Saturday, January 15, 2011
बेघरों की पीड़ा
रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर रुख करने वाले गरीब गुर्बा लोगों को प्राय: अंदाज नहीं होता कि जिस बड़े शहर वे जा रहे हैं, वहां वे रहेंगे कहां? उनमें से कुछ तो वर्षो तक बेघर ही बने रहते हैं। विभिन्न कारणों से शहरों में आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे बेघर लोग जहां कड़ाके की सर्दी, चिलचिलाती गर्मी या मूसलाधार बारिश की मार सहने को मजबूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी बड़ी समस्या भोजन है। यही कारण है कि देश में हजारों बेघर असमय काल कवलित हो जाते हैं। हर मौसम जब अपने पूरे उठान पर होता है तो बेघरों के मरने की खबरें आने लगती हैं। मसलन इन दिनों कड़ाके की ठंड में मरने वालों का आंकड़ा हर दिन बढ़ रहा है। इससे भी ज्यादा दर्दनाक स्थिति उन बच्चों-बच्चियों की होती है जिन्हें फुटपाथ की जिंदगी यौन उत्पीड़न और नशे की अंधी गली में धकेल देती है। शहरों में जब आम व खास महिलाओं की सुरक्षा पर ही इतनी चिंता व्यक्त की जाती है तो बेघर महिलाओं को क्या कुछ नहीं सहना पड़ता होगा, इसकी कल्पना ही बेहद दर्दनाक अनुभव है। आवास के अभाव में फुटपाथ पर पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से रहने वालों को भी समय-समय पर पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इतना ही नहीं, भिखारियों के नाम पर पुलिस उन्हें भिक्षुगृह भेज देती है जहां महीनों तक कैदियों सा जीवन जीना पड़ता है। महानगरों में सौन्दर्यीकरण के नाम भी आवासविहीनों की समस्याएं और बढ़ जाती हैं। खुले आसमान के नीचे उन्होंने अपने लिए जो थोड़ी सी जगह व्यवस्थित की होती है, इस नाम पर उन्हें वहां से भी खदेड़ दिया जाता है। कुल मिलाकर नगरों महानगरों में बेघरों की सुनने वाला कोई नहीं। सरकार को बेघरों की संख्या का अनुमान लगा जरूरी सुविधाएं मुहैया करवानी चाहिए। इसके लिए रैन- बसेरों की संख्या बढ़ाने के साथ ही उनकी हालत में सुधार होना चाहिए। महिला-पुरुषों के रैन-बसरे अलग-अलग हों लेकिन ये पास-पास होने चाहिए ताकि एक ही परिवार के सदस्य एक-दूसरे से ज्यादा दूर न रहें। कई रिक्शा चालक, ठेले वाले अपनी आजीविका के साधन को असुरक्षित छोड़कर रैन बसेरों में नहीं आ पाते। संभव हो तो रैनबसेरों के बाहर इनके इन साधनों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो। अन्यथा रिक्शा चालकों को विश्राम स्थल पर पालीथीन की शीट, बांस, टिन आदि से अस्थाई आश्रय स्थल बनाने की इजाजत मिलनी चाहिए। खासकर जानलेवा सर्दी के मौसम में विभिन्न धर्मस्थानों से सम्पर्क कर बेघरों को रात बिताने के लिए जगह देने का अनुरोध किया जा सकता है। सरकारी व गैर सरकारी खाली इमारतें भी ऐसे कष्टकारी मौसम में बेघरों का अस्थायी आसरा बन सकती हैं। इसके लिए सरकारी व गैर सरकारी संगठनों को पहल करनी चाहिए। बेघरों के संगठन, उनके प्रतिनिधि ऐसी जिम्मेदारी निभाएंगे और पुलिस के साथ सुरक्षा संबंधी मामलों में सहयोग करेंगे तो पुलिस को अपराधों के नियंतण्रमें भी मदद मिलेगी। बेघरों के संगठन व प्रशिक्षण में सामाजिक कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। वे उन्हें सामुदायिक संबधों को दृढ़ करने के प्रति प्रेरित कर सकते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा के साथ नशामुक्ति के उपाय सुझा सकते हैं। जहां विशेष आवश्यकता होगी, वहां मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता, कुष्ठरोग आदि से जुड़ी विशिष्ट संस्थाओं से उनका संबंध स्थापित करने का प्रयास करेंगे। सरकारी संसाधनों का उचित उपयोग होगा व इसके साथ स्वैच्छिक संस्थाओं के साधन व बेघर लोगों की मेहनत भी जुड़ेगी तो आश्रयविहीन लोगों की भलाई का कार्य तेजी से आगे बढ़ सकेगा। बेघरों को भोजन उपलब्ध करवाने की चुनौती भी बड़ी है। विशेषकर महंगाई के इस दौर में इसकी जरूरत बढ़ रही है। यदि कुछ डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए रैन बसेरों में पहुंचने लगें, तो इससे भी बहुत से जरूरतमंदों की समस्या हल होगी।
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