दलित समाज में भी जातिगत विभाजन चिंतित करने वाला है
इन दिनों समाज, साहित्य और सियासत में दलितों, पिछड़ों और स्त्रियों की आवाजें रचनात्मक शक्लों में सामने आ रही हैं। ये आवाजें संख्या की अधिकता के कारण सियासत में निर्णायक होती जा रही हैं। कहा जा सकता है कि देशी उत्तर आधुनिकता के विमर्श का आगाज यूरोप की नकल पर नहीं हो रहा। जबकि दलित-पिछड़ी स्त्रियों की साहित्य, शिक्षा और मीडिया में अभी कोई आवाज नहीं है। उनका प्रतिनिधित्व उनके अभिजात कुलीन मालिकान से कराया जा रहा है।
इधर समाज, साहित्य और सियासत में बहुत कुछ घटित हुआ है। इन पंक्तियों का लेखक हाल ही में बिहार की राजधानी पटना में था। साहित्य अकादेमी और पटना विश्वविद्यालय के सौजन्य से वहां दलित साहित्य पर राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का आयोजन हो रहा था। वातावरण में नई सरकार की जीत के जश्न का रंग बाकी था। कुछ बुद्धिजीवी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वापसी के दो कारण बता रहे थे-एक बिहार में विकास कार्य बहुत हुआ है, और दूसरे चुनाव जातिवाद से मुक्त होकर लड़ा गया है। पर मौके पर देखने-जानने से दोनों बातें गलत लगीं। जिस होटल में लेखक ठहरा था, उसी के ठीक सामने गंदगी के दर्शन भोर होते हो गए थे। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मित्रा ने तुरंत इसका नोटिस लेते हुए कहा, यहां के मुख्यमंत्री के शपथ समारोह के समय ऐसी गंदगी है, जबकि लखनऊ को देखो, कैसा कायाकल्प किया है बहन जी ने! जहां तक जातिवाद का प्रश्न है, तो उसका भी चुनाव में खूब सहारा लिया गया। केवल जातिगत समीकरणों में बदलाव भर हुआ है, जातिवाद का खात्मा नहीं हुआ।
दलित साहित्य की बात की जाए, तो आलोचना में प्रेमचंद की नीली आंखें ने मूर्तिभंजन का काम किया है। इधर आत्मकथाएं वाकई सच की परतें उघाड़ रही हैं। मेरी पत्नी और भेड़िया पढ़कर कोई भी सन्न हो सकता है। मुर्दहिया के लोकार्पण के अवसर पर तो बुद्धिजीवियों ने लेखक का दर्द समझने के बजाय दूसरा ही विवाद खड़ा कर दिया। लेखक ने मुर्दहिया को अपने लोगों का जीवन बताया, और यहां तक कहा, हर तीसरे दिन मैं डायलिसिस पर जाता हूं। इसलिए अब तो अस्पताल भी मुर्दहिया यानी मुर्दाघर जैसा लगता है। पाषाण हृदय को पिघला देने वाला यह वाक्य सुनकर भी दिल न पिघले, तो साहित्यिक संवेदनशीलता कहां बचती है? हिंदी के दो महारथी, एक आलोचक और दूसरे कथाकार, पहली बार पुस्तक के विरोध में एक साथ हो गए!
नामवर सिंह की दलित विषयक सीमाएं तो खैर पहले से ही जाहिर थीं। लेकिन राजेंद्र यादव तो दलित साहित्य के पक्षधर के रूप में जाने जाते रहे हैं। उनके स्त्री और दलित विमर्श के बारे में अब तक तो बहुत संदेह की गुंजाइश नहीं थी। फिर भी उस आयोजन में उन्होंने कहा कि दलितों में वर्ण व्यवस्था बढ़ी है और कुछ जातियां दूसरों के मुकाबले खुद को श्रेष्ठ बताने लगी हैं। विरोध के इस बिंदु पर नामवर जी राजेंद्र जी से सहमत हुए और इस आत्मकथा को उपन्यास माना। कहना चाहिए कि राजेंद्र यादव साहित्य के मुलायम सिंह बनकर जाटवों के सामने आए हैं। दबे स्वर में विरोध तो वह कई वर्षों से कर रहे थे, पर अब उनसे रहा नहीं गया।
सच इतना ही नहीं है। विवाद का एक और पहलू फेसबुक के जरिये सामने आए। उस पर एक रिटायर पुलिसकर्मी सामने आया और कहने लगा कि जाटव ऐसी आत्मकथाएं नहीं लिखते। इसका अर्थ यह कि इस जाति को इस तरह नहीं लिखना चाहिए। यानी यह महाशय खुद को दूसरे दलितों से ऊपर मानते हैं। राजेंद्र यादव और उमराव सिंह जाटव जैसों से सिर्फ विनती ही की जा सकती है कि वे पुनर्विचार करें। दलितों की समवेत चेतना को ऐसे कुंद तो कतई न करें। इन्हीं वजहों से दलित आंदोलन को झटका लगता है।
दरअसल दलितों में फूट डालो और राज करो की यह कुनीति उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा की सरकारों द्वारा अपनाई गई थी। मायावती सरकार ने तो न केवल दलित उपजातियों को जोड़ा है, बल्कि पिछड़ी-अति पिछड़ी जातियों और गरीब सर्वजन को साथ लेकर वह बहुजन विस्तार पा गईं। यह सियासी समीकरण भला राजेंद्र जी को कैसे अनुकूल लगे? लेकिन यह परिदृश्य बहुत ही चिंताजनक है। उम्र के इस पड़ाव पर तो उन्हें शोषित-पीड़ितों को मिल-जुलकर काम करने की सीख देनी चाहिए। इन पंक्तियों का लेखक पिछले दिनों एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य वक्ता था। उसका संयोजन भी एक यादव प्राध्यापक ने किया था। उस संगोष्ठी का विषय था-अंबेडकर, गांधी और दलित पत्रकारिता। छह दिसंबर का दिन केवल बाबरी मसजिद विध्वंस के कारण नहीं, बल्कि डॉ. अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के कारण भी उल्लेखनीय है। सही बात तो यह है कि जातिभेद को डॉ. अंबेडकर ने सांप्रदायिकता का ही एक रूप माना है। गांधी जी की वर्ण व्यवस्था, पैतृक पेशा, मशीनीकरण, स्त्री स्वतंत्रता जैसे आधुनिक और लोकतांत्रिक प्रश्नों पर अंबेडकर से असहमति थी। सामाजिक लोकतंत्र के बारे में दोनों में जमीन-आसमान की दूरियां होते हुए भी देशहित के मुद्दे पर वे कुछ दूर साथ चल सके, तो दलितों की विभिन्न उपजातियां वैयक्तिक कारणों और क्लेशों से हटकर व्यापक स्वजनों के हित में क्या दो कदम भी साथ-साथ नहीं चल सकेंगे? दलित अथवा अस्पृश्य शब्द में समाई सैकड़ों जातियां क्या अपनी ही जातियों के बुद्धिजीवियों से उम्मीद बांधे रहेगी? क्या जाति-उपजाति के विभाजन को छोड़कर उन्हें संयुक्त मोरचा बनाते हुए नए तरह की अस्पृश्यता के विरुद्ध उठ खड़ा नहीं होना चाहिए? दूसरी तरफ क्या साहित्यिक बुद्धिजीवी आज के राजनेताओं से भी तंगदिल और तंग नजर साबित होंगे?
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