बिहार के आदिवासियों में स्वयंवर प्रथा का चलन आज भी कायम है। इसके लिए अप्रैल से मई के बीच मधेपुरा जिले के अरार घाट समेत कोसी क्षेत्र में चार जगहों पर पत्ता मेला लगता है। मेले में युवक-युवतियां अपनी पसंद के जोड़े चुनते हैं। विवाह की रस्म शिव-पार्वती के विवाहोत्सव यानी महाशिवरात्रि के बाद से शुरु होती है। आदिवासियों में विवाह की शुरुआत में लड़की के घर के लोग रैबार (अगुआ) के साथ लड़के वालों के गांव जाकर वहां के मंझिहराम (गांव के प्रमुख व्यक्ति) से मिलकर लड़की से शादी की इच्छा जाहिर करते हैं। सहमति बनने पर मंझिहराम से ही स्वयंवर का समय लेकर लौट आते हैं। पूर्व निर्धारित समय पर वर के साथ घर के लोग लड़की के घर जाकर गांव वालों की एक सभा बुलाकर उसमें मंझिहराम के सामने लड़का व लड़की की स्वीकृति लेते हंै। सभा में दोनों में से किसी के भी इनकार करने की दशा में शादी टाल दी जाती है। सभा में स्वयंवर के अतिरिक्त दो दिनी एक पत्ते मेले का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें युवक-युवतियों को जीवन साथी चुनने की आजादी होती है। लड़के के घर वाले लड़की के गांव जाकर मंझिहराम से शादी की बात चलाते हैं। ग्वालपाड़ा निवासी 70 वर्षीय सोना टुड्डू के मुताबिक, दर्जनों की संख्या में लड़की वाले लड़के के घर पंचरी (तिलक) करने पहुंचते हैं। शादी में बारात के साथ लड़के वाले भोजन सामग्री भी लिए रहते हैं। विवाहोपरान्त लड़की के साथ ही उसके गांव की महिलाएं और पुरुष उतनी ही संख्या में लड़के के घर पहुंचते हैं जितने बाराती आए होते हैं। यहां दहेज का कोई मामला नहीं रहता है। हां, लड़की के साथ लौटते हुए समाज में लड़की के भाई को एक दुधारू पशु अनिवार्य रुप से देना पड़ता है। सुगदेव हंसदा कहते हैं कि आदिवासी गरीब हो या अमीर, दुघारू पशु देना ही पड़ता है। शादी में माला पहनाकर गंधर्व विवाह की भी परंपरा है। आदिवासी समुदाय के सुगदेव हंसदा, बाल किशोर हंसदा आदि के अनुसार उनके समुदाय में दिन में ही शादी किए जाने का रिवाज है|
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