Sunday, January 16, 2011

वर्णमाला से बाहर

बिवेयर ऑफ पिक पॉकेट। यह वाक्य लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देता है। हिंदी में इस वाक्य का अनुवाद है-जेबकतरों से सावधान। दिल्ली के मेट्रो में जो लोग यह वाक्य बार-बार सुनते हैं, उनका मनोविज्ञान पढ़ने की कोशिश की गई। वे यह वाक्य सुनते ही आसपास खड़े लोगों पर निगाह मार लेते हैं। अंगेरजी के इस वाक्य का अनुवाद इस तरह क्यों नहीं किया गया कि जेब कटने से सावधान या अपनी जेब को सुरक्षित रखने के लिए सावधानी बरतें।
संप्रेषण की भाषा का उसे ग्रहण करने वालों पर गहरा असर पड़ता है। यह तो इसका एक पहलू है। दूसरा पहलू इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह यह है कि वह संदेश उसे ग्रहण करने वाले के आसपास किस रूप में पसरता है। अनुवादकों को क्यों यह जरूरत पड़ी कि वे जेबकतरों से सावधानी बरतने को कहें। जेब कटने से सावधानी बरतने की सलाह दी जाती, तो क्या अंतर आता? आखिर इस वाक्य का उद्देश्य क्या है? अपराध के प्रति सतर्क करना ही न। जेबकतरा होना किसी के माथे पर नहीं लिखा होता, लेकिन उससे सावधानी की हिदायत सामने वाले के जेबकतरा होने का संदेह जरूर पैदा कर देता है। जैसे 1990 के बाद दिल्ली की बसों में एक वाक्य लिखा जाने लगा-पड़ोसी पर नजर रखें। यह पढ़कर हर व्यक्ति एक दूसरे को संदेह की नजर से देखता था। जेब के प्रति सावधानी से पहले जेबकतरे से खतरे का बोध पैदा हो जाता है।
मजेदार बात यह है कि हमारे यहां महात्माओं और विद्वानों का यही वाक्य जगह-जगह चिपका मिलता है कि अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं। लेकिन हमारे समाज में घृणा का जो व्यावहारिक पाठ तैयार हुआ है, वह अपराधी के खिलाफ है। इसी वाक्य को लीजिए, तो इसमें मनुष्य के प्रति एक घृणा का भाव छिपा है। इसीलिए हमारे समाज में संप्रेषण की जो भाषा है, उसका पूरा ढांचा बेहद अमानवीय बना हुआ है। नसीहत तो अपराध से घृणा करने की दी जाती है, लेकिन विचार का ढांचा अपराधी से घृणा करने का बना हुआ है।
कुछ दिनों पूर्व दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में फीस बढ़ने के खिलाफ कई तरह के कार्यक्रम किए गए। इनमें सब्जी बेचकर और जूते में पॉलिश करके फीस में बढ़ोतरी का विरोध जताया गया। आखिर सब्जी बेचने वाला या जूता पॉलिश करने वाला किसी विरोध का कार्यक्रम कैसे हो सकता है? आखिर मनुष्य ही बार-बार निशाने पर क्यों आता है? क्या यह वर्ण व्यवस्था की विचारधारा है? यह ऐसी विचारधारा है, जो मनुष्य को उसके जन्म से पहले ही हीन और अपराधी मान लेती है। इसीलिए उसकी भाषिक संरचना में मनुष्य-विरोधी घृणा हावी रहती है। इस संरचना को मनुष्य की किसी जाति के सदस्यों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
समाज में सुधार के कार्यक्रमों की आज क्या रूपरेखा दिखाई देती है? इस आधुनिक व्यवस्था में अमानवीय कृत्यों के खिलाफ जब सत्ता का ढांचा सक्रिय हुआ है, तभी उसमें सुधार की कुछ गुंजाइश बनी है। कानून किसी अमानवीय कृत्य के ढांचागत स्वरूप को तोड़ सकता है, उसे मिटा तो नहीं सकता। उसे मिटाने का निश्चय जब तक समाज के संकल्प का हिस्सा नहीं बनता, तब तक उसे विचारधारा के स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता।
समस्या यह हो गई है कि वर्ण व्यवस्था के अमानवीय कृत्यों के ऊपरी ढांचों पर तो हमला देखा जा रहा है, लेकिन वह भीतरी ढांचों में कई स्तरों पर अपनी सक्रियता बनाए हुए है। यदि वह भाषा में ही घुसी हुई है, तो उसे कौन-सा कानून खत्म कर सकता है? कौन-सा कानून यह कह सकता है कि हमें पॉकेटमार की जगह पॉकेटमारी के विरोध की भाषा में लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देनी चाहिए। जबकि यह एक ई की मात्रा मनुष्यता के प्रति एक तरह की संवेदनशीलता विकसित करती है। मनुष्यता का सीधा रिश्ता समाज को बनाने वाली विचारधारा से होता है। इसीलिए हर विचारधारा की कसौटी पर अब तक समाज के विभिन्न घटकों के निर्माण और उसकी स्थिति को कसकर देखा जा सकता है। विचारधाराओं द्वारा परिकल्पित समाज व्यवस्था के अनुरूप मनुष्य के साथ मनुष्य के रिश्ते दिखाई देते हैं।

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