इसे विडंबना कहा जाए या कुछ और! देश तरक्की की राह पर है, मगर यहां के बच्चों, किशोरों और युवाओं में तनाव का मर्ज बढ़ रहा है। क्षमता से बढ़कर अपेक्षा केचलते तनाव और कुंठा कई होनहारों का जीवन लील लेती है। उनसे अपेक्षा तो पाल ली जाती है, लेकिन उसके लिए संवेदनशील माहौल नहीं बन पाता। नतीजतन अब बड़ों और युवाओं में एक गहरी लकीर खिंच गई है। दोनों साथ रहते हुए भी एक -दूसरे को समझने में असमर्थ हैं।
करियर की दहलीज पर कदम रखने वाले युवा इस प्रतियोगी जमाने में तनाव तले जी रहे हैं। आए दिन ऐसे उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। अभी हाल में सहारनपुर में एक उद्यमी के इकलौते बेटे ने खुद को गोली मारकर खुदकुशी कर ली। उस बच्चे में कोई कमी नहीं थी। अपनी प्रतिभा से वह बी.टेक. की पढ़ाई कर रहा था। लेकिन उसकी अपने पिता से कुछ नाराजगी चल रही थी। अगर दोनों पक्षों में एक-दूसरे की भावना को समझने की कोशिश होती, तो एक होनहार की जिंदगी बच सकती थी। इसी तरह कानपुर में आईआईटी की एक छात्रा ने भी खुदकुशी कर ली। वह सेमेस्टर सिस्टम को लेकर परेशान थी। उसे भी संवेदना चाहिए थी, लेकिन शायद वह अपनी मुश्किलों में खुद को अकेला पा रही थी। ये महज कुछ उदाहरण हैं। अब गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बच्चे और युवा अपने में ही सिमटे और परेशान हैं। उन्हें लगता है कि अभिभावक पालन-पोषण के बावजूद उनकी किसी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं। उन्हें केवल परिणाम चाहिए।
यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। आलम यह है कि 2009 में देश में 14 साल से कम उम्र के औसतन आठ बच्चों ने रोजाना आत्महत्या की। उस दौरान कुल 2,951 बच्चों ने आत्महत्या की, जिनमें 1,450 लड़कियां थीं। इस मामले में प्रदेशों में सबसे ऊपर मध्य प्रदेश था, जहां 266 लड़कों और 242 लड़कियों ने अपनी जान दी। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 453, कर्नाटक मे 366, तमिलनाडु में 280, छत्तीसगढ़ में 180, राजस्थान में 161, उड़ीसा में 136 और उत्तर प्रदेश में 113 बच्चों ने खुदकुशी की।
बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ने के पीछे कई कारण हैं। अच्छे संस्थानों में नामांकन से लेकर टॉप करने तक अभिभावकों को अपने बच्चों से बहुत अपेक्षाएं होती हैं। कभी परीक्षा के तनाव में, कभी हीन भावना से ग्रसित होकर, तो कभी अपमानित होकर या फिर पारिवारिक कारणों से युवाओं पर तनाव का दबाव बढ़ता जा रहा है। कभी-कभार यह गुबार के रूप में फूट पड़ता है। वरना बच्चे अपनी परेशानियों में गुमसुम खोए रहते हैं। और कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि उन्हें अपनी जिंदगी भी बेकार लगती है। चूंकि अब बच्चों की दुनिया बंद कमरों में किताब, टीवी और इंटरनेट तक सिमट गई है, लिहाजा संवाद की कमी के कारण वे अवसाद के शिकार हो रहे हैं।
आकलन यह भी है कि गांवों की तुलना में शहरी बच्चे ज्यादा तनाव में जीते हैं। मणिपुर जैसे राज्यों में आत्महत्या की घटनाएं नहीं होती हैं। छोटे शहर और कसबों में भी प्रतिस्पर्द्धा तो बढ़ी है, पर अब भी वहां प्रकृति और जीवन का सरोकार बचा हुआ है। जबकि बड़े शहरों का दमघोटू माहौल युवाओं और बच्चों के जीवन में कशकमश पैदा कर रहा है। संयुक्त परिवार के बिखरने का सितम भी उन पर गिरा है। आईआईटी, कानपुर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जो किशोर और युवा करियर को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं, वे अधिक संवेदनशील भी होते हैं और आवेश में आकर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। यह प्रवृत्ति खास तौर पर मध्य और उच्च वर्ग के बच्चों में देखी जा रही है।
ऐसी स्थिति में इस समस्या से पार पाने के लिए बच्चे से जुड़े हर किरदार को अपनी भूमिका निभानी पडे़गी। समाज को भी परिस्थितियों के हिसाब से बदलना पड़ेगा। मीडिया और शिक्षकों को संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश करनी होगी। अभिभावकों को संयम से काम लेने की सीख अपने बच्चों को देनी होगी। फिर भी यदि बच्चा उलझन में है, तो समय रहते पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में भी बड़े बदलाव की जरूरत है। इस समस्या पर समाज, शिक्षक और सरकार को भी गहराई से मंथन करना होगा। कॉल सेंटरों की तरह युवाओं के लिए 24 घंटे सुझाव देने वाले केंद्र स्थापित करना फायदेमंद हो सकता है।
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