क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं भारतवासी किस काम के लिए इतना बढ़-चढ़कर चंदा देंगे कि दो घंटों में ही दो सौ करोड़ की नकद और सोने के रूप में संपत्ति जमा हो जाए? इतना ही नहीं, इसके बाद भी हर रोज चेक और ड्राफ्ट के रूप में एक लाख रुपये से अधिक की रकम पहुंचने लगे? अधिकतर लोग समझ जाएंगे, क्योंकि वे अपने लोगों की प्रवृत्ति से वाकिफ होंगे या खुद भी वैसे होंगे। समाचार मिला है कि मथुरा में 108 एकड़ भूमि में प्रस्तावित श्रीश्री वृंदावन धाम मंदिर के लिए मानों धन की वर्षा हो रही है। वृंदावन के चौमुहा में 23 से 25 जनवरी के बीच एक यज्ञ का आयोजन हुआ था, जिसमें आयोजकों ने एक भव्य मंदिर का प्रस्ताव रखा था, जिसकी अनुमानित लागत करीब पांच सौ करोड़ बताई गई। समारोह में उपस्थित भक्तों ने अपनी तिजोरी और जेबें खाली करनी शुरू कर दीं तथा महिलाओं ने अपने शरीर पर पहने आभूषणों को दानपात्र में डालना शुरू कर दिया। बताया गया की दो घंटों में दो सौ करोड़ रुपये का चंदा एकत्र हो गया और अब भी इंटरनेट, ड्राफ्ट-चेक से लगभग हर रोज एक लाख से ऊपर धन एकत्र हो रहा है। मध्य फरवरी तक लगभग 20 लाख इस तरह आ चुका है। सवाल उठता है कि अपनी जेबें तक खाली कर देने वाले इन्हीं दानदाताओं से यदि स्कूल, अस्पताल या अन्य कोई आपदा के लिए दान मांगा जाता तो क्या वे इतनी आसानी से और इतनी कीमत वाले दान देते? मानवीय आधार पर तो लोग कभी इतनी बड़ी रकम दान में नहीं देते, लेकिन आस्था के नाम पर दान देने में कोई गुरेज नहीं, न कोई शक या सवाल! यह स्थिति तब है, जब पहले से ही देशभर में मंदिरों की कमी नहीं है। शायद जमीन कब्जा करने का यह सबसे बड़ा और प्रचलित माध्यम बन गया है कि वहां किसी संप्रदाय का प्रार्थना स्थल बना दिया जाए। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लॉनिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (न्यूपा) की 2009-10 कि रिपोर्ट हाल में आई है। इसके अनुसार देश में प्रति दस किलोमीटर पर कक्षा 1 से 8वीं तक के स्कूलों की संख्या दो है और प्रति दस किलोमीटर पर धर्मस्थलों की संख्या करीब 14, जिसमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघर आदि हंै। शिक्षा के अधिकार के तहत प्राइमरी स्कूल एक किलोमीटर के दायरे में होना चाहिए यानी दस किलोमीटर में दस स्कूल होने चाहिए। सर्वे के मुताबिक 2009 में प्राइमरी व मिडिल स्कूलों की संख्या 13 लाख थी, जबकि 2001 के आंकड़ों के मुताबिक धार्मिक केंद्रों की संख्या 25 लाख थी, जो 2009 तक काफी बढ़ गई होगी। इसके साथ ही गली-मोहल्लों के कई केंद्रों की गणना नहीं हो पाई होगी, क्योंकि स्कूलों की कुछ औपचारिकताएं होती हैं। इसलिए उनकी गणना फिर भी ठीक से हो सकती है, लेकिन छोटे-मोटे धार्मिक स्थल हर गली-कूचे में मिल जाएंगे, जो कहीं पंजीकृत नहीं होते। अधिकतर धार्मिक केंद्रों पर आने वाले चढ़ावे या दान में मिली संपत्ति का कोई ब्यौरा नहीं होता है, लेकिन जितना होता है, उससे उस क्षेत्र की अथाह धन-संपत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। मसलन, शिरडी के साई बाबा की संपत्ति अरबों में आंकी गई है। मंदिर की तरफ से संपत्ति का जो आंकड़ा पेश किया गया है, वह है 32 करोड़ मूल्य के आभूषण तथा चार अरब से अधिक का निवेश। यह वह है, जो आधिकारिक दस्तावेज में सामने आया है। आंध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् के पास आठ हजार किलो तक के कीमती जवाहरात हैं, जिसकी कीमत 52 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। केरल के गुरुवायुर मंदिर में 400 किलोग्राम के जेवरात तथा 400 करोड़ का बैंक डिपॉजिट, 50 लाख तक के इंश्योरेंस प्रीमियम सालाना है। अय्यप्पा सबरीमाला मंदिर में तो सिर्फ दो महीने की अवधि में 150 करोड़ रुपये की आय हो जाती है। गुजरात स्थित अम्बाजी शक्तिपीठ यात्रा धाम के लिए 1.23 अरब का बीमा कवच है, जिसका प्रीमियम करीब 2.73 लाख रुपये सालाना चुकाया जाता है। यह आतंकी हमलों के संदेह के हिसाब से लिया गया है। दान स्वरूप आई इस अकूत संपदा पर एक तो सरकार को टैक्स नहीं दिया जाता, दूसरे सरकार को ही जनता से मिले टैक्स में से इन धर्म केंद्रों के इर्दगिर्द कुछ सुविधाएं देनी होती हैं। तीर्थयात्री जब किसी हादसे के शिकार होते हैं तो धर्म केंद्र के प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, न ही उसके अधिकारियों को या मालिकों को सजा मिलती है। इसकी अपेक्षा सरकार से की जाती है और सरकारें भी प्रबंधन से न तो टैक्स वसूलने में सख्ती करती हैं और न ही प्रबंधन को जवाबदेह बनाने के लिए सख्त नियम-कानून बनाती हैं। उन्हें वोटबैंक खिसकने का डर लगा रहता है। गत वर्ष सबरीमाला हादसे के संदर्भ में कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए उसने क्या किया है। केरल सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि आगे ऐसे हादसे न हों, इसके लिए वह एक कार्ययोजना तैयार कर रहा है, जिसके तहत नीलाक्कल आधार शिविर विकसित किया जाएगा और कई अन्य उपाय भी सरकार करेगी। किसी ने मंदिर प्रबंधन के खिलाफ इस अव्यवस्था और हादसे के लिए कोई केस दायर नहीं किया है। इलाहाबाद में 2012-13 में होने वाले महाकुंभ मेले के लिए यात्रियों को सुविधा मुहैया कराने तथा मेला प्रबंधन पर होने वोले खर्च के लिए इलाहाबाद के जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश सरकार से 20.76 अरब रुपये का बजट दिया है। राज्य सरकार ने इस राशि को विशेष अनुदान के रूप में केंद्र सरकार से मांगा है, जिसे केंद्र सरकार ने मना नहीं किया है, बल्कि प्रस्तावित कार्यो का ब्यौरा मांगा है तथा वास्तविक खर्च बताने को कहा है। यह ब्यौरा पहली फरवरी तक दिया जाने वाला था। राज्य के अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि 2001 के कुंभ मेले में करीब 100 करोड़ का खर्च तथा 2007 के अर्धकुंभ मेले का खर्च 150 करोड़ आया था, जो सिर्फ बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने पर खर्च हुआ था। इसी तरह हज यात्रा पर मुस्लिम समुदाय को या मानसरोवर यात्रा पर हिंदू समुदाय तथा पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा जाने के लिए भी सरकार सब्सिडी उपलब्ध कराती है, जबकि यह लोगों की अपनी आस्था के अनुरूप उनकी निजी जरूरत है, जो उनके अपने कथित पापों से मुक्ति या स्वर्ग की मान्यता से जुड़ी होती है। किसी भी सरकार के खजाने में रुपये उसकी अपनी जेब के नहीं होते हंै। वह आम लोगों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में वसूला जाता है। हमारे देश में अप्रत्यक्ष कर के रूप में ठीक से कर वसूल हो पाता है, क्योंकि यह हर वस्तु खरीदने में अमीर-गरीब सभी को उस सामान के बदले देना होता है, जबकि प्रत्यक्ष कर की चोरी एक बड़ी समस्या है। खासतौर से अमीर तथा मध्यवर्ग कर चोरी अधिक करता है। सहज कल्पना की जा सकती है कि ढेरों धर्मस्थलों पर होने वाले आय को यदि जनहित के काम लगाया जाता तथा सरकारी खजाने की राशि लोगों की धार्मिक आस्था को पूरा करने पर खर्च न होकर उसे बुनियादी सुविधाएं जिसमें स्कूल, अस्पताल आदि पर लगाया जाता तो अधिक लोगों का भला हो पाता। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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