Thursday, April 28, 2011

असफल और अकेले पड़ते जाने का खतरा


एक समृद्ध और खाते-पीते परिवारों वाली कॉलोनी (जो नोएडा जैसे शहर में है) के अपने फ्लैट में पिछले छह महीने से बंद दो बहनों की कारु णिक कथा को अपवाद मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। सच पूछिए तो इस घटना ने शहरी मध्यवर्गीय समाज की बढ़ती समृद्धि के बीच टूटते-बिखरते रिश्तों, बढ़ते सामाजिक अलगाव और सघन होते अकेलेपन की त्रासदी से पर्दा उठा दिया है। इस कहानी से यह भी पता चलता है कि आगे बढ़ने की होड़ और सफलताओं की गुलाबी कहानियों के बीच मध्यवर्गीय समाज के अंदर अकेलेपन और अलगाव के अंधेरे कोने किस कदर फैलते जा रहे हैं। यह कहानी उन असफल लोगों की भी दुखांतिका है जो किन्हीं कारणों से पीछे छूट गए और अकेले पड़ते चले गए। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ है। यह अनायास भी नहीं है। वास्तव में, इस कहानी का प्लॉट नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के इर्द-गिर्द बुना गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि इन नीतियों ने भारतीय राजनीति, अर्थनीति के साथ-साथ समाज, खासकर मध्यवर्गीय समाज को भी बहुत गहराई के साथ प्रभावित किया है। इन नीतियों के साथ देश में जिस तरह से आर्थिक समृद्धि और अधिक से अधिक भौतिक सुख- सुविधाओं को बटोरने की होड़ को आर्थिक प्रगति और सफलता का पर्याय बना दिया खत गया, उसके बाद मध्यवर्ग की आकांक्षाओं, चाहतों और इच्छाओं को जैसे बेलगाम पर लग गए। नतीजा, सबसे आगे निकलने की एक ऐसी अंधी होड़ शुरू हुई कि उसमें पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक सम्बंधों की बलि चढ़ते देर नहीं लगी। देखते ही देखते सफल लोगों का एक ऐसा शहरी समाज बनने लगा जिसमें सम्बंधों और रिश्तों की बुनियाद मानवीय मैत्री, परस्पर सहयोग, एक-दूसरे का आदर जैसे सार्वभौम मानवीय मूल्यों के बजाय लेन-देन, डर-भय, शक्ति व निजी जरूरत बनती जा रही है। लोग एक ऐसी मशीन बनते जा रहे हैं जिसमें रिश्तों, सम्बंधों और उनसे जुड़ी भावनाओं की कोई कीमत नहीं है। उल्टे भावनाओं को सफलता की राह में रोड़ा और मजाक की चीज मान लिया गया है। यही नहीं, सफलता के लिए एक-दूसरे का पैर खींचने से लेकर दूसरे के कंधे पर चढ़कर आगे निकल जाने की ऐसी होड़ शुरू हो गई है कि किसी को किसी की परवाह नहीं रह गई है। आश्र्चय नहीं कि हर कीमत पर सफलता हासिल करने की होड़ में लगे व्यक्ति के लिए समाज और परिवार की भूमिका लगातार महत्वहीन होती जा रही है या परिवार का दायरा निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है। परिवार का मतलब अधिक से अधिक पति-पत्नी-बच्चे रह गए हैं। इन परिवारों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वे अपनी ही सफलताओं में इस कदर खोए हुए हैं, या रोज के जीवन संघर्षो में ऐसे फंसे हुए हैं कि उनके पास यह जानने-देखने क फुर्सत नहीं है कि उनके पड़ोसी का क्या हाल है। कहने का मतलब यह कि लोग अपनी ही सफलताओं के बंदी हो चुके हैं। जाहिर है कि यह सफलता की होड़ की सामाजिक-पारिवारिक कीमत है जिसे बदलते हुए दौर की जरूरत बताकर जायज ठहराने की कोशिश भी की जाती है। लेकिन मुश्किल यह है कि इस नई व्यवस्था में जितने सफल लोग हैं, उनकी तुलना में असफल लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है।
लेकिन इस नव उदारवादी व्यवस्था में असफल लोगों की कोई कीमत नहीं है। उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है- न परिवार, न नाते-रिश्तेदार, न पड़ोसी, न समाज और न ही राज्य। उन्हें अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया है। यह एक नए तरह का समाज है जिसमें सिर्फ 'सर्वश्रेष्ठ को जीने' का हक है। जो दौड़ में छूट गया, खतरा गिर गया या शामिल नहीं हुआ, उसे परिवार-समाज पर बोझ समझा जाने लगता है। सबसे दु:खद यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की चरम परिणति असफल लोगों के निरंतर अलगाव और अकेलेपन के रूप में आ रही है जिसमें उनके सामने आत्महत्या के रूप में अपनी असफलता की कीमत चुकाने या फिर नोएडा की दो बहनों की तरह घुट-घुटकर मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जा रहा है। हैरानी की बात नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के इस दौर में देश में आत्महत्याओं की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। एक ओर नव उदारवादी अर्थनीति की मार से त्रस्त और असहाय से हो गए किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और दूसरी ओर, सफलता की होड़ में पीछे छूट गए और किनारे कर दिए गए मध्यमवर्गीय लोग जान दे रहे हैं। इस मायने में, नोएडा की बहल बहनों की कहानी को उन त्रासद कहानियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है जिनमें हर ओर से निराश-हताश पूरे के पूरे परिवार ने सामूहिक आत्महत्या कर ली है। पिछले कुछ वर्षो में दिल्ली, मुम्बई से लेकर छोटे- छोटे शहरों में भी ऐसी मध्यवर्गीय पारिवारिक सामूहिक आत्महत्या की घटनाआों में चौंकाने वाली वृद्धि हुई है। जाहिर है कि यह सिर्फ संयोग नहीं है कि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की सबसे ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे अधिक आत्महत्याओं वाले शहर की कुख्याति बेंगलुरु के हिस्से आई है जो नव उदारवादी अर्थनीति की सफलता का भी सबसे चमकदार उदाहरण बनकर उभरा है। बेंगलुरु में वर्ष में हर दिन कोई छ: लोगों ने आत्महत्या की, यानी हर चार घंटे पर एक आत्महत्या! इसी तरह, चेन्नई में हर छह घंटे में और दिल्ली में हर सात घंटे में एक व्यक्ति ने आत्महत्या की। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वजह साफ है। नव उदारवादी नीतियों ने सफलता और समृद्धि की होड़ तो तेज कर दी लेकिन असफल और पीछे छूटे लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा का ऐसा कोई विश्वसनीय ढांचा नहीं खड़ा किया है जो नोएडा की बहल बहनों के अकेलेपन और अलगाव को दूर कर सके। साफ है कि इन नीतियों के कारण आर्थिक पूंजी चाहे जितनी पैदा हो रही हो लेकिन सामाजिक पूंजी लगातार रीतती जा रही है। सामाजिक पूंजी के इस क्षरण की कीमत किसी न किसी रूप में हम सभी चुका रहे हैं। आखिर सफल लोगों का व्यक्तिगत-सामाजिक जीवन भी कितना खाली और रीता होता जा रहा है, यह बताने की जरूरत नहीं है। आर्थिक समृद्धि के बावजूद मध्यमवर्गीय परिवारों में जीवन शैली सम्बंधी बीमारियों, खासकर मानसिक बीमारियों की बढ़ती जाती संख्या इसका एक और सबूत है। खतरे की घंटी बज चुकी है। क्या लोग और समाज सुन रहे हैं।
इनमें बच्चों की खुदकुशी का स्तर 54.5 प्रतिशत खास : यह आंकड़ा पूरे देश में बच्चों के द्वारा की गई कु ल खुदकुशी के आधे से अधिक है। (स्रेत : एनसीआरबी, आंकड़े : 2009 के) बच्चों की सर्वाधिक आत्महत्या वाले राज्य मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु देश में बच्चों की कुल आत्महत्याएं 2,951


राज्य को पैदा करनी होगी समाज समर्थन पण्राली


नोइडा में दो युवा लड़कियों को लेकर पिछले दिनों जो घटना सामने आई है, उसे कई पहलुओं से समझने की जरूरत है। इसका एक पहलू सामाजिक भी है। मेरा आशय यह कि एक संगठित समाज में कैसे यह सम्भव हुआ कि एक घर में रहने वाली दो लड़कियां स्वयं को सबसे अलगथ लग कर इस हालत में ले गई? आखिर क्या वजहें हो सकती हैं कि वे समाज के साथ जिंदा रहने में कठिनाई महसूस कर रही थीं? क्या उनके कोई पड़ोसी नहीं थे, या उनके जानने वाले नहीं थे जो उन्हें इस सिलसिले में समझाते या उनकी मदद करते। इस पहलू पर गौर करने के लिए यह आवश्यक है कि हम पिछले दो दशकों से समाज में जो परिवर्तन आ रहे हैं, उनका मूल्यांकन करें। प्राय: समाज तब मजबूत होता है जब उसमें समर्थन की पण्राली या प्रक्रिया होती है, जिसके माध्यम से यदि व्यक्ति किसी कठिनाई में हो या किसी पीड़ा का शिकार हो तो वह दूसरों से अपनी बात कह सके। इसमें व्यक्ति अपनी समस्याओं का हल समाज के माध्यम से ढूंढ सकता है। पहले यह प्रक्रिया हमारे यहां पारम्परिक रूप से मजबूत थी और व्यक्ति को ऐसी किसी स्थिति में सबसे बड़ा सहारा या समर्थन पारिवारिक पण्राली से मिलता था। उसके साथ-साथ मित्रों, पड़ोसियों और आसपास के निवासियों से भी व्यक्ति को कमोबेश मदद मिलती रहती थी। तब समाज भी इतना सचेत था कि ऐसी कोई घटना किसी जगह हो रही हो तो लोग उसमें न केवल रुचि रखते थे बल्कि हस्तक्षेप करने की भी कोशिश करते थे। वह एक व्यापक प्रक्रिया थी।
विलगाव से टूटे सरोकार
पहले यदि कोई अपने किसी मित्र के बेटे को शराब पीते या बुरी संगति में देखता था तो अधिकारपूर्वक डांट सकता था। उसके पिता से शिकायत कर सकता था। आज समाज में वह प्रवृत्ति नहीं रही जबकि समय के साथ लोगों में एक दूसरे के प्रति विलगाव बढ़ता गया है। आज हमारे यहां व्यक्तिवाद इतनी तेजी से आया है कि व्यक्ति यह समझने लगा है कि 'हमारा सरोकार सिर्फ ख़्ाुद से है और हमारे आसपास जो भी रहते हैं उनसे हमारा कोई सम्बंध नहीं है।'
लोगों का एक दूसरे की समस्याओं से कोई सरोकार रहा नहीं रह गया है। इससे एक ऐसी सामाजिक परिस्थिति खड़ी हो गई है जिसमें पहले का जो सहयोग वाला ढांचा था और जिसके माध्यम से आदमी अपनी समस्याओं का हल ढूंढ पाता था, लगभग ध्वस्त हो चुका है। इस परिवर्तन का नतीजा यह हुआ है कि व्यक्ति खुद को पूरी तरह से अलग-थलग पाता है। प्रभावस्वरूप अकेलेपन की भावना आती है और व्यक्ति अपने को समाज से काटने की प्रक्रिया में जुट जाता है।
व्यक्तिवाद ने जमाई जड़ें
इस पूरी प्रक्रिया में कई नई चीजें शामिल हो चुकी हैं। एक तो व्यक्तिवाद अपनी जडें़ जमा चुका है, दूसरी आज जिस प्रकार का प्रतियोगी समाज पैदा हुआ है, उसमें लोगों के पास समय नहीं है कि वे दूसरों की चिंताओं को अपनाने की कोशिश करें। तीसरी बात समाज को हम अलग भी कर दें तो सरकार के पास भी ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें समाज के समर्थन ढांचे के खत्म होने के बाद राज्य उस भूमिका को पूरी करे। राज्य से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए पर आज राज्य भी समाज में इस रिक्ति को अपनी भूमिका से पूरी नहीं कर पा रहा है, इसलिए व्यक्ति पृथक है, अकेला है। हालांकि यदि वह चाहता है कि समाज से अपना नाता तोड़ ले तो वह सम्भव है। यही इन दोनों लड़कियों के साथ हुआ।
दूसरों की चिंता से मुक्ति का नतीजा
प्रसंग नोएडा की जिन दो लड़कियों का है, शायद अपने पिता के जीवनकाल में वे समाज से कटी-छंटी नहीं थीं, उनमें एक नौकरी भी करती थी। लेकिन पिता के जाने के बाद यह समाज और उनके परिवार की जिम्मेदारी थी कि उनके अकेलेपन में वे सहारा देते, जो हुआ नहीं। क्योंकि समाज में वह चेतना जो अनिवार्यकर देती है कि हम दूसरों में रुचि रखें, वह धीरे-धीरे खत्म होती गई है। सिर्फ यही नहीं, बल्कि कई सारी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं कि लोग दूसरों में कोई रुचि नहीं रखते। बड़े शहरों में स्थिति ज्यादा खराब है जबकि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में परिस्थिति थोड़ी ठीक है। हालांकि जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ेगा, वहां भी यह प्रक्रिया प्रबल होगी।
सामाजिक दायित्व की भावना आवश्यक
मुझे लगता है कि यह एक सामाजिक समस्या है और सरकार इसका हल इस माध्यम से ढूंढ सकती है कि समाज की कमजोर होती समर्थन पण्राली की जगह राज्य द्वारा स्थापित समर्थन पण्राली पैदा करे। या फिर समाज को यह सोचना पड़ेगा कि उसकी जो परिवर्तन की प्रक्रिया है क्या वह उसे स्वीकार्य है। अगर स्वीकार्य नहीं है तो लोगों को यह सोचना पड़ेगा कि 'हमारा भी समाज में कोई उत्तरदायित्व बनता है।' हमारा यह रवैया कि हमारा खुद से ही सरोकार है, शायद बुनियादी तौर पर गलत है।
मानसिक विकृति भी हो सकती है वजह
मैं समझता हूं कि इसका दूसरा पहलू व्यक्तिगत मानसिक विकृति है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी हमें इस समस्या को देखना चाहिए। क्या वे परिस्थितियां या क्या वे कारण थे कि दो लड़कियों ने अपने को दूसरों से अलग किया। जब कोई व्यक्ति इस किस्म का अतिवादी कदम उठाता है तो उसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। सामान्य प्रक्रिया यह है कि किसी व्यक्ति के पिता की मृत्यु होती है तो वह दस दिन या महीना भर शोक मनाता है। उसके बाद जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। नोएडा की लड़कियों के प्रकरण में घटनाचक्र से लगता है कि कहीं न कहीं इसके लिए इनकी खुद की मानसिक स्थिति भी जिम्मेदार हो सकती है। शायद उनमें इतना आत्मबल नहीं था। इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण यह भी हो सकता है कि उनका अपने पिता से बहुत ज्यादा जुड़ाव रहा हो। शायद वे अपने पिता के मरने के बाद इस वेदना कि 'वह अकेली रह गई हैं' से उबर नहीं पाई। इसका तीव्र अहसास उन्हें तब फिर हुआ जब उसका भाई शादी कर अलग रहने लगा। उसके बाद ये लड़कियां पूरी तरह से टूट गई।
अति जुड़ाव का दंश
अपने किसी रिश्तेदार से बहुत अधिक जुड़ाव भी एक किस्म की मानसिक विकृति की श्रेणी में आती है। कुछ दिन पहले यूरोप में एक ऐसा ही केस आया था जब किसी बाप ने अपनी बेटी को बीस साल तक तहखाने में बंद रखा। कई केसेस आते हैं कि अपने प्रियजन की मृत्यु के बाद लोग उसके शव को दफनाने या जलाने के बजाय घर में रखे रहते हैं। यह एक किस्म की मनोविकृति है और हो सकता है कि ये लड़कियां भी इसी मनोविकृति की शिकार हो गई हों। यह एक मानसिक समस्या है और इसका समाज से यादा ताल्लुक़ नहीं है। हालांकि यह उनके परिवार और पालन पोषण की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि उनको कमरा तोड़ कर बाहर नहीं निकाला जाता तो शायद दोनों ही मर जातीं। हालांकि एक की बाद में मौत हो गई। इसका तीसरा पहलू यह है जिसकी तरफ इशारा दिलाना मैं जरूरी समझता हूं। अगर हम मान लें कि यह सारी प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक कारणों से पैदा हुई। हम मान लें कि उनके अलगथ लग होने की एक प्रमुख वजह ये भी रही होगी कि उनको सामाजिक समर्थन के ढांचे उपलब्ध नहीं थे तो महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आज हमारे समाज में इतना विलगाव पैदा हो गया है जिसके कारण संवेदनशीलता इतनी खत्म हो गई है कि हम सामूहिक समाज की तरह रह सकें। मैं समझता हूं कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है कि जब तक समाज अपने उत्तरदायित्व को नहीं समझता, ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी। समाज तो आखिरकार हम सब लोगों को मिलाकर ही बनता है, इसलिए हर एक को अपने उत्तरदायित्व को समझना चाहिए। हम जहां, जिस समाज, जिस मोहल्ले में रहते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी बनती है कि कुछ हम उसे भी दें। यह प्रक्रिया हालांकि हमारे समाज में हमेशा से कमजोर थी, लेकिन पिछले 20-25 सालों में तेजी से कमजोर हुई है। (इम्तियाज अहमद से शशि भूषण कुमार की बातचीत पर आधारित)



शहरी भारत का कड़वा सच


शहरी समाज की बदलती जीवन शैली, एकल परिवार को मिलता बढ़ावा, सामाजिक ताने-बाने की उलझन से बढ़ती दूरियां, युवाओं में महत्वाकांक्षा का उच्च स्तर, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए असुरक्षित माहौल और सबसे अहम सफलता-विफलता के बीच घटते फासले से लोगों की जिंदगी में तन्हाई, अकेलापन, अलगाव और अवसाद ने घर बना लिया है। नोएडा में दो बहनों के मामले पर नजर डालें तो समाज की इस स्याह सचाई से परदा उठने लगा। हालांकि मेट्रो और उसके आसपास के इलाकों में अवसाद का यह कोई पहला मामला नहीं है। आए दिन सुनते हैं कि किसी छात्र ने परीक्षा में पास नहीं होने पर खुदकुशी कर ली। किसी लड़की को प्यार में धोखा मिला और वह घर के पंखे से लटक गई। एक बार समाज से धोखा खाने के बाद किसी महिला ने खुद को सबसे अलग कर रखा है। यहां तक कि कई बुजुगरे की मौत इसलिए भी होती है कि उनके बेटे-बेटी ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। इस परिस्थिति में अक्सर बुजुगरे की मौत दिल का दौरा पड़ने से होती है। लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि दिल का दौरा पड़ने से पहले बुजुर्ग काफी सोच रहे थे, यानी मानिसक तनाव में जी रहे थे। बहरहाल, हमारे भारतीय समाज में अवसाद को आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के विकास परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है। सचमुच 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अगर वह समाज से बाहर है तो देवता है या दानव।' प्रख्यात दार्शनिक अरस्तू के इस कथन से इतर आज मनुष्य सामाजिकता से दूर जा रहा है और ऐसी अवस्था में वह न तो देवता ही बन पा रहा है और न दानव। तो इसकी क्या वजह है? इस पर गौर किया जाना चाहिए। दरअसल, इसके दो पहलू हैं। पहला यह कि अवसाद हर मनुष्य के जीवन में आता है। चाहे वह युवावस्था में हो या वृद्धावस्था में। चाहे जीवन के किसी क्षणिक मोड़ पर आए किसी दीर्घकालिक मोड़ पर। कह सकते हैं कि सुख का हम आलिंगन कर खुशियां मनाते हैं, इसे साझा करते हैं, या करने की कोशिश करते हैं। वहीं दुख से विचलित होकर एकाकीपन अपनाते हैं। तो अवसाद को बीमारी मानने से पहले हमें विकार के तौर पर देखना चाहिए और इस पर नकारात्मक राय बनाने से पहले उसे जीवन का एक हिस्सा भर मान लेना चाहिए। अगर अवसाद पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो यह दीर्घकालिक अवस्था में पहुंच जाएगा। ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सकों से परामर्श में संकोच नहीं करना चाहिए। वैसे भी समाज के ज्यादातर लोग अवसाद को पागलपन और मानसिक असंतुलन से भी जोड़कर देखते हैं। यह वाकई गलत है। अवसाद के लक्षण इन दोनों बीमारियों से काफी अलग है। अवसाद के प्राथमिक मरीज़ के लक्षणों को मनोचिकित्सक गौर कर विभिन्न उपभागों में बांटता है। मसलन, क्या मरीज़ के स्वभाव- व्यवहार में बदलाव आया है? कभी-कभी विचारों को लेकर भी दिक्कतें होती हैं। इससे जुड़े दूसरे सहयोगी लक्षणों को भी चिह्नित किया जा रहा है। मसलन, ब्लड प्रेशर और हॉर्ट प्रेशर की क्या स्थिति है? भूख का कम या ज्यादा लगना, प्यास, नींद और वजन के आधार पर अवसाद का पता लगाया जाता है। इसके बाद यह देखा जाता है कि मरीज़ में इन लक्षणों की वजह से जीवन शैली में क्या बदलाव आए हैं? इस अध्ययन के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है कि केमिकल बैलेंस इंड्यूड और परामर्श में कौन बेहतर होगा? हालांकि विकार और बीमारी अपने प्रसार के दौर से गुजरती ही है। लेकिन अवसाद जैसी बीमारी से समाज पर क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है, ये जानना-समझना जरूरी है। हालात विश्व भर में इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि आने वाले दशक में अवसाद दुनिया भर में दूसरे नम्बर की बीमारी हो जाएगी। सामाजिक ढांचे के बदलाव से अवसाद के कई घातक रूप समाज के सामने आएंगे। एक दौर था जब संयुक्त परिवार, पारिवारिक समर्थन और पारिवारिक आयामों के चलते इसे क्षणिक विकार माना जाता था। लेकिन परिवार के टूटने, विद्वेष बढ़ने से सामाजिक स्तर बिखर गया है। अब हम पड़ोसियों से कृत्रिम सम्बंध बनाने पर जोर दे रहे हैं लेकिन शहरी भारत की सचाई यही है कि घनी आबादी वाले इलाकों में भी लोगों को खुद से फुरसत नहीं है। छोटा परिवार, कामकाज के बढ़ते घंटे, ऑफिस में परफॉर्मेस का दबाव और जीवन के प्रति संकीर्ण नजरिये ने आदमी को तन्हा बना दिया है। जहां सोशल सपोर्ट सिस्टम भी पंगु है।



सामाजिकता के ध्वस्तीकरण का द्योतक


क्या डिप्रेशन एक बीमारी है, जिसे चंद दवाओं और परामर्श के जरिये ठीक किया जा सकता है, या डिप्रेशन एक सामाजिक समस्या है जो सामाजिकता के ध्वस्तीकरण का द्योतक है। जिंदगी की आपाधापी और मेडिकल साइंस के अत्याधुनिक युग में हमारे सामने ये दो यक्ष प्रश्न हैं। यह कह देना कि नोएडा की लड़कियां डिप्रेशन की शिकार रहीं और इसी के चलते उनमें एक की मौत हुई और दूसरी उस दशा में जा पहुंची, शायद गलत होगा। सच कहूं तो कभी-कभी मुझे लगता है कि डिप्रेशन का सरलीकरण हो गया है। वास्तव में यह काफी जटिल मुद्दा है। इस पर मनोचिकित्सकों को भी एक राय बनाने की जरूरत है। इसके अलावा समाज को भी इस समस्या पर प्रतिक्रिया देनी होगी।
दोष नव उदारवाद के सिद्धांत का भी
बहरहाल, जहां तक विषय का प्रश्न है, मौजूदा वक्त में डिप्रेशन की शुरुआत तनाव से होती है। तनाव के कारणों पर र्चचा की जाए तो महत्वाकांक्षा, प्रतियोगिता, नौकरी की चिंता इनमें पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर प्रेम, धोखा, तलाक को लिया जा सकता है। तीसरे स्थान पर सामाजिक कटाव, रिश्तेदारों से अनबन आदि है। इसके अलावा उम्र का पड़ाव भी बेहद अहम मुद्दा है। मसलन, यदि कोई शख्स खुद के अपने जिन्हें वह बहुत स्नेह करता है, से दूर हो जाए तो वह मौत के मुंह में जा सकता है। तनाव की शुरुआत पारिवारिक झगड़े, आर्थिक तंगी, महंगाई और नाकामियों से भी होती है। बहरहाल इससे डिप्रेशन होता है और इसके कायम रहने से भविष्य में नकारात्मक विचार प्रबल हो जाते हैं। इसके बाद या तो वह शख्स आत्महत्या कर लेता है या धीरे-धीरे खुद को एक मानसिक कवच के अंदर बंद कर लेता है। इस मानसिक कवच के अंदर सिर्फ वह मनमर्जी ही करता है। बाहरी दखल न तो उसे रास आती है और न ही उसे प्रेरित करती है। कभी इस दौरान मरीज की सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होने लगती है तो कभी भावनात्मक लगाव घटने लगता है। ये दोनों एक साथ भी मुमकिन है। यह काफी हद तक व्यक्तिगत होता है और इसे मरीज खुद भी बयान नहीं कर पाता है। हालांकि डिप्रेशन व्यक्तिगत समस्या होते हुए भी सामाजिक कारकों के चलते होता है। इसमें आधुनिक जीवन शैली और धन का नव उदारवाद सिद्धांत दोषी है।
पड़ोसी से दोस्ताने का व्यवहार
दरअसल, आधुनिक जीवन शैली ने हमसे अपने पड़ोसी से दोस्ताने व्यवहार के प्राचीन मॉडल को छीन लिया है। एक दौर रहा, कम से कम उदारवाद से पहले तक, पड़ोसी अमूमन हर पर्व-त्योहार पर पकवान एक दूसरे से बांटते थे, एक घर के बच्चों की देखरेख दूसरे घर के बुजुर्ग और वयस्क करते थे। सुख-दु:ख में एक दूसरे से मिलना होता था लेकिन पैसा कमाने की अंधाधुंध ललक में एक दूसरे के लिए अब वक्त ही नहीं रह गया है। यहां तक कि शहरी समाज की यह समस्या फ्लैट और अपॉर्टमेंट्स कल्चर में भी शामिल हो गई है जबकि फ्लैट और अपॉर्टमेंट्स की नींव इसलिए रखी गई ताकि अलग-अलग संस्कृति, सोच और धर्म-जाति के लोग आपस में घुल मिलकर सुखदु: ख साझा करें। बहरहाल अवसाद का असर बुजुर्ग लोगों पर व्यापक तौर पर पड़ा है। पढ़ाई, नौकरी या बंटवारे की वजह से बच्चे माता-पिता से अलग रहने लगे हैं। इससे बुजुर्ग माता-पिता खुद को तन्हा महसूस करने लगते हैं और अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। अवसाद की वजह से वे लापरवाह जीवन जीते हैं और असमय काल के गाल में समा जाते हैं। सवाल यह कि इस सामाजिक समस्या-बीमारी से कैसे निजात पाई जाए? क्या संयुक्त परिवार के बढ़ावे से यह मुमकिन हो पाएगा; बेशक, पर हमें अपने अंदर सामाजिकता को लाना होगा। सामाजिक कायरे में दिलचस्पी दिखानी होगी। आपसी मेलजोल को तवज्जो देना होगा। संयुक्त परिवार पद्धति लागू नहीं होने पर भी तन्हाई को दूर रखने के लिए अपने शौक को विकसित करना चाहिए। यानी दिल को तन्हा छोड़ने से बेहतर है कि दिल किसी काम में लगाएं।


पैसा कमाने की होड़ परिवार को रही है तोड़


बीते दिनों दिल्ली से सटे नोएडा के एक फ्लैट में दो बहनों द्वारा खुद को पिछले सात महीनों से बंद रखने की घटना ने कई बातों पर विचारिवमर्श करने की जरूरत पैदा कर दी है। सबसे पहली बात तो यह है कि आखिर वे कौन सी वजहें थीं जिनसे इन दोनों ने खुद को धीमे-धीमे मारने का फैसला कर लिया। खबरों के आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों बहनें मानसिक तौर पर बीमार थीं। इनकी बीमारी इनके पिता की मौत के बाद और बढ़ गई थी। हालांकि बीमारी बढ़ाने में और भी कोई कारण जिम्मेदार है या नहीं, इस बारे में अभी स्पष्ट तौर पर कुछ पता नहीं चल पाया। इन बहनों को जिस तरह की मानसिक बीमारी की बात बताई जा रही है, उसमें मरीज की देखरेख बेहद जरूरी होती है। खतरा इतना ज्यादा होता है कि थोड़ी सी भी चूक अगर हो तो मरीज को संभालना मुश्किल हो जाता है। ऐसा लगता है कि जब तक इन दोनों लड़कियों के पिता जीवित थे, तब तक इनका इलाज ठीक से हो रहा था। इस तरह की मानसिक बीमारी में समय पर दवाई और समय पर संतुलित खाना के अलावा और भी कई तरह के देखरेख की जरूरत होती है।
साथ होने का भरोसा
ऐसे लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है सामाजिक मदद की। इन्हें बताना ही नहीं बल्कि भरोसा दिलाना पड़ता है कि उनका परिवार या उनसे सम्बंधित लोग पूरी तरह से उनके साथ हैं। अगर ऐसा नहीं होगा तो ऐसे मानसिक रोगियों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इस मामले में यह लग रहा है कि जब तक पिता जिंदा रहे तब तक तो इन दोनों बहनों को सोशल सपोर्ट सिस्टम मिला लेकिन उनकी मौत के बाद यह नहीं मिला। लड़कियों का भाई भी अलग रह रहा था। सम्भव है कि उसे अपनी बहनों की बीमारी के बारे में पहले से पता हो। पर ऐसे रोगियों का खयाल रखने के लिए जिस तरह के धैर्य की जरूरत होती है, वह सबमें नहीं होती है। यह भी सम्भव है कि इस भाई में इतना धैर्य नहीं हो कि वह अपनी बहनों को सही इलाज और सही देखरेख कर सके। मुमकिन यह भी है कि महानगरों की भागदौड़ वाली जिंदगी में शायद इस भाई के पास इतना वक्त ही नहीं हो कि वह बहनों की देखरेख कर सके क्योंकि ऐसे रोगी बहुत भला-बुरा भी बोलते हैं। पर इन्हें प्रेम से समझाने और इनका भरोसा जीतने की जरूरत होती है। यह भी सम्भव है कि इन लड़कियों के भाई का धैर्य जवाब दे गया हो। कुछ भी हो सकता है। पारिवारिक स्थितियां किस तरह की थीं, भाई-बहन के रिश्ते का समीकरण क्या था और अन्य रिश्तेदारों के साथ सम्बंध कैसे थे, ऐसी कई बातें हैं जिस पर स्थिति बहुत साफ नहीं है। यह भी देखने वाली बात है कि इन कामकाजी लड़कियों का कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिसने गुजरे सात महीने में इनकी कोई खोज-खबर ली हो।
खाना छोड़ना बीमारी का सिम्ट्म्स
जिस तरह की मानसिक बीमारी इन लड़कियों को थी, उसमें रोगी बात- बात पर खाना छोड़ने की बात करता है और ऐसा कर भी देता है। इस मामले में भी यही लग रहा है कि जब पिता की मौत हुई और किसी वजह से भाई ने अलग रहना शुरू किया तो इन लड़कियों का अवसाद और बढ़ा और इन्होंने खाना छोड़ दिया। इन्हें कोई प्यार से मनाने वाला नहीं था कि खाना लेना कितना जरूरी है। खाना छोड़ते ही कई तरह की समस्याएं पैदा होने लगती हैं। शरीर की ताकत घटने लगती है। शरीर के कामकाज पर असर पड़ता है। पाचन तंत्र समस्याएं पैदा करने लगता है। शरीर के अंदर नमक का स्तर बहुत गड़बड़ हो जाता है। ऐसा होने पर हृदय, किडनी और दिमाग के कामकाज पर गहरा असर पड़ता है। इनसे ही पूरा शरीर नियंत्रित होता है इसलिए इन पर असर पड़ने से स्थिति गड़बड़ होती जाती है। ऐसी स्थिति में बीमारी और बढ़ती जाती है और जानलेवा भी साबित हो सकती है।
परिवार और समाज की बदली मानसिकता
दरअसल, इस तरह की घटनाओं के लिए खुद मरीज की मानसिक स्थिति के अलावा परिवार और समाज की मानसिकता में आया बदलाव भी काफी जिम्मेदार है। आज महानगरों के परिवार बिखर रहे हैं और इस कदर तक बिखर रहे हैं कि कोई भाई इतना खफा हो जा रहा है कि वह सात महीने तक अपनी दो सगी बहनों की कोई खोज-खबर नहीं लेता है। आखिर यह क्या हासिल करने की होड़ है? आखिर ऐसी कौन सी चीज है जिसने लोगों को इतना व्यस्त कर दिया है कि वे अपने परिजनों का खयाल न रखें? एक समय होता था जब पड़ोसी भी परिवार के हिस्से थे। आज बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्हें यह पता होगी कि उनके पड़ोस के फ्लैट में कौन रहता है। पिछले कुछ सालों में शहरी समाज का तानाबाना काफी बदला है और इसमें एकाकीपन बढ़ा है। इसे दूर करने के लिए रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन बने थे पर ये भी कामयाब नहीं रहे। आज हर आदमी अपने काम में इस कदर व्यस्त है कि उसके पास दूसरों की सुध लेने के लिए फुर्सत नहीं है। ऐसी स्थिति में पड़ोस के फ्लैट में बड़ी से बड़ी घटना होने के बावजूद अन्य पड़ोसियों का इससे अनजान रहना स्वाभाविक ही है। आज शहरी समाज का मनोविज्ञान पूरी तरह से पैसा कमाने पर केंद्रित है। हर कोई पैसे के पीछे, या यों कहें कि भौतिक सुख के पीछे भाग रहा है। यहां पैसे कमाने की होड़ लगी हुई है। इस होड़ में पड़ोस भी पीछे छूट जा रहा है और परिवार भी। बचता है तो सिर्फ पैसा। समाज को आखिर समझना होगा कि जिस पैसे के पीछे वे भाग रहे हैं, उससे कुछ देर के लिए भौतिक सुख तो मिल सकता है लेकिन यह दौड़ इंसान को इनसान से काटने का काम कर रही है। (अरुणा ब्रूटा से हिमांशु की बातचीत पर आधारित)



महानगरीय जीवन की अनिवार्य नियति नहीं


जिस बीमारी को हम अवसाद कहते हैं उसका मुख्य लक्षण है मन में गहरी निराशा का घर कर जाना। थोड़ी-बहुत निराशा तो सबके अंदर आती है, पर जब कभी हमारी निराशा ऐसे चरण में पहुंच जाती है कि वह लम्बे समय तक जारी रहती है, तो अपनी रुचियों के प्रति, काम-काज एवं सामाजिक व्यवहार के प्रति हमारे अंदर एक अनिच्छा की मनोदशा उत्पन्न होने लगती है। हम किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते, धीरे-धीरे अकेलेपन की तरफ बढ़ने लगते हैं, किसी से बातचीत करने की इच्छा नहीं होती। ये सभी लक्षण किसी व्यक्ति के अवसादग्रस्त होने की तरफ इशारा करते हैं। आगे चलकर ऐसे व्यक्ति के मन में खुद को हानि पहुंचाने की इच्छा उत्पन्न होने लगती है, उसे खाने की इच्छा नहीं होती और धीरे-धीरे वह खाना भी छोड़ देता है। वह अपनी किसी दिनर्चया का पालन नहीं करता और उसके मन में यह विश्वास हो जाता है कि अब कुछ बदलेगा नहीं इसलिए उसकी रही-सही आशा भी टूट जाती है।
हर मानसिक कमजारी अवसाद नहीं
अवसाद यों तो कई प्रकार के हो सकते हैं पर सुविधा के लिए हम उन्हें दो भागों में बांट सकते हैंिरएक्टिव या प्रतिक्रियात्मक अवसाद और एजिटेटिव या उत्तेजनामूलक अवसाद। पहले किस्म के अवसाद में व्यक्ति शांत और सुस्त बैठा रहता है जबकि दूसरे में वह काफी चिड़चिड़ा हो जाता है। कुछ पीड़ित ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें उपयरुक्त में से कोई भी लक्षण न दिखाई दें। आम तौर पर लोग किसी भी तरह की मानसिक कमजोरी को अवसाद समझ लेते हैं पर ध्यान देना चाहिए कि जिस बीमारी में निराशा गहरी उदासी नहीं है वह अवसाद नहीं है। अवसाद चाहे जिस वजह से भी हुआ हो, उसमें व्यक्ति की मनोदशा कुछ अजीब-सी हो जाती है। दो तरह के लोगों के अवसादग्रस्त होने की अधिक सम्भावना हुआ करती है- पहले वे जिन्हें अपने रिश्तों में निराशा का सामना करना पड़ता है, तिरस्कार झेलना पड़ता है और दूसरे वे जिनका आत्मविश्वास कमजोर होता है या वह जल्दी डगमगा जाता है। जो लोग अवसाद में होते हैं अक्सर उनमें आत्मविश्वास की कमी पाई जाती है। हमारी संस्कृति ऐसी रही है कि यहां नकारात्मक भावनाएं सम्प्रेषित नहीं की जातीं। निषेधात्मक तत्वों की प्रभावशाली उपस्थिति की वजह से लोग अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के बजाय खुद को पीड़ा देना शुरू कर देते हैं, आत्मोत्सर्ग को ज्यादा महत्व देते हैं और यह चीज बहुत हद तक उन्हें अवसाद का शिकार बना डालती है। बहुत सारे लोगों की इच्छाएं अलग तरह की होती हैं पर सामाजिक मानदंडों एवं कायदे-कानूनों की वजह से वे उन्हें पूरी नहीं कर पाते। उन्हें इसके लिए जगह नहीं मिलती। ये सभी परिस्थितियां व्यक्ति को अवसाद की तरफ ले जाने का उपयुक्त माहौल तैयार करती हैं।
मिलनसारिता में कमी नहीं है मानसिक बीमारी
अवसाद के बारे में जागरूकता के अभाव में कई प्रकार की भ्रांतियां प्रचलित हो गई हैं। कई लोग यह सोचते हैं कि चूंकि अवसाद का वैज्ञानिक अर्थ मानव-मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन उत्पन्न होना है, इसलिए यह सम्पूर्ण रूप से चिकित्सकीय उपचार का विषय है पर वास्तविकता इससे अलग है। हमारे दैनंदिन व्यवहार में अक्सर हमारे मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन उत्पन्न होते रहते हैं, और हमारे विचार हमारे शरीर पर भी प्रभाव डालते ही हैं। दिक्कत तब होती है जब यह असंतुलन जल्दी समाप्त नहीं होता। आदमी उससे बाहर नहीं निकल पाता। हम देखते हैं कि जिन पत्नियों को अपने परिवार में घुलने-मिलने में दिक्कत आती है उनके बारे में अक्सर यह मान लिया जाता है कि वे मानसिक तौर पर बीमार हैं। पर क्या केवल इसी वजह से हम किसी को मानसिक तौर पर बीमार का दर्जा दे सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं। जब आपके जीवन में कोई ऐसी बड़ी घटना घटती है जो आपके मस्तिष्क पर बहुत गहरा असर छोड़ देती है तो अवसाद के खतरे बढ़ जाते हैं। यह स्थिति किसी भी उम्र में उत्पन्न हो सकती है। अक्सर सम्बंधों में तनाव या दबाव को न झेल पाने की वजह से स्त्री या पुरुष अवसाद का शिकार होते हैं। आम तौर पर यह कोई आनुवांशिक बीमारी नहीं है पर परिस्थितियां भी इनमें एक भूमिका अवश्य निभाती हैं। अगर परिवार में कोई अवसास्त (अवसादग्रस्त) हो तो दूसरों के भी उसके प्रभाव में आने की कुछ तो सम्भावना होती ही है। आज जितनी बड़ी तादाद में हमें अवसाद के मामले देखने या सुनने को मिल रहे हैं उसकी वजह है हमारी जीवनशैली में आया बदलाव।
अवसादग्रस्त व्यक्ति को दें हौसला
अगर किसी के घर में, पास-पड़ोस में कोई अवसाद का शिकार व्यक्ति हो तो उसे हौसला देना चाहिए। एक सकारात्मक तरीके से उसकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए। कभी भी ऐसे लोगों की समस्या को झुठलाने की कोशिश न करें। यह चीज किसी भी अवसास्त व्यक्ति के लिए काफी कष्टदायक बन जाती है। यह सही है कि महानगरीय जीवनशैली में हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं पर इन सबके बावजूद हम एक-दूसरे को समय दे सकते हैं, एक-दूसरे के जीवन में दिलचस्पी ले सकते हैं। इस चीज का आज एक बड़ा अभाव पैदा हुआ है। इसके लिए हम सभ्यता को दोष देकर बच नहीं सकते। हम अपनी आदतों में बदलाव करके ऐसी परिस्थितियों को पैदा होने से रोक सकते हैं।व्यक्तिगत स्तर पर हमारा प्रयास यह हो सकता है कि हम अपनी नकारात्मक भावनाओं को अपने पर हावी न होने दें। अगर हम कभी असफल होते हैं तो उसे महसूस अवश्य करें पर यह न सोचें कि आपके साथ बहुत बुरा हुआ है। परिवार के स्तर पर हम लोगों को समझाने की कोशिश कर सकते हैं। पर हमें उन पर अपनी राय थोपने की कोशिश न करें। उनकी बात ध्यान से सुनें और जरूरत के अनुसार सहयोग दें। सरकार के स्तर पर भी कुछ प्रयास किये जाने की जरूरत है। हमारे देश में एक खास वर्ग के अन्दर ही इन परेशानियों को लेकर जागरूकता है, वरना अधिकतर लोगों में काफी भ्रान्तियाँ हैं। सरकार लोगों को जागरूक बनाने की दिशा में पहल कर सकती है। हमारे देश में सरकारों का सारा ध्यान और सारे संसाधन गरीबी जैसी समस्याओं को दूर करने में लग जाते हैं। उनकी सीमाएँ हैं पर मेरा मानना है कि ये समस्याएँ भी अहम हैं जिन पर प्राथमिकता के साथ ध्यान दिये जाने की जरूरत है।


उपजी त्रासदी सामाजिक ताना-बाना टूटने से


जीवन शैली के पश्चिमी मॉडल के अपनाए जाने के बाद से हमारा सामाजिक ताना- बाना बिखराव का शिकार हुआ है, हमारी मूल्य पद्धति, सामाजिक आचार- व्यवहार सब टूट रहे हैं। इन हालात में अगर इस किस्म की घटनाएं नहीं होंगी तो कब होंगी? महानगरीय जीवनशैली के कारण पैदा हुए इस अलगाव के कारण पश्चिम में अवसाद की समस्या काफी सामने आई थी, पर उन्होंने अपने यहां ऐसी व्यवस्था निर्मित की जहां ऐसे लोगों को देखभाल से लेकर उपचार और सहयोग प्राप्त हो सके। हालांकि आगे चल कर उन्हें भी यह मानना ही पड़ा कि यह व्यवस्था भी बहुत कारगर नहीं है और उन्हें दुबारा परिवार तथा समाज जैसी संस्थाओं की तरफ लौटना ही होगा। पर दुर्भाग्य से हमारे देश में विकास के इस नजरिये और तौर-तरीके से उत्पन्न होने वाली सामाजिक समस्याओं के निराकरण की बात सोची ही नहीं गई। नोएडा की घटना इसी आपाधापी और गहरी उदासीनता का एक नतीजा है।
अवसाद अपने आप में काबू हो जाने वाली बीमारी
अवसाद या डिप्रेशन भी अन्य बीमारियों की तरह एक सच्चाई है। मुश्किल तो यह है कि लोग इसे बीमारी मानते ही नहीं जबकि यह एक मानसिक बीमारी है। अवसाद की एक वजह तो शारीरिक होती है जैसे हमारे शरीर में न्यूरो ट्रांसमीटर्स का बढ़ जाना और दूसरी वजह कोई ऐसी घटना या आपदा भी हो सकती है जिससे आप गहरी निराशा में चले जाते हैं। दोनों ही हालत में हमारी सोच, भावनाओं और व्यवहार तीनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। इन तीनों का ऐसा चक्र बन जाता है जिससे आप चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाते। नोएडा की घटना पहली नजर में अवसाद से जुड़ी नहीं लगती। यह गम्भीर प्रकार की सीजोफ्रेनिया या मानसिक बीमारी हो सकती है। वैज्ञानिक सोच यह बताती है कि अवसाद सेल्फ मोटीवेटिंग या अपने आप काबू में आ जाने वाली बीमारी है। एक निश्चित समय-सीमा में यह स्वत: ठीक हो जाती है पर खतरे की बात तब होती है जब आप उससे पूरी तरह निकल नहीं पाते और एक अगले चक्र में फंस जाते हैं। ऐसे लोगों को उपचार की जरूरत होती है। अधिकतर अवसाद के मामलों में किसी दवा या मनोचिकित्सक की जरूरत नहीं पड़ती। आचरण में बदलाव कर और सायकोथेरेपी से अधिकतर मामले ठीक हो जाते हैं।
नकारात्मक मनोवृत्तियों से आता है डिप्रेशन
अवसाद का अकेलेपन से बड़ा ही गहरा नाता है। जो भी सामाजिक परिवर्तन हमें अपनों से या समाज से अलग ले जाता है, चाहे आप उसे भूमंडलीकरण का नाम दें या आधुनिकता का, वह अवसाद का कारण बन जाता है। जब व्यक्ति अकेला होता है तो उसे अपनी खबर नहीं होती, खुद को परखने का मौका नहीं मिल पाता। कोई उसे यह नहीं बताता कि तुम कैसे दीख रहे हो, क्या कर रहे हो। इस हालत में व्यक्ति गहरी निराशा और नकारात्मक मनोवृत्तियों का शिकार बन जाता है और धीरे-धीरे वह अवसाद की चपेट में आ जाता है। अवसाद कभी एक दिन का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे एक प्रक्रिया रही होती है। अगर हम इस प्रक्रिया के बीच में ही हस्तक्षेप करें तो आने वाले दुष्परिणाम को रोक सकते हैं। विडम्बना है कि स्वास्थ्य से जुड़े हमारे सरकारी आंकड़ों में आज भी टी.बी., अस्थमा, मलेरिया, एड्स जैसी बीमारियों को तो शामिल किया जाता है पर मुझे नहीं लगता कि वहां अवसाद जैसी बीमारियों की कोई र्चचा भी होती है।
सिर्फ पढ़े-लिखों को ही नहीं होता अवसाद
अवसाद से सम्बंधित कई प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचलित हैं जैसे यही कि यह ज्यादा पढ़े-लिखे और बहुराष्ट्रीय निगमों जैसे बड़े संस्थानों या सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों में काम करने वाले लोगों को अपना शिकार बनाती है। मेरे विचार से यह सोच सही नहीं है। जब हम देखते हैं कि पिछले एक दशक में ही देश के दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या करने जैसा कदम उठाया है तो यह धारणा देर तक नहीं ठहरती। हाँ पुरुषों के मुकाबले स्त्रियाँ बड़ी संख्या में अवसाद का शिकार होती हैं यह बात एक हद तक ठीक है पर वे ऐसी परिस्थितियों से ज्यादा मजबूती से निपट लेती हैं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसकी एक बड़ी वजह स्त्रियों का अभिव्यक्ति सम्पन्न होना है। वे रो लेती हैं, बतिया लेती हैं और आसानी से अपना गुबार बाहर निकाल लेती हैं। स्त्रियों के अवसादग्रस्त होने की कई वजहें हैं। जैसे- काम का दबाव, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का न होना, उत्पादन पर स्वामित्व का न होना और सामाजिक कायदे- कानूनों का पालन करने की अधिक अपेक्षा। अवसाद का उपचार सम्भव है पर सबसे पहले तो हमें यही समझने की जरूरत है कि यह वाकई एक बीमारी है और पीड़ित इंसान मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रहा है। यदि हम ऐसे लोगों को अहमियत दें, उनके साथ थोड़ा वक्त गुजारें तभी वे अपनी समस्याएं हमारे साथ बांटेंगे। हो सकता है इसमें थोड़ा अधिक वक्त लगे। जो व्यक्ति ऐसी स्थिति में हो उसके लिए सबसे अच्छा है कि वह अपना व्यवहार, अपनी दिनर्चया बदले। पर यदि कोई ऐसा करने के लिए कोई उस पर दबाव डाले तो शायद यह सम्भव नहीं होगा। अवसाद से जुड़े बहुत कम ऐसे मामले होते हैं जिनमें दवाएं लेने की जरूरत होती है। अधिकतर मामलों में बातचीत, सायकोथेरेपी से उपचार किया जा सकता है। सामुदायिक व्यवहार को हम हमेशा निर्धारित नहीं कर सकते। चूंकि वह एक समूह की तरह काम करता है इसलिए ऐसे मामलों में वह ज्यादा सहायक नहीं हो सकता। यहां सबसे अधिक जिम्मेदारी परिवार की बनती है, समाज उसकी जगह नहीं ले सकता। हालांकि यदि समाज में भागीदारी की, सहयोग की भावना हो तो ऐसी नौबत आए ही नहीं। एक बात और यह कि हम अवसाद को आलस्य, कामचोरी, इच्छाशक्ति में कमी आदि न समझें। हमारी उदासीनता ही अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। (श्री अरविंदर, डॉ. मोनिका और डॉ. शर्मा के विचार राजेश चंद्र की बातचीत पर आधारित)

सामूहिकता में करें जिंदगी के अर्थ की तलाश


पहले हमारे संयुक्त परिवार हुआ करते थे, आपसी मेल-जोल होता था, सहभागिता वाली एक सामाजिक व्यवस्था हुआ करती थी जिससे काफी फायदा मिलता था। अकेलेपन की कोई जगह नहीं थी। लोग एकदू सरे का हाल-चाल लेते रहते थे। संयक्त परिवार के टूटने और पति-पत्नी के कामकाजी होने से ज्यादा मुश्किल खड़ी हुई है। मां-बाप बच्चों को सप्ताहांत में ही दिखाई देते हैं। जीवनशैली पूरी तरह से बदल गई है। नोएडा की घटना यह दर्शाती है कि यह हममें से किसी के भी घर में हो सकता है। लोगों ने सोच लिया कि यह उनका स्वभाव है। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोग जागरूक नहीं हैं। जब तक मां-बाप जिंदा रहे उनकी परेशानी दबी रही। उनके जाने के बाद भाई अपनी बहनों की स्थिति से अनजान रहा। यही वह परिस्थिति थी जिसकी वजह से दोनों बहनें मानसिक कमजोरी का शिकार हो गई। इस दशा में शुरुआती लक्षण के साथ ही उपचार की जरूरत होती है पर इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा सका।
किसी मकसद से जोड़ना हो सकता है इलाज
अवसाद के कई कारण हो सकते हैं पर क्लिनिकल अवसाद का कारण तो मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन होने को ही माना जाता है। मानसिक आघात आदि में जो अवसाद उत्पन्न होते हैं उनमें यदि दो-चार सप्ताह में ही मदद न मिले, सपोर्ट सिस्टम मजबूत न हो, कोई ध्यान न दे तो हालात खराब हो जाते हैं। कुछ आघात तो इतने सख्त होते हैं कि लोग उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाते। अकेलापन भी कई बार अवसाद की वजह बन जाता है। आज हम निजी जिंदगी में सिमटते जा रहे हैं, महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पातीं। बढ़ती उम्र में जब महिलाओं के पास समय होता है तो उन्हें यह अहसास होता है कि उन्होंने अपने लिये तो कुछ किया ही नहीं। इससे उनके अवसाद में जाने का खतरा बढ़ता है। महानगरीय जीवन की भागमभाग में अकेले पड़ जाना बहुत असामान्य बात नहीं है, पर हम किसी मकसद के साथ या किसी संगठन के साथ खुद को जोड़े रखकर इस परिस्थिति से बच सकते हैं। अवसाद जैविक कारणों से हुआ हो तब भी पीड़ित को चिकित्सकीय उपचारों के साथ अन्य सहायता भी उपलब्ध करानी चाहिए। आजकल बच्चों और महिलाओं में अवसाद की घटनाएं बढ़ी हैं। बच्चों में परीक्षाएं, प्रतिस्पर्धा आदि इसके लिए माहौल तैयार करती हैं। महिलाओं में चूंकि संवेदनशीलता ज्यादा होती है और वे खुद को अभिव्यक्त भी ज्यादा कर पाती हैं पर जब ऐसा नहीं हो पाता तो इससे मुश्किल स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पुरुषों में अभिव्यक्ति का अभाव होता है, जब वे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते तो उन्हें अवसाद होता है। मूल रूप से अवसाद का जो सबसे प्रमुख कारक है वह है आत्म-गौरव की कमी या आंतरिक आघात। जीवन-चक्र में बदलाव भी इसका एक बड़ा कारक है। हम अपनी जिंदगी में किसी खास चीज के पीछे भागते हैं। बच्चे घर में लौटते हैं तो घर मे नाना-नानी, दादा-दादी नहीं होते। मां-बाप अकेले हैं। ऐसा कोई मौजूद नहीं होता जिनके साथ वे अपनी भावनाएं साझा कर सकें। धीरे-धीरे उन्हें अकेले रहने की आदत हो जाती है। आगे चल कर यह अवसाद का कारण बन जाता है।
नकल की फेर ने बढ़ाई समस्या
आज जैसे-जैसे पश्चिमीकरण में तेजी आ रही है, जिंदगी में भूमिकाओं को लेकर एक विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। हम एक ऐसी 'सैंडविच जेनरेशन' हैं जिनके लिए सब कुछ या तो बदल चुका है या बदलने वाला है। हम अपनी जिंदगी में वैसे ही रह पाते हैं जैसे कि हम पले-बढ़े हैं पर दूसरों की नकल के फेर में पड़कर हम अच्छे-बुरे का फर्क तक भूलते जा रहे हैं। समाज का इकट्ठापन समाप्त हुआ है और सामूहिकता की भावना भी कमजोर पड़ चुकी है। अवसाद के बढ़ते मामलों की पृष्ठभूमि में सबसे महत्वपूर्ण कारक भी यही है। मैं यह नहीं कहता कि हम नएपन को न अपनाएं पर हम इसके चक्रव्यूह में न फंसें और और न ही खुद को खोएं। पूरी दुनिया आज एक इल्यूजन के पीछे भाग रही है। कुछ लोग लैंगिक भेदभाव को भी अवसाद की वजह मानते हैं पर मुझे ऐसा नहीं लगता। इस सम्बंध में जो आंकड़े भी उपलब्ध हैं वे भ्रमित करने वाले ही हैं। एक स्त्री भेदभाव का शिकार भी हो सकती है और मौका मिले तो वह 'झांसी की रानी' भी बन सकती है। मुक्त बाजार वाली नई विश्व व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के बढ़ने से बड़ी कम्पनियों या संस्थानों में अपने कामगारों से ज्यादा काम लेने के रुझान बढ़े हैं जिसकी वजह से लोगों पर दबाव बढ़ गया है और वे अधिकांश वक्त में तनाव में रहने लगे हैं। ऐसे संस्थानों की नीतियां अधिक मानसिक दबाव या असंतोष उत्पन्न कर सकती हैं। हम चाहें तो इसे भी एक किस्म के अवसाद की श्रेणी में रख सकते हैं।
अशांति से अवसाद का खतरा अधिक
मेरे विचार से जिन लोगों के परिवार में अशांति रहती है, जिनका जीवन व्यवस्थित नहीं है वैसे लोग अवसाद के आसान शिकार बनने की ज्यादा सम्भावना रखते हैं। इसलिए अगर आपको कोई चीज परेशान कर रही हो तो इसे छिपाएं नहीं, किसी सही व्यक्ति के साथ बांटने की कोशिश करें। बंद कमरे में खिड़की खोलने से जिस प्रकार ताजा हवा आती है और घुटन बाहर निकल जाती है उसी तरह किसी सही व्यक्ति का साथ मिले तो हम अपनी परेशानियों को कम कर सकते हैं। जिंदगी में किसी अच्छे मकसद से जुड़कर, किसी सामूहिक भागीदारी वाले कार्य-कलाप में शामिल होकर हम अपनी जिंदगी को मायने दे सकते हैं। इससे हमारा अकेलापन हमसे दूर रहता है। हमें अपने से अलग लोगों के लिए, समाज के लिए कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए जो हमारी जिंदगी को एक सार्थकता का अहसास कराए। पेंटिंग, गायन, संगीत आदि के अलावा रीडर्स क्लब आदि भी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अपने आपको अहमियत देना भी बहुत जरूरी है। इन सबके बावजूद यदि कभी मानसिक कमजोरी के लक्षण महसूस हों तो हमें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। संकोच को पूरी तरह त्याग कर समय पर उपचार और काउंसिलिंग लेकर हम निश्चित रूप से खुद को उस किस्म के अवसाद से बचा सकते हैं जो आगे चल कर जानलेवा भी हो सकता है। हालात अक्सर इस संकट को बढ़ा देते हैं। समाज को इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है कि अवसाद एक सामान्य बात है पर अगर यह महीने भर तक जारी रहे तो इसकी अवहेलना करना नुकसानदेह हो सकता है।


सोच, जीवन शैली, और केमिकल लोचा


प्रकृति की तरफ से ही मनुष्य को सामाजिक परिवेश मिला है। इस परिवेश को जितना वृहत तौर पर देखा जाए, समझा जाए या अपनाया जाए, श्रेष्ठकर है। मानव के लिए भी और प्रकृति के लिए भी है। इसलिए हम गौर करते हैं कि हमारे आस-पास सिंबायोटिक रिलेशन (सहजीवी सम्बंध) है। इस तरह के सम्बंध में पेड़-पौधे, पशु- पक्षी और मनाव समाज के विभिन्न तबके भी शामिल हैं। शास्त्रों ने तो यहां तक कि निर्जीव पदार्थो मसलन, पहाड़ों, सागर और बादल से भी किरदार की बातचीत कराई है। जहां अभिव्यक्ति का जरिया नहीं मिला, वहां हाव-भाव से ही आपस में सम्बोधन हुआ है। इसीलिए तो मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, मनुष्य का प्रकृति से कटाव हो गया है। इस कटाव के चलते ही प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा जैसे मामले बढ़े। मध्य आधुनिक जीवन शैली के चलते विकासवाद, बाजारवाद और पूंजीवाद का वर्चस्व रहा। तदुपरांत आज का समाज अत्याधुनिक जीवन शैली या उत्तर आधुनिक जीवन शैली में प्रवेश कर चुका है, जहां आदमी का आदमी से कटाव हो गया है। चाहे वह रिश्ते-नाते के स्तर पर हो या पड़ोसी के स्तर पर। इसलिए शहरों में मानसिक रोग के मामले बढ़े हैं। गांवों में आज भी सामाजिक आवरण को कमोबेश ढोया जा रहा है लेकिन शहरों में यह छिन्न-भिन्न हो चुका है। बहरहाल, जिसे हम अवसाद, अलगाव, अकेलापन, मानसिक तनाव या डिप्रेशन का नाम देते हैं, वस्तुत: वह मानसिक रोग है। इसलिए किसी मरीज के बारे में यह कह देना कि यह डिप्रेशन में है, मेडिकल साइंस की भाषा में गलत है। मानसिक रोग के कई प्रकार होते हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक अब तक मनुष्य में 200 तरह के मानसिक रोग पाए गए हैं। इसकी संख्या साल दर साल बढ़ भी रही है लेकिन सामान्यत: 12 प्रकार के मानसिक रोग आम हैं। इनमें ही एक रोग डिप्रेशन है जिसके मामले भारत समेत दुनिया भर के देशों में काफी ज्यादा हैं। हाल ही में नोएडा में दो बहनों के डिप्रेशन का मामला सामने आया था, जिनमें एक की बाद में मौत हो गई थी; उसे डिप्रेशन नहीं, साइकोसिस था। ये भी मानसिक रोग का एक और प्रकार है। वैसे हम यह नहीं कह सकते हैं कि मानसिक रोग आधुनिक या उत्तर आधुनिक जीवनशैली के विकास का नतीजा है, क्योंकि इससे काफी नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। इससे हम काफी हद तक किसी के आधुनिक जीवन शैली से मानसिक तनाव में जा सकते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हम जीवनशैली के मुद्दे को उठाने के बावजूद मानसिक रोग के कारकों को तलाशें। मसलन मानसिक रोग के जैविक कारक क्या हैं, सोचने के नजरिये में किस तरह का बदलाव आ रहा है और सामाजिक परिवेश में क्या बदलाव हुआ है? इन कारकों पर सार्थक बहस करके हम आधुनिक जीवन शैली को अपनाते हुए भी इनकी खामियों से दूर रह पाएंगे। वैसे जैविक कारक को छोड़ दें तो बाकी बचे दो कारकों को परिवेश की मदद, परामर्शदाताओं की सलाह से दूर कर सकते हैं। जैविक कारक में मस्तिष्क में रासायिनक बदलाव आते हैं यानी कि दिमाग में केमिकल लोचा होता है। इसे दवाइयों की मदद से दूर किया जाता है। बहरहाल, सवाल यह भी उठने लगा है कि मानसिक रोग एक काल्पनिक उपज तो नहीं बनकर रह गया है क्योंकि शहरों में इसे गम्भीर बीमारी के तौर पर देखा जा रहा है। बाजार इसके मुताबिक अपनी दवाइयों को उतार रहा है। डॉक्टरों का धंधा चल रहा है। दरअसल इसके पीछे कुछ लोगों का तर्क यह है कि मानसिक रोग एक नई बीमारी है, पहले यह बीमारी नहीं थी। निजी तौर पर मैं इससे असहमत हूं। यह बीमारी सभी सजीवों में पाई जाती है। आपने देखा होगा कि कभी-कभी एक चिड़िया किसी कारणवश खुद को अपनों से अलग कर लेती है। ये भी मानसिक रोग की निशानी है। मानसिक रोग सब में पाया जाता है और हर दौर में यह समस्या बनी रही है। अहम यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति इसे किस तौर पर लेता है। अब्राहम लिंकन और गालिब भी उसके दौर से गुजर चुके हैं फिर भी वे महान बने क्योंकि उन्होंने इस पर चिंतन कर सकारात्मक रवैया अपनाया। इसलिए अवसादग्रस्त शख्स चाहे तो खुद अपने आत्मबल से इस समस्या से निजात पा सकता है। वहीं इस समस्या की शुरु आत के साथ ही अपने चारों तरफ एक तरह का आवरण बना लेने से, आपस में संवाद तोड़ लेने से, नकारात्मक सोच को बढ़ावा देने से यह बीमारी भयंकर रूप धारण कर लेती है। (डॉ. अचल भगत से प्रभाकर की बातचीत पर आधारित)


आधुनिकता पर सवाल नहीं खड़ा करता अवसाद


हमारी परम्परागत संयुक्त परिवार पण्राली के साथ कुछ नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियां जुड़ी थीं। लेकिन आज शहरीकरण की प्रक्रिया के चलते शहरों में रहने और रोजगार प्राप्त करने के लिए जो दबाव पैदा हुआ है उसका पुरानी पद्धति के साथ द्वंद्व स्वाभाविक है। नोएडा की घटना से जो तथ्य सामने आए हैं उससे यही जाहिर होता है। उसके साथ-साथ यह भी समझना जरूरी होगा कि यद्यपि ये प्रक्रियाएं चल रही हैं और इससे संयुक्त परिवार पर काफी दबाव पड़ रहा है, फिर व्यापक रूप से यह कहना कि देश में यह विलगाव बहुत ही सर्वव्यापी हो गया है, सही नहीं होगा। इसके कई कारण हैं जिनमें एक तो यह है कि हमारी जो आधुनिकता है वह बहुत ही संकुचित किस्म की है। एक दृष्टि यह कि नगरीकरण की प्रक्रिया, गांवों से शहरों में पलायन की प्रक्रिया, नौकरियां लेने के लिए दूरदराज जाने की प्रक्रिया एक संकुचित वर्ग तक ही सीमित है। हमें देखना होगा कि आज भी हमारे यहां 50 प्रतिशत से अधिक लोग गांवों में रहते हैं। एक तरह से इस प्रकार की प्रक्रिया दिखाई पड़ती है, जहां अवसाद के कारण इन लड़कियों ने समाज से अपने को बिल्कुल अलग-थलग कर लिया। उनमें अब समाज से कोई उम्मीद नहीं बची और एक निराशा, एक परित्याग की भावना से वे पीड़ित दिखाई पड़ती हैं। दूसरी तरफ और भी प्रक्रियाएं मौजूद दिखती हैं जहां पर परम्परा अपने को दबाव डालकर, अपने ढंग से संयुक्त परिवार की, बिरादरी की या जाति की जिम्मेदारियों को लागू करना चाहती है। जैसा कि खाप पंचायतों में देखने को आता है या फिर डिसऑनर किलिंग जैसी घटनाएं होती हैं। या फिर लड़कियों-महिलाओं के अधिकारों का दमन कर और उसे नजरअंदाज कर नियम लागू किए जाते हैं।
जरूरी है सामंजस्य
भारतवर्ष अब भी एक संक्रमण की प्रक्रिया में है और इस प्रक्रिया में नोएडा की घटना जैसा जो केस है, उसमें कई मुद्दे सामने आते हैं। पहला मुद्दा यह है कि ये घटना मात्र आधुनिकीकरण का नतीजा नहीं है क्योंकि यदि आधुनिकीकरण समग्र होता तो ये लड़कियां सबल और सशक्त होतीं। इनके पास स्वावलम्बी बनने की उपलब्धि होती। वह क्यों नहीं हो पाया जिससे ये लड़कियां असहाय होने की हालत में पहुंच गई, इसमें सामाजिक तंत्र का मुद्दा भी अंगों और प्रक्रियाओं को ध्यान में रखना होगा। अपने आप में यह घटना बहुत ही दु:खदायी है। यह एक चरमसीमा है इस अभिव्यक्ति की कि उनमें पूर्ण रूप से अवसादमात्र ही नहीं बल्कि परित्याग की भावना ही है। इससे समाज को एक संदेश जाना चाहिए। दूसरी प्रक्रिया यह है कि जब कभी इस प्रकार का नगरीकरण होता है जहां पर नगर में, शहरों में, मुहल्लों में लोग अपने-अपने फ्लैट्स या घरों में रहते हैं तो वहां पर गुमनाम होने का वातावरण होता है। गुमनाम होना अपने में ही एक प्रकार की समस्या है। एक तरफ तो यह व्यक्ति को सशक्त करती है कि उसके ऊपर कोई बाहर का दबाव नहीं होता, जबकि दूसरी तरफ यह विलगाव भी उत्पन्न करती है। यदि कोई सामाजिक दबाव या मनोवैज्ञानिक दबाव सामने आता है, या किसी प्रकार के आर्थिक या सामाजिक कारणों से उसके ऊपर दबाव आया तो अपने दु:ख को उसे दूसरों से अभिव्यक्त करने या बांटने का मौका नहीं मिलता। हालांकि अभी हमारे नगरों में कुछ हद तक सामाजिक संस्था के परम्परागत तत्व बरकरार हैं। कम्युनिटीज हैं, क्लब हैं, वेलफेयर एसोसिएशन हैं, इत्यादि। फिर भी क्रियात्मक रूप से उनके काम में बहुत कमी दिखाई पड़ती है। क्योंकि एक तरफ तो कम्युनिटी लिविंग और उसकी जिम्मेदारियां और दूसरी तरफ एकाकीपन। तो इन दोनों के बीच में भी एक सामंजस्य होना चाहिए। जैसा कि इस केस में सामने आता है कि बहुत दिनों तक ये लड़कियां अलग-थलग रहीं। कोई अगर उनके पास आता- जाता भी था तो वे उन्हें अस्वीकार करती थीं। फिर भी किसी सामाजिक संस्था या कार्यकर्ता समूह ने या किसी सिविल ' सोसाइटी संस्था उनकी समस्या को नजदीक से जानने-समझने की कोशिश नहीं की। वह तो जब मामला अंत तक पहुंच गया, तब इसमें हाथ डाला गया।
आधुनिकता के फेल होने का उदाहरण
यह प्रकरण इस बात को उजागर करता है कि इस तरह की जो नई समस्याएं सामने आ रही हैं, यद्यपि वे सीमित हैं लेकिन बढ़ती जा रही हैं। यह आधुनिकता का अंग नहीं है बल्कि यह तो आधुनिकता के फेल हो जाने का उदाहरण है। अगर आधुनिकता पूरी तरह से लागू होती तो ये लड़कियां सशक्त होतीं। उनका त्रास आधुनिकता के नाते नहीं है बल्कि आधुनिकता से वंचित रह जाने के कारण है। तो हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि आधुनिकता इसके लिए दोषी है। इससे यह संदेश मिलता है कि हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी जो आधुनिकता है वह सर्वागीण हो और संस्थापित हो। उसके लिए नए-नए जो संस्थात्मक पण्रालियां हैं, उनको हम सार्थक ढंग से आगे बढ़ाएं और लागू करें। अगर विश्वव्यापी दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमें परिवार को लेकर पुरातन और आधुनिक दोनों प्रक्रियाएं दिखाई पड़ती हैं। एक तरफ इसमें बिखराव भी दिखाई पड़ता है, नए मूल्यों का उजागर होना भी दिखाई पड़ता है, जिसका यौन विचारधारा से सम्बंध है। इसमें बिना शादी किए साथ रहना भी संस्थात्मक दृष्टि से स्वीकार्य है। बहुत से देशों में भारतवर्ष समेत इसे वैधानिक रूप दे दिया गया है। एक तरफ तो यह दिखाई पड़ता है कि स्त्री और पुरुष के अधिकारों और जिम्मेदारियों की जो परिभाषा थी उसमें भी बदलाव आ रहा है और एक नया आयाम धीरे-धीरे उभर रहा है। दूसरी तरफ विकसित देशों में अब भी परिवार कायम हैं। भारतवर्ष में तो हम अभी भी परम्परा से काफी हद तक जुड़े हुए हैं क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वह बदलाव अभी नहीं आ पाया है जिसे आधुनिकीकरण की समग्र शक्तियां उजागर हो सकें। आज भी हम कृषि प्रधान देश हैं, अब भी हमारे यहां बहुत बड़ी संख्या शिक्षा से वंचित है। अब भी अशिक्षित लोगों में स्त्रियों की संख्या बच्चों से ज्यादा है। अब भी हम कृषि प्रधान देश हैं। अब भी हम नवीनतम तकनीकों को पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर पाए हैं।
अभी आनी है आधुनिकता की बड़ी प्रक्रिया
हमारे देश में बहुसंख्यक आबादी आर्थिक दृष्टि से अत्यंत निर्बल है, तो आर्थिक आधुनिकता यहां पूरी तरह नहीं आ पाई है। आर्थिक आधुनिकता एक आधार होता है जिससे दूसरी किस्म की आधुनिकता उभरती है। शिक्षा और अर्थव्यवस्था इसके दो अंग हैं। हालांकि आंकड़े आ रहे हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं तो अगले दस वर्षो में एक बहुत बड़ी आधुनिकता की प्रक्रिया यहां कदम रखेगी। उसके साथ-साथ हमें इस बात का भी ध्यान रखना है कि परिवार से संबंधित जो हमारे मूल्य हैं, जिसमें मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी। स्त्री-पुरु ष के बीच लैंगिक भेदभाव के प्रति हमारा नजरिया और रवैया, साथ ही साथ एक दूसरे के दु:ख-सुख बांटने की प्रक्रिया में किस प्रकार बदलाव आया है। यदि समग्र रूप से देखा जाए जो अध्ययन हुए हैं, उनमें युवा वगरे के मूल्य अब भी वे पुरानी जिम्मेदारियां हैं जो परम्परागत मूल्य हैं उसे वे खारिज नहीं करते। किसी मजबूरी के नाते उसे वे नहीं कर पाएं, यह दूसरी बात है। लेकिन मूल्य के आधार पर व अब भी जुड़े हैं। अब भी लोग शहरों से जाकर अपने गांव में अपने त्योहार परम्पराओं और जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। तो जाहिर है कि एक ओर तो आधुनिकता आ रही है जबकि दूसरी तरफ लोग अपने परम्परागत मूल्यों को भी नहीं भूले हैं। अब तो परम्पराएं गांवों से निकलकर शहरों में आ रही हैं। आधुनिकता और परम्परा की दोनों प्रक्रियाएं आज साथ-साथ उजागर हो रही हैं। कुल मिलाकर नोएडा की घटना से सबक मिलता है कि जब आधुनिकता की प्रक्रिया बढ़ती है तो उसमें मैलएडोप्टेशन यानी उनके साथ सामंजस्य स्थापित न कर पाने की कमी स्वाभाविक है जो कुछ केसेस और घटनाओं में आगे भी आएगी। ये एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है लेकिन यह होती है। ऐसी प्रक्रियाएं तभी रोकी जा सकती हैं जब उसकी संस्थागत जवाबदेही निर्धारित हो। इसलिए हमें ऐसी संस्थाएं बनानी चाहिए जो ऐसी घटनाओं पर नजर रखें और उन्हें रोकने में सहयोग दे। (योगेन्द्र सिंह से शशिभूषण कुमार की बातचीत पर आधारित)