प्राण या चेतना पर अधिकार किसका हो, व्यक्ति का या राज्य का?
पिछले 37 वर्षों से बेहोश अरुणा शानबाग की इच्छा मृत्यु की कामना इसलिए पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि संविधान के मूल अधिकारों के अनुच्छेद-21 में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के आरक्षण का प्रावधान है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। यह बात दूसरी है कि देश में आत्महत्या करने वालों की संख्या निरंतर बढ़ी है। इसके लिए न तो उन्हें घर-परिवार के लोगों का मुंह देखना पड़ता है, न व्यवस्था के संचालकों का और न ही न्यायपालिका या संविधान का उपरोक्त बंधन उन्हें रोक पाता है।
यह केवल ऐसे मामलों में ही संभव हो पाता है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के भरोसे हो, अचेत-बेसुध हो या लंबे समय से अस्पताल पर आश्रित हो। यदि ऐसे मामले न्यायालय के पास जाएं, तो जवाब नहीं में ही मिलेगा। जहां तक विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का संबंध है, उसका हाल तो यही है कि मानवाधिकारों को धता बताते हुए मुठभेड़ के नाम पर या पुलिस हिरासत में पूछताछ के नाम पर लोग अपनी जान गंवाते हैं। लेकिन ऐसा करने वालों को कानून के दायरे में लाने वाली व्यवस्था में इतने छेद हैं कि असली अपराधी को जानते हुए भी कानून के बंधन में आसानी से नहीं बांधा जा सकता।
गरीबी, बेकारी, भूख, अभाव का सामना करने से रोकने में व्यवस्था कहीं भी मददगार के रूप में सामने नहीं आती। लेकिन आत्महत्या के प्रयास में विफल लोगों को दंडित जरूर किया जाता है। आखिर मृत्यु है क्या? चेतना का विलोप ही मृत्यु है और माना जाता है कि चेतना का केंद्र मस्तिष्क है। इसके सफल संचालन में शरीर के शेष अंग योगदान करते हैं। अर्द्धचेतना की स्थिति, जिसे बेसुध होना कहा जाता है, न तो जिंदा होने की स्थिति है और न मृत होने की। लेकिन शरीर के कई अंगों के काम करना बंद करने के बाद भी चेतना रहती है और चिंतन प्रक्रिया में अपना योगदान करती है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को अंगहीन और अपंग तो कहा जा सकता है, लेकिन बेसुध या बेहोश नहीं। अब इस प्राण या चेतना पर अधिकार किसका हो, व्यक्ति का या राज्य का, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवन शरीर के साथ ही जुड़ा हुआ है। इसीलिए कहा जाता है कि इससे परे उसका कोई अस्तित्व नहीं है। सच्चिदानंद की परिकल्पना भी यही है कि सत् चेतना के फलस्वरूप ही आनंद या दुख प्राप्त हो सकता है। यानी सत प्रथम तत्व है, उसके बिना न तो चेतना है, न आनंद। इस प्रकार चेतना ही हमारे समस्त कार्यों का निर्णायक तत्व है। ज्ञान-विज्ञान, दिशा, इच्छा-अनिच्छा सब कुछ चेतना से ही संभव है।
डॉक्टरों का भी मानना है कि इच्छा मृत्यु, यानी कष्टकर रोगों से मुक्ति के लिए मृत्यु का अधिकार लाइलाज रोगियों को ही मिलना चाहिए। अरुणा शानबाग न तो वेंटीलेटर पर हैं और न अभी तक यह माना गया है कि उनका इलाज, जो मुख्य रूप से थोड़ी देखभाल पर आधारित है, नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में यह कह दिया है कि किसी व्यक्ति को इच्छा मृत्यु मांगने का अधिकार नहीं है। परिवार यदि चाहे, तो उच्च न्यायालय डॉक्टरों से विचार के बाद उस पर अनुमति दे सकता है। इसलिए अब मामला यहां आकर फंसता है कि जीवन पर अधिकार किसका माना जाए-व्यक्ति का या परिवार का। हमारा संविधान व्यक्ति आधारित है और उसे ही सारे अधिकार, विशेषाधिकार और मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन यदि परिवार के मांगने पर मृत्यु का अधिकार मिल सकता है, तो व्यक्ति को क्यों नहीं? मौलिक अधिकार, जिसमें जिंदा रहने का भी अधिकार सम्मिलित है, व्यक्ति के लिए ही है। उसके निर्णय में बाधा तभी आती है, जब कोई व्यक्ति उसका कार्यान्वयन न्यायालय या अस्पताल के माध्यम से कराना चाहे। तब इन दोनों संस्थाओं को व्यक्ति के अधिकार बोध के बजाय अपने सांविधानिक दायित्वों की याद आती है। तब वे बाधक बनकर खड़े हो जाते हैं और ये बाधाएं उन्हीं लोगों तक सीमित हो जाती है, जो अक्षम हैं। चेतना का लोप हो चुका है, तो यहां दायित्व बोध का अस्त्र क्या सही दृष्टि और दिशा में प्रयुक्त हो रहा है? केईएम अस्पताल में नर्स के रूप में कार्यरत अरुणा शानबाग को, जिसे परिस्थितिजन्य कारणों के फलस्वरूप घोर यातना की इस स्थिति तक पहुंचना पड़ा है, बचाना भी तो राज्य या समाज का ही दायित्व था। अब मामला यह है कि जिन कारणों से वह इन स्थितियों में पहुंची हैं और अस्पताल में पड़ी हैं, क्या उसे वैसे ही तब तक के लिए छोड़ दिया जाए, जब तक वह मृत्यु की शिकार नहीं हो जातीं? मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। इस जीवन के लिए व्यक्ति को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका उपयोग वह ऐसी स्थिति में कैसे कर पाएगा? जब वह स्वयं सक्षम ही नहीं है और संविधान के रक्षक इस स्थिति में बदलाव करने में अक्षम हों, तब क्या होना चाहिए? इसी के साथ, जब परिवार को इस संबंध में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उचित निर्देश पाने का अधिकार है, तो उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था होगी, जिनका परिवार नहीं है? यदि उनके परिवार में वसुधैव कुटुंबकम है, तो यह दायित्व किसे सौंपा जाएगा? जिस प्रकार किसी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है, उसी प्रकार क्या उसे सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार नहीं है? ऐसी जिंदगी, जिसे डॉक्टर ‘वेजिटेटिव स्टेट’ कहते हैं, उसका अर्थ तो यही है कि वह व्यक्ति लाइलाज है और उसकी चेतना कोई काम नहीं कर रही। अब इसे सजा के रूप में देखा जाए या पुरस्कार के रूप में? इसलिए ऐसे व्यक्तियों को सम्मान पूर्वक मृत्यु का अधिकार सम्मान पूर्वक जीने के अधिकार का विरोधी नहीं है।
No comments:
Post a Comment