Tuesday, January 4, 2011
एक ईमानदार न्यायाधीश की ‘लायबिलिटी’
र्सवोच्च न्यायालय की एक महिला न्यायाधीश ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा क्या जारी किया, मीडिया में लहरें पैदा हो गयीं। लहरें इसलिए पैदा हुईं कि इन न्यायाधीश महोदय ने जो अपनी न्यायिक निष्ठा और नैतिकता के लिए जानी जाती हैं, अपने आर्थिक विवरण के ‘लायबिलिटी’ यानी दायित्व यानी आर्थिक देनदारी वाले कॉलम में अपनी दो बेटियों को र्दज कर दिया था। यह बात मीडिया ने हमारे मीडियाई विद्वानों के बीच बहस के लिए खड़ी कर दी। हमारे सभ्य समाज के नुमाइंदों की आत्मा इसलिए छटपटा उठी कि न्यायाधीश जैसे अत्यधिक गरिमामय पद पर प्रतिष्ठित एक शख्सियत स्वयं महिला होने के बावजूद अपनी बेटियों को ‘लायबिलिटी’ कैसे बता सकती है, वह भी उस इक्कीसवीं सदी में जो महिलाओं की समानता और र्सवतोमुखी सामाजिक भागीदारी के लिए जानी जाती है। और उस भारतीय समाज में जिसका एक खास मीडियाजीवी बौद्धिक र्वग महिला हितों का लगातार झंडावरदार बना रहता है। कहने की जरूरत नहीं है कि हमारी ‘फेमिनिस्ट’ नारी जमात को भी महिला न्यायाधीश का यह रवैया बहुत नागवार गुजरा। मीडिया ने इस मुद्दे पर जो बहस कराई वह अन्य अधिकांश बहसों की तरह उथली और औपचारिक थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जो महिलाएं मुखर हुई; उन्होंने भी इस महिला न्यायाधीश की विवशता और उन कड़वे सामाजिक विद्रूपों की पड़ताल नहीं की जिनके चलते यह विवशता पैदा हुई थी। सबसे पहले तो यह तथ्य जांचा-परखा जाना चाहिए कि हिन्दू बहुल भारतीय समाज में, तमाम तरह की महिला क्रांतियों और महिला सबलीकरण तथा समानीकरण की व्यवस्थाओं के बावजूद क्या उस स्थिति में कोई मूलभूत अंतर आया है जिसके चलते एक विवाह की जिम्मेदारी लड़की पक्ष को निभानी होती है और वह भी लड़का पक्ष की मांगों, रुचियों और चाहतों के अनुसार? क्या दहेज की पारंपरिक प्रथा में कहीं कोई टूटन र्दज हुई है? उलटे, दहेज के अनेकानेक नये रूप ईजाद हो गये हैं जिनमें धन-पद के अलावा संबंधों-संर्पको की सम्पन्नता भी जुड़ गयी है। किसी भी लड़की के मां-बाप के सर से लड़की के विवाह का भारी आर्थिक बोझ इसलिए कम नहीं होता कि उनकी लड़की खासी पढ़ी-लिखी और कमाऊ है। लड़की का पढ़ा-लिखा, कमाऊ और सुन्दर होना भी अब दहेज का ही एक हिस्सा है, जो लड़की के मां-बाप के ऊपर अतिरिक्त बोझ डालता है। यह वह कठोर वास्तविकता है जो किसी भी सदाशयी, आर्दशोमुखी और ‘फेमिनिस्ट’ र्तक से परे नहीं खिसकाई जा सकती। भारतीय मध्यर्वगीय परिवारों में यह वास्तविकता बेहद ठोस रूप में मौजूद है, जिसमें लड़की का विवाह र्सवाधिक बोझिल जिम्मेदारी की तरह होता है। यानी लड़की के विवाह से संबंधित जो विकृतियां और विवशताएं पहले से मौजूद थीं, वे तो कम हुई नहीं, उलटे और अधिक बढ़ गयीं। इनके बढ़ने के कारणों को खोजने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। एक दौर में अनेकानेक सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों के चलते जिन सामाजिक प्रथाओं और परंपराओं को बुराई के तौर पर देखा जाने लगा था, वे सबकी सब सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रतिमानों का रूप लेकर पूरे जोर-शोर से पुनस्र्थापित हो गयीं- खासतौर पर पिछले उस दौर में जिसमें अर्थव्यवस्था मुक्त हुई और निर्बाध अर्थप्रवाह समूची प्रगति और गति का र्पयाय बना। इस दौर में किसी भी वैध-अवैध तरीके से धन कमाना ही सामाजिक हैसियत का प्रतीक नहीं बना बल्कि उसका अधिकाधिक प्र्रदशन भी हैसियत या प्रभुत्व का हिस्सा बन गया। सामाजिक समारोह केवल सामाजिक दायित्वों का निर्वाह मात्र नहीं रह गये बल्कि धन-प्र्रदशन के बल पर आर्थिक-राजनीतिक संबंधों के विस्तार और उनसे अनेकानेक लाभ लेने का माध्यम बन गये। इनका एक अन्य लाभ यह लिया जाना शुरू हुआ कि जिस काले धन का निवेश अन्यत्र सहजता से संभव नहीं था, उसका खुला इस्तेमाल इन समारोहों में किया जा सकता था। देखते ही देखते आज स्थिति यह हो गयी है कि जिनके पास काली कमाई है वे ही इन सामाजिक समारोहों को शान-शौकत और चटकीली-भड़कीली भव्यता के साथ संपन्न कर- करा सकते हैं। बेटे-बेटियों के विवाह भी। लेकिन दुर्घटना यह हुई है कि ये महंगे-र्खचीले समारोह सामाजिक मानक की तरह स्थापित हो गये हैं जिनके दबाव में हर सामाजिक प्राणी आ गया है और सबसे बुरी तरह आये हैं विवाह योग्य लड़की के मां-बाप। वे मां-माप भी जिनकी लड़कियां पढ़-लिखी हैं, हर तरह से योग्य हैं; लेकिन जिनके पास काला पैसा नहीं है, लड़कियों को बोझ मानने को विवश हो जाते हैं। काले धन से क्रीत भव्यतापूर्ण सामाजिक समारोह और प्रथा-परंपराओं के घालमेल ने आज जो हालात पैदा किये हैं, उन्होंने ईमानदार मध्यर्वगीय परिवारों के लिए एक असाध्य संकट खड़ा कर दिया है- ऐसा संकट जिससे बच निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझता। वे भी अपनी लड़कियों की शादी समारोही ढंग से करना चाहते हैं, अच्छे कमाऊ लड़कों के साथ करना चाहते हैं, उन्हें एक सुखी जीवन देना चाहते हैं, लेकिन काले धन वालों की तुलना में पिछड़ जाते हैं, मात खा जाते हैं। किसी भी ईमानदार व्यक्ति की कमाई, कुछेक उंगलियों पर गिने जा सकने वाले अपवादों को छोड़कर, इतनी नहीं होती कि वह आज के महंगे दौर में ठीकठाक तरीके से अपने परिवार को चला सके और लड़की की शादी कमाऊ लड़के से तय करके पूरे दान-दहेज और भव्य प्र्रदशन के साथ कर सके- एक ईमानदार न्यायाधीश की भी नहीं। नियंतण्रऔर र्मयादाविहीन अर्थव्यवहार ने केवल उन्हीं लोगों को र्सवसुविधा-संपन्न किया है जिनके पास कोई नैतिक चेतना नहीं है और जो किसी भी तरह से धन कमाने की महारत रखते हैं। यह वह जमात है जो हमारी आज की कथित संपन्नता का प्रतिनिधित्व करती है और किसी भी दायित्वबोध से मुक्त रहती है। इस जमात के सदस्य अपने अवैध धन की समारोही प्र्रदशनी की प्रतिद्वंद्विता में हैं। उनकी इस प्रतिद्वन्द्विता के चलते सामान्य अभ्रष्ट लोग किस तरह की सामाजिक कठिनाइयों-परेशानियों का शिकार होते हैं, इसकी चिंता उन्हें कभी नहीं होती। इसलिए नहीं होती कि उनके ये कार्य ही उन्हें सामाजिक रुतबा प्रदान करते हैं। आधुनिक संस्कृति के पैमाने पर वे हेय नहीं होते बल्कि अनुकरणीय होते हैं। जो इनका अनुकरण नहीं करते उनकी लड़कियां उनपर बोझ बन जाती हैं। क्या र्सवोच्च न्यायालय की एक ईमानदार न्यायाधीश की ‘लायबिलिटी’ इस परिप्रेक्ष्य में नहीं समझी जानी चाहिए?
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