Monday, March 7, 2011

दलितों की सवर्ण जाति चेतना


लखनऊ में पिछले दिनों एक विजातीय विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह की विशेष बात यह थी कि इसे आर्यसमाज मंदिर में पुलिस ने सम्पन्न कराया। पुलिस आम तौर पर विवाहेच्छुक प्रेमी जोड़ों को लग्न मंडप में नहीं बिठाती मगर इस मामले में उसे ऐसा करना पड़ा। यह दीगर बात है कि पुलिस ने घरात-बरात के विधि-विधान उच्च न्यायालय के आदेश से पूरे किये। इस विवाह में एक उल्लेखनीय सामाजिक पहलू छिपा हुआ था जिस पर विचार करना किसी ने जरूरी नहीं समझा जबकि यह जरूरी था। भारतीय समाज में कई लोकतांत्रिक दशक बीत जाने के बावजूद जातीय असहिष्णुता गहरे पैठी हुई है, जो प्रेम और विवाह के मामलों में कुछ क्षेत्रों में इतनी उग्र है कि प्रेमी जोड़ों को सीधे-सीधे मृत्यु दंड दे दिया जाता है। खासतौर पर उन मामलों में जिनमें सवर्ण जातीय संस्कार आहत होता है। यह सही है कि बहुत से शहरी क्षेत्रों में लोगों के सोच में बदलाव आया है और सवर्ण जातियों के लोग अपने पुत्र-पुत्रियों के प्रेम विवाह की सहमति दे देते हैं। विशेष तौर पर तब जब अगला व्यक्ति भी सवर्णता के दायरे में आता हो। किसी सवर्ण को अपनी बेटी या बेटे के किसी दलित लड़के या लड़की के साथ विवाह की अनुमति देने में आज भी कठिनाई होती है और उनकी प्राथमिक सांस्कारिक प्रतिक्रिया ऐसे विवाह के प्रति उग्र विरोध की ही होती है। यह वह सवर्ण जातिग्रंथि है जिसे पराजित करने में कई शताब्दियां और समाज परिवर्तनवादियों की कई पीढ़ियां खप गयी हैं, मगर यह ग्रंथि अब भी अपराजेय है। लेकिन जो सर्वाधिक चिंतनीय पहलू है वह यह कि केवल कथित सवर्ण जातियां ही इस ग्रंथि की चपेट में नहीं हैं बल्कि दलित जातियां भी इसकी उतनी ही शिकार हैं। यानी आर्थिक और सामाजिक समानता तथा न्याय के लिए संघर्ष करने वाली तथा शताब्दियों की अधिकार वंचन प्रक्रिया को पलटकर संविधान में अपने लिए बराबरी तथा आरक्षण जैसे विशेषाधिकार को अर्जित कर लेने वाली दलित जातियां भी पूरी तरह से उस सवर्ण जातिग्रंथ से ग्रस्त हैं जिसके विरुद्ध समूची वैचारिक दलित चेतना खड़ी होती है। मैंने जिस विवाह का उल्लेख किया है, उसमें लड़का अमित चतुव्रेदी था और लड़की किरन दलित। जब दोनों का प्रेम हुआ और दोनों ने शादी करनी चाही तो जातिग्रंथीय पारिवारिक विरोध शुरू हो गया। तब दोनों भाग निकले। लड़की के परिजनों ने लड़के के विरुद्ध अपहरण की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी। लड़के के वापस लौट आने और स्वेच्छा से जाने की बात बताने पर भी पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया, अपनी पारम्परिक शैली के अनुसार। तब लड़के की मां ने अदालत में गुहार लगायी। लड़की को अदालत में बुलाया गया तो उसने कहा कि वह और अमित शादी करना चाहते हैं लेकिन उसके परिजन उसे न केवल शादी करने से रोक रहे हैं बल्कि अमित को प्रताड़ित भी कर रहे हैं। उसने यह भी बताया कि वह जहां की रहने वाली है वहां उसके लिए अमित से शादी करना सम्भव नहीं है। इस पर अदालत ने आदेश दिया था कि अमित और किरन की शादी पुलिस अभिरक्षा में कराई जाये। यहां पुलिस के अमित को गिरफ्तार कर जेल में डाल देने के व्यवहार पर कोई टिप्पणी करने का कोई अर्थ इसलिए नहीं है कि पुलिस ऐसे मामलों में प्राय: असंवेदनशील होती है, और इनमें पर्याप्त पैसे की गुंजाइश भी तलाशती है। इसके अलावा किरन का परिवार एक पढ़ा-लिखा परिवार था, और बहिन मायावती के शासन में अपनी अहमियत के प्रति जागरूक था। इसलिए उसे अमित को, निरपराध होने के बावजूद, जेल भिजवाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन इस प्रकरण का मूल प्रश्न यह है कि आखिर किरन के परिजनों ने अपनी वयस्क, परास्नातक तथा अपने स्वैच्छिक विवाह अधिकार के प्रति सजग लड़की को एक विजातीय लड़के से शादी करने की अनुमति क्यों नहीं दी? उन्होंने इस मामले में ठीक वैसा ही रवैया क्यों अपनाया जैसा कि कथित सवर्ण जातियों के लोग अपनाते हैं? जो दलित जाति समूह अपने आर्थिक-सामाजिक बराबरी के अधिकार के प्रति बेहद सक्रिय और उद्वेलित रहता है, अपने सामाजिक व्यवहार में वह उन्हीं सवर्णो की तरह व्यवहार क्यों करता है, जिनके व्यवहार के विरुद्ध वह समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना कर रहा है? इन सवालों के जवाब एक बेहद विरोधाभासी और विसंगतिपूर्ण स्थिति में छिपे हैं। दलित जाति समूह जहां एक ओर बेहद सजग ढंग से अपने प्रति हुए सवर्ण जाति समूहों के गैर बराबरी, असजग ढंग से वे सवर्ण समूहों के ही जातीय व्यवहार को अपना भी लेते हैं। कथित उच्च जातियों की जातीय अहमन्यता उन्हें बुरी तरह विचलित करती है लेकिन एक जाति के तौर पर वे उसी जातीय अहमन्यता को अपने सामाजिक आचरण का हिस्सा भी बना लेते हैं। सवर्ण जातियों की जो सामाजिक संस्कृति व्यक्ति की निजी आजादी की घोर विरोधी रही है, दलित जातियां भी जाने-अनजाने उसी सामाजिक संस्कृति को अपना लेती हैं। उनकी दलित चेतना उच्च जातियों के अन्याय के संदर्भ में बेहद आक्रामक होती है लेकिन जब स्वयं उनके अपने बीच से वैयक्तिक आजादी का लोकतांत्रिक और अब संविधान सम्मत भी आग्रह उभरता है तो उन्हें भी परेशानी होने लगती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि दलित जातियों का सवर्ण वर्चस्वतावादी ढांचे में अनुकूलन हो रहा है। यानी पिछले दशकों में राजनीतिक-आर्थिक बदलावों के चलते जिस दलित मध्यवर्ग का उदय हुआ है वह सवर्ण जातीय व्यवहार संस्कृति को ही अपना रहा है और यही चिंतनीय स्थिति है। इस स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है कि भारतीय समाज का जातिवादी ढांचा टूटने के बजाय और अधिक मजबूत हो रहा है। भले ही कल की आर्थिक राजनीतिक तौर पर विपन्न जातियां आज सम्पन्नता की ओर अग्रसर हों, मगर उनकी जातीय सामाजिक संस्कृति जातिवादी ही है। दलित जाति समूहों को इसके प्रति सचेत होना चाहिए।


No comments:

Post a Comment