। मुल्क में इस वक्त शायद ही ऐसा कोई राज्य हो जहां मुताल्लिक दफाओं के तहत एक साथ बाल अपराध न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति कायम हुई हो। इतना ही नहीं बच्चों की स्मगलिंग और सेक्स टूरिज्म के प्रभावितों को इस खौफनाक जाल से निकालने के लिए एक स्पेशल पुलिस फोर्स कायम करने की जरूरत भी वर्षो से महसूस की जा रही है, लेकिन इस दिशा में किसी तरह की व्यवस्था अमल में नहीं आ पा रही है। केंद्र सरकार महज कागजों पर खाका तैयार करके बाल यौन शोषण से छुटकारा नहीं पा सकती। इसके लिए संबंधित कायदे-कानून को सख्त बनाए जाने और उनको असरदार तरीके से लागू करने की जरूरत है। तभी हमारे नौनिहाल महफूज रहेगें। प्रस्तावित कानून के संदर्भ में जन-जागरूकता की एक बड़ी मुहिम भी जरूरी है। सिर्फ कानून बना देने भर से अपराध नहीं रुक जाते, बल्कि उन कानूनों को अच्छी तरह से जानना और उनका सही इस्तेमाल करना भी जरूरी होता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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