युवाजनों की वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालते हुए हमें दो अलग-अलग हिस्सों में इसे देखना होगा। पहला यह कि युवाओं के स्वयं के विकास के संदर्भ में क्या चुनौतियां हैं और दूसरे देश के विकास में युवाओं की भागीदारी को लेकर क्या संकट और संभावना है? जहां तक युवाओं के विकास की वर्तमान स्थिति का सवाल है, उसे भी क्षेत्र (शहरी और ग्रामीण), वर्ग (अगड़ा और पिछड़ा) तथा लिंग ( पुरुष और महिला) को दृष्टि में रखते हुए देखना होगा क्योंकि इसके भीतर भी कहीं-कहीं बड़े पैमाने पर अंतर दिखाई पड़ता है। विषमता और विसंगति की कई तरह की परतें समाज में मौजूद हैं। जब समाधान और रास्ते तलाशने होंगे, तब इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
इतिहास के हर कालखण्ड में ‘युवापन’ और ‘युवाजन’ की महत्ता को स्वीकार किया जाता रहा है। समाज ने इन्हें अपनी ताकत समझा है तो राज्य ने अपना हथियार और बाजार ने अपने व्यापार का मूल आधार। लेकिन कमोवेश सब ने इन्हें अपने एजेंडे के केन्द्र में रखा है। यह अलग बात है कि इनकी आवश्यकता, आकांक्षा और भावनाओं को कितना समझा गया, इनकी कितनी कदर की गई या फिर उनके लिए कितने प्रयास किये गये, ये सदैव सवालों के घेरे में रहे हैं। सभी तरह के संघर्षं, आंदोलनों और रचनात्मक प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ये युवाजन हमेशा अपने वर्तमान के संकट और संत्रास के सबसे अधिक भोक्ता रहे हैं। वैसे तो ‘युवा’ की पहचान एक खास आयु वर्ग से होती है। आयु वर्ग का यह विभाजन देश काल और परिस्थिति के हिसाब से दुनिया के देशों ने अलग-अलग रूप से निर्धारित किया है लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने इसे 15 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में चिह्नित किया है तो कॉमनवेल्थ ने 15-29 में। दुनिया के अधिकांश देशों में युवावस्था की शुरुआत 15 वर्ष से मानी जाती है। हांगकांग और नाईजेरिया जैसे ही कुछ देश हैं जो 6 वर्ष की अवस्था से ही युवा वर्ग की श्रेणी में मानते हैं। जहां तक युवावस्था की अधिकतम आयु का सवाल है उसमें मलयेशिया 40 वर्ष को मानते हुए सबसे आगे है। भारत वर्ष में 2003 से पूर्व 15 से 35 आयुवर्ग को युवा माना जाता था। 2003 की राष्ट्रीय युवा नीति में इसे 13 से 35 आयुवर्ग के अंतर्गत माना गया। वास्तव में ‘युवापन’ एक खास तरह की विशेषता है जो इस आयुवर्ग में शारीरिक और वस्तुगत कारणों से अधिकांशत: होती है। वैदिक ग्रन्थों में आत्मविास के साथ शरीर, मन और आत्मा की दृष्टि से जो मजबूत होता है उसे युवा कहा गया है। वर्तमान समय में भी ‘युवा’ की लगभग इन्हीं विशेषताओं को अलग तरीके से संदर्भित किया जाता है। युवा की दूसरी विशेषता यह है कि वह विकास के लिए स्वयं सबसे बड़ा संसाधन है। साथ ही वह अपनी समस्याओं का समाधान तो तलाशता है देश और समाज की चुनौतियों का भी वही सबसे अधिक सामना करता है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संदर्भ है कि आने वाले वर्षों में भारतवर्ष दुनिया का सबसे युवा देश होगा।
यदि आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2016 में भारत की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा युवाओं (13-35 वषर्) का होगा। अर्थात 50 करोड़ से अधिक आबादी युवा होगी। यदि इसे और अधिक गहराई से देखें तो इन 40 प्रतिशत में लगभग 20 फीसद आबादी 20 से 29 वर्ष के बीच होगी, जो युवा काल का सबसे अधिक ऊर्जावान काल है। यदि इस विशाल युवा समुदाय को सही एवं समन्वित तरीके से विकसित नहीं किया गया और इसके उपयोग के लिए पर्याप्त अवसर एवं उचित प्लेटफार्म नहीं तैयार किया गया तो यह उपलब्धि के बजाय संकट और विनाश का कारण भी बन सकता है। आज जब आने वाले वर्षों में दुनिया के सबसे युवा देश के रूप में भारतवर्ष की पहचान होने जा रही है तब अतीत और वर्तमान दोनों के धरातल पर युवा संदभरें को नये सिरे से समझने और समझाने की जरूरत है। भारतवर्ष इस समय एक खास तरह के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां आर्थिक विकास का दौर है वहीं दूसरी ओर मूल्यों के पतन का भी काल है। दहाई की ओर बढ़ती हुई विकास दर से जहां साधन और सुविधाओं के अवसर बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर मानवीय रिश्ते और संवेदनाओं का धरातल सिकुड़ता जा रहा है। आर्थिक विकास के प्रतिस्पर्धा से पैदा हुए भ्रष्टाचार के चलते विषमता और शोषण के गर्भ से हिंसा और अराजकता का एक नया दौर शुरू हो चुका है। जैसा कि समाजशास्त्रियों से लेकर राजनेता तक यह स्वीकार करते हैं कि इस देश में ‘भारत’ और ‘इंडिया’ दो देश हैं।
यह सच्चाई ‘गांव’ और ‘शहर’ के बीच बढ़ती हुई विषमता को इंगित करती है और इसका प्रभाव सबसे अधिक युवाजनों के हिस्से में है। आज का शहरी युवा, जहां अब ‘न्यू इन्टरनेट जनरेशन’ के रूप में पहचाना जाता है वहीं ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को अपनी जड़ों से कटा हुआ बेकार युवा के रूप में पहचाना जा रहा है। युवाओं की वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालते हुए हमें दो अलग-अलग हिस्सों में इसे देखना होगा। पहला यह कि युवाओं के स्वयं के विकास के संदर्भ में क्या चुनौतियां हैं और दूसरे देश के विकास में युवाओं की भागीदारी को लेकर क्या संकट और संभावना है? जहां तक युवाओं के विकास की वर्तमान स्थिति का सवाल है, उसे भी क्षेत्र (शहरी और ग्रामीण), वर्ग (अगड़ा और पिछड़ा) तथा लिंग को दृष्टि में रखते हुए देखना होगा क्योंकि इसके भीतर भी कहीं-कहीं बड़े पैमाने पर अंतर दिखाई पड़ता है। विषमता और विसंगति की कई तरह की परतें समाज में मौजूद हैं। जब तक इनका समाधान नहीं हो जाता, इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जहां तक शिक्षा का सवाल है, उसमें एक ओर बहुत बड़े पैमाने पर बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या है वहीं दूसरी ओर उच्च शिक्षा में पहुंचने वालों की संख्या भी कम है। साथ ही उसकी गुणात्मकता का स्तर,विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रारम्भिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का स्तर काफी चिंताजनक है। पांच छात्रों में से मात्र 2 छात्र हाई स्कूल पास कर पा रहे हैं तो छात्राओं में तीन में से सिर्फ एक। यह आंकड़ा युवा विकास के आगे के रास्ते को बंद करने में काफी बड़ा कारक बनता है। इसी के साथ महिलाओं की साक्षरता दर 54 प्रतिशत होना एक और बड़ा गतिरोध है। इससे युवा विकास की यात्रा का आधार ही कमजोर हो जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर कमजोर वगरें के बच्चों में पाये जाने वाले कुपोषण और उसके बाद स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता के चलते युवापन में शारीरिक दुर्बलता और विभिन्न तरह के रोगों का प्रभाव एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बन जाता है। युवाओं में नशे की लत बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। कृषि जो गांव जीवन की अर्थव्यवस्था का आधार है, उसके प्रति युवाओं का रुझान बड़ी तेजी से घटा है। टेक्नॉलोजी के विकास ने रोजगार के नये अवसर तो दिये हैं लेकिन यह कुछ खास वर्ग के युवाओं (विशेषकर शहरी क्षेत्रों के) तक ही सीमित हो गया है। ग्रामीण युवा सिर्फ गुणात्मक शिक्षा से ही नहीं बल्कि तकनीकी लाभ के अवसर से भी वंचित हो रहा है। भारत में व्यावसायिक प्रशिक्षण पाने वाले युवाओं की संख्या मात्र 5 प्रतिशत है, जबकि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में यह प्रतिशत 80 के आसपास है। कोरिया में तो 96 प्रतिशत है।
इन सबके चलते युवाओं का एक बड़ा समूह असंतोष और हताशा की मन:स्थिति से गुजर रहा है। परिणामस्वरूप कहीं वह आत्महत्या कर रहा है तो कहीं अराजकता और हिंसा को अपना हथियार बना रहा है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार आत्महत्या करने वालों में 38 प्रतिशत 15 से 29 आयुवर्ग के होते हैं। इसके पीछे भी कहीं न कहीं बेरोजगारी और अवसरों की अनुपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण कारक तत्व है। सातवें दशक में जब युवाओं का असंतोष एक व्यापक रूप लेने लगा तथा राजनैतिक हितों के लिए उनके दुरुपयोग का दायरा बढ़ने लगा तब भारत सरकार के स्तर से दो महत्वपूर्ण प्रयास किये गये। कोठारी कमेटी की संस्तुति के आधार पर युवाओं के लिए ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ की शुरूआत की गई। फिर गैर छात्र ग्रामीण युवाओं के विकास तथा राष्ट्रीय विकास में उनकी भागीदारी की दृष्टि से वर्ष 1972 में ‘नेहरू युवा केन्द्र’ की शुरुआत की गई। ये दोनों कार्यक्रम युवाओं को सामाजिक सरोकार और राष्ट्रीय विकास के रूप के साथ जोड़ने के लिए बने, जो आज भी संचालित हैं। युवाओं के समुचित विकास एवं उनके रचनात्मक उपयोग की चिंता के साथ वर्ष 1985 में अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष का आयोजन पूरे वि में किया गया। तब यह मानकर चला गया कि विकास और शांति के लिए युवाओं की सहभागिता एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके बाद दुनिया के अधिकांश देशों में युवा संदभरें को गम्भीरता के साथ लिये जाने की कोशिशें शुरू हुई।
भारत में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाये गये। जिसमें नेहरू युवा केन्द्रों के विस्तार और उसकी स्वायत्तता के साथ कई नये कार्यक्रमों की शुरूआत की गई। राष्ट्रीय युवा नीति तैयार करने की कोशिश इसी दौर में शुरू हुई। वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से स्थानीय स्वशासन का जो प्रयास शुरू किया गया है उसमें युवा सहभागिता ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों को बहुत बड़े पैमाने पर अवसर मिले हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी भी कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास हुए। भारत सरकार द्वारा 15 मार्च 2002 को देश में पहली बार ‘राष्ट्रीय युवा आयोग’ की स्थापना की गई, पर यह दो साल ही चल पाया क्योंकि 2004 के बाद उसका पुनर्गठन नहीं हुआ। इस आयोग को मुख्य रूप से युवाओं के विकास और बेरोजगारी की समस्या के समाधान के रास्ते तलाशने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। आयोग ने अपने दो वर्ष के कार्यकाल में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें युवा विकास के लिए भारत सरकार को अपनी कई संस्तुतियां दी हैं। इन संस्तुतियों में युवा से संबंधित कार्यक्रमों के लिए अंतर्विभागीय समिति तथा अंतरराज्यीय समिति के गठन के सुझाव के साथ ही नेशनल बैंक आफ यूथ, नेशनल यूथ डेवलपमेन्ट फन्ड तथा नेशनल यूथ सेंटर की स्थापना पर जोर दिया है। बेरोजगारी के निदान के लिए एक वैकल्पिक कौशल विकास तथा उद्यमिता विकास कार्यक्रम को चलाये जाने की सिफरिश भी की है। आर्थिक विकास और तकनीकी के बढ़ते प्रयोग के लाभ को अधिकतम युवाओं को लिए सुलभ बनाने की कोशिश को प्राथमिकता पर लिये जाने की आवश्यकता है। यह प्रयास समाज और राज्य दोनों स्तरों से किया जाना चाहिए।
जैसा कि समाजशास्त्रियों से लेकर राजनेता तक यह स्वीकार करते हैं कि इस देश में ‘भारत’ और ‘इंडिया’ दो देश हैं। यह सच्चाई ‘गांव’ और ‘शहर’ के बीच बढ़ती हुई विषमता को इंगित करती है और इसका प्रभाव सबसे अधिक युवाजनों के हिस्से में है। आज का शहरी युवा, जहां अब ‘न्यू इन्टरनेट जनरेशन’ के रूप में पहचाना जाता है वहीं ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को अपनी जड़ों से कटा हुआ बेकार (जॉबलेस) युवा के रूप में पहचाना जा रहा है
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