हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में छोटे परिवारों को बढ़ावा देने के लिए गोल्डन और सिल्वर कार्ड के नाम से नई योजना शुरू करने का फैसला लिया है। योजना के तहत कार्डधारियों को आर्थिक लाभ के अलावा, नौकरी में आरक्षण, आयु सीमा में छूट तथा अतिरिक्त वेतनवृद्धि दिए जाने का प्रावधान है। उम्मीद की जा रही है कि यह योजना लागू होने के बाद प्रदेश में आबादी पर आसानी से अंकुश लग सकेगा। देश का एक बड़ा वर्ग आज भी परिवार के बड़े आकार को अर्थ-अर्जन के तौर पर देखता है। जिस कारण जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास सफल नहीं हो पाते। जनसंख्या के उपयुक्त आकार और गुणात्मक विशेषताओं के आधार पर ही किसी देश का विकास निर्भर करता है। इस संदर्भ में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। क्षेत्रफल के लिहाज से भारत के पास दुनिया का 2.4 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि आबादी 16.7 प्रतिशत है। यहां जनसंख्या घनत्व खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। 2005 में जनघनत्व 345 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था, जो 2025 में बढ़कर 440 हो जाएगा। इस बढ़ती जनसंख्या ने भारत के विकास को धीमा कर दिया है। यहां संसाधनों की प्रति-व्यक्ति उपलब्धता तेजी से घट रही है। देश की जनसंख्या का स्वरूप चिंताजनक बना हुआ है। अधिक जनसंख्या से जहां भूमि पर दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर दुर्लभ संसाधनों का अधिक दोहन हो रहा है। इतनी बड़ी आबादी का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। जनसंख्या का बढ़ता दबाव आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक दृष्टि से देश को गहरी क्षति पहुंचा रहा है। सरकारी स्तर पर किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद अब भी 44 प्रतिशत घरों में बिजली नहीं है। जिस गति से बिजली की मांग बढ़ रही है, उस गति से बिजली का उत्पादन नहीं हो रहा है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक वृक्षों को काटा जा रहा है। इसका दुष्परिणाम प्रदूषण के बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। विश्व में वायु प्रदूषण से तीन लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो जाती है और इनमें से ज्यादातर मौतें भारत में होती हैं। करीब एक प्रतिशत क्षेत्रफल हर साल रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है और भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि एक सीमा के बाद भूमि पर चाहे कितना भी खर्च क्यों न किया जाए उसकी उपज को बढ़ाया नहीं जा सकता। यह जरूरी हो जाता है कि न केवल जनसंख्या की गति पर लगाम लगे बल्कि स्वहित को त्याग कर राष्ट्रहित का लक्ष्य रखा जाए। जो संसाधन उपलब्ध हैं उनका उचित दोहन होना चाहिए। जनसंख्या की गति को थामने के लिए कुछ दशक पूर्व सरकारी स्तर पर योजनाओं का लेखा-जोखा तैयार किया गया, परंतु हर योजना की तरह ही यह भी कागजों तक ही सीमित रह गई। जनसंख्या की वृद्धि को शून्य स्तर पर पहुंचने के लिए परिवार कल्याण कार्यक्रम में स्वैच्छिक आधार पर नियोजित परिवार को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम मूलत: महिला केंद्रित है। परिवार नियोजन के स्थायी तरीकों को अपनाने में पुरुषों की दिलचस्पी न होने के कारण यह कार्यक्रम असफल हो गया है। इन्हीं सभी कारणों के चलते भारत को एक ऐसे नीति-निर्माण की आवश्यकता है जिससे भारतीय परिवार खुशी से अपने परिवार को सीमित रख सके। नौकरी में आरक्षण, अधिक वेतन तथा आयु सीमा में छूट ऐसे आकर्षण हैं जिनसे व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर इस योजना से जुड़ जाएगा। संभावना है कि यह योजना, जनसंख्या की गति को थामने में मील का पत्थर साबित हो। गोल्डन और सिल्वर कार्ड योजना भविष्य में पूरे देश के लिए रोल मॉडल की भूमिका निभा सकती है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, January 19, 2011
Sunday, January 16, 2011
वर्णमाला से बाहर
बिवेयर ऑफ पिक पॉकेट। यह वाक्य लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देता है। हिंदी में इस वाक्य का अनुवाद है-जेबकतरों से सावधान। दिल्ली के मेट्रो में जो लोग यह वाक्य बार-बार सुनते हैं, उनका मनोविज्ञान पढ़ने की कोशिश की गई। वे यह वाक्य सुनते ही आसपास खड़े लोगों पर निगाह मार लेते हैं। अंगेरजी के इस वाक्य का अनुवाद इस तरह क्यों नहीं किया गया कि जेब कटने से सावधान या अपनी जेब को सुरक्षित रखने के लिए सावधानी बरतें।
संप्रेषण की भाषा का उसे ग्रहण करने वालों पर गहरा असर पड़ता है। यह तो इसका एक पहलू है। दूसरा पहलू इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह यह है कि वह संदेश उसे ग्रहण करने वाले के आसपास किस रूप में पसरता है। अनुवादकों को क्यों यह जरूरत पड़ी कि वे जेबकतरों से सावधानी बरतने को कहें। जेब कटने से सावधानी बरतने की सलाह दी जाती, तो क्या अंतर आता? आखिर इस वाक्य का उद्देश्य क्या है? अपराध के प्रति सतर्क करना ही न। जेबकतरा होना किसी के माथे पर नहीं लिखा होता, लेकिन उससे सावधानी की हिदायत सामने वाले के जेबकतरा होने का संदेह जरूर पैदा कर देता है। जैसे 1990 के बाद दिल्ली की बसों में एक वाक्य लिखा जाने लगा-पड़ोसी पर नजर रखें। यह पढ़कर हर व्यक्ति एक दूसरे को संदेह की नजर से देखता था। जेब के प्रति सावधानी से पहले जेबकतरे से खतरे का बोध पैदा हो जाता है।
मजेदार बात यह है कि हमारे यहां महात्माओं और विद्वानों का यही वाक्य जगह-जगह चिपका मिलता है कि अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं। लेकिन हमारे समाज में घृणा का जो व्यावहारिक पाठ तैयार हुआ है, वह अपराधी के खिलाफ है। इसी वाक्य को लीजिए, तो इसमें मनुष्य के प्रति एक घृणा का भाव छिपा है। इसीलिए हमारे समाज में संप्रेषण की जो भाषा है, उसका पूरा ढांचा बेहद अमानवीय बना हुआ है। नसीहत तो अपराध से घृणा करने की दी जाती है, लेकिन विचार का ढांचा अपराधी से घृणा करने का बना हुआ है।
कुछ दिनों पूर्व दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में फीस बढ़ने के खिलाफ कई तरह के कार्यक्रम किए गए। इनमें सब्जी बेचकर और जूते में पॉलिश करके फीस में बढ़ोतरी का विरोध जताया गया। आखिर सब्जी बेचने वाला या जूता पॉलिश करने वाला किसी विरोध का कार्यक्रम कैसे हो सकता है? आखिर मनुष्य ही बार-बार निशाने पर क्यों आता है? क्या यह वर्ण व्यवस्था की विचारधारा है? यह ऐसी विचारधारा है, जो मनुष्य को उसके जन्म से पहले ही हीन और अपराधी मान लेती है। इसीलिए उसकी भाषिक संरचना में मनुष्य-विरोधी घृणा हावी रहती है। इस संरचना को मनुष्य की किसी जाति के सदस्यों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
समाज में सुधार के कार्यक्रमों की आज क्या रूपरेखा दिखाई देती है? इस आधुनिक व्यवस्था में अमानवीय कृत्यों के खिलाफ जब सत्ता का ढांचा सक्रिय हुआ है, तभी उसमें सुधार की कुछ गुंजाइश बनी है। कानून किसी अमानवीय कृत्य के ढांचागत स्वरूप को तोड़ सकता है, उसे मिटा तो नहीं सकता। उसे मिटाने का निश्चय जब तक समाज के संकल्प का हिस्सा नहीं बनता, तब तक उसे विचारधारा के स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता।
समस्या यह हो गई है कि वर्ण व्यवस्था के अमानवीय कृत्यों के ऊपरी ढांचों पर तो हमला देखा जा रहा है, लेकिन वह भीतरी ढांचों में कई स्तरों पर अपनी सक्रियता बनाए हुए है। यदि वह भाषा में ही घुसी हुई है, तो उसे कौन-सा कानून खत्म कर सकता है? कौन-सा कानून यह कह सकता है कि हमें पॉकेटमार की जगह पॉकेटमारी के विरोध की भाषा में लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देनी चाहिए। जबकि यह एक ई की मात्रा मनुष्यता के प्रति एक तरह की संवेदनशीलता विकसित करती है। मनुष्यता का सीधा रिश्ता समाज को बनाने वाली विचारधारा से होता है। इसीलिए हर विचारधारा की कसौटी पर अब तक समाज के विभिन्न घटकों के निर्माण और उसकी स्थिति को कसकर देखा जा सकता है। विचारधाराओं द्वारा परिकल्पित समाज व्यवस्था के अनुरूप मनुष्य के साथ मनुष्य के रिश्ते दिखाई देते हैं।
Saturday, January 15, 2011
बेघरों की पीड़ा
रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर रुख करने वाले गरीब गुर्बा लोगों को प्राय: अंदाज नहीं होता कि जिस बड़े शहर वे जा रहे हैं, वहां वे रहेंगे कहां? उनमें से कुछ तो वर्षो तक बेघर ही बने रहते हैं। विभिन्न कारणों से शहरों में आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे बेघर लोग जहां कड़ाके की सर्दी, चिलचिलाती गर्मी या मूसलाधार बारिश की मार सहने को मजबूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी बड़ी समस्या भोजन है। यही कारण है कि देश में हजारों बेघर असमय काल कवलित हो जाते हैं। हर मौसम जब अपने पूरे उठान पर होता है तो बेघरों के मरने की खबरें आने लगती हैं। मसलन इन दिनों कड़ाके की ठंड में मरने वालों का आंकड़ा हर दिन बढ़ रहा है। इससे भी ज्यादा दर्दनाक स्थिति उन बच्चों-बच्चियों की होती है जिन्हें फुटपाथ की जिंदगी यौन उत्पीड़न और नशे की अंधी गली में धकेल देती है। शहरों में जब आम व खास महिलाओं की सुरक्षा पर ही इतनी चिंता व्यक्त की जाती है तो बेघर महिलाओं को क्या कुछ नहीं सहना पड़ता होगा, इसकी कल्पना ही बेहद दर्दनाक अनुभव है। आवास के अभाव में फुटपाथ पर पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से रहने वालों को भी समय-समय पर पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इतना ही नहीं, भिखारियों के नाम पर पुलिस उन्हें भिक्षुगृह भेज देती है जहां महीनों तक कैदियों सा जीवन जीना पड़ता है। महानगरों में सौन्दर्यीकरण के नाम भी आवासविहीनों की समस्याएं और बढ़ जाती हैं। खुले आसमान के नीचे उन्होंने अपने लिए जो थोड़ी सी जगह व्यवस्थित की होती है, इस नाम पर उन्हें वहां से भी खदेड़ दिया जाता है। कुल मिलाकर नगरों महानगरों में बेघरों की सुनने वाला कोई नहीं। सरकार को बेघरों की संख्या का अनुमान लगा जरूरी सुविधाएं मुहैया करवानी चाहिए। इसके लिए रैन- बसेरों की संख्या बढ़ाने के साथ ही उनकी हालत में सुधार होना चाहिए। महिला-पुरुषों के रैन-बसरे अलग-अलग हों लेकिन ये पास-पास होने चाहिए ताकि एक ही परिवार के सदस्य एक-दूसरे से ज्यादा दूर न रहें। कई रिक्शा चालक, ठेले वाले अपनी आजीविका के साधन को असुरक्षित छोड़कर रैन बसेरों में नहीं आ पाते। संभव हो तो रैनबसेरों के बाहर इनके इन साधनों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो। अन्यथा रिक्शा चालकों को विश्राम स्थल पर पालीथीन की शीट, बांस, टिन आदि से अस्थाई आश्रय स्थल बनाने की इजाजत मिलनी चाहिए। खासकर जानलेवा सर्दी के मौसम में विभिन्न धर्मस्थानों से सम्पर्क कर बेघरों को रात बिताने के लिए जगह देने का अनुरोध किया जा सकता है। सरकारी व गैर सरकारी खाली इमारतें भी ऐसे कष्टकारी मौसम में बेघरों का अस्थायी आसरा बन सकती हैं। इसके लिए सरकारी व गैर सरकारी संगठनों को पहल करनी चाहिए। बेघरों के संगठन, उनके प्रतिनिधि ऐसी जिम्मेदारी निभाएंगे और पुलिस के साथ सुरक्षा संबंधी मामलों में सहयोग करेंगे तो पुलिस को अपराधों के नियंतण्रमें भी मदद मिलेगी। बेघरों के संगठन व प्रशिक्षण में सामाजिक कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। वे उन्हें सामुदायिक संबधों को दृढ़ करने के प्रति प्रेरित कर सकते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा के साथ नशामुक्ति के उपाय सुझा सकते हैं। जहां विशेष आवश्यकता होगी, वहां मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता, कुष्ठरोग आदि से जुड़ी विशिष्ट संस्थाओं से उनका संबंध स्थापित करने का प्रयास करेंगे। सरकारी संसाधनों का उचित उपयोग होगा व इसके साथ स्वैच्छिक संस्थाओं के साधन व बेघर लोगों की मेहनत भी जुड़ेगी तो आश्रयविहीन लोगों की भलाई का कार्य तेजी से आगे बढ़ सकेगा। बेघरों को भोजन उपलब्ध करवाने की चुनौती भी बड़ी है। विशेषकर महंगाई के इस दौर में इसकी जरूरत बढ़ रही है। यदि कुछ डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए रैन बसेरों में पहुंचने लगें, तो इससे भी बहुत से जरूरतमंदों की समस्या हल होगी।
खुदकुशी में शादीशुदा आगे
एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट, भारत में कुंवारों में आत्महत्या करने की प्रवृति कम
देश में कुंवारों की तुलना में शादीशुदा लोगों में खुदकुशी करने की प्रवृत्ति ज्यादा बनी हुई है। वर्ष 2009 के दौरान आत्महत्या के सरकारी आंकड़ों पर वैवाहिक स्थिति के लिहाज से नजर डाली जाए तो पता चलता है कि इस साल खुदकुशी करने वालों में 70.4 फीसदी लोग शादीशुदा थे, जबकि कुंवारे लोगों की संख्या महज 21.9 प्रतिशत थी। मनोविज्ञानियों के मुताबिक ये आंकडे़ भारतीय समाज में निरंतर घटती व्यक्तिगत सहनशीलता और वैवाहिक रिश्तों में भावनात्मक ऊष्मा की कमी की ओर इशारा करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में देश में आत्महत्या के कुल एक लाख 27 हजार 151 मामले दर्ज किए गए थे जिसमें से आत्महत्या करने वाले 58 हजार 192 लोग शादीशुदा पुरुष थे जबकि विवाहित महिलाओं का यह आंकड़ा 31,300 का रहा। दूसरी ओर, इस दौरान खुदकुशी करने वाले कुंवारे पुरुषों की संख्या 17,738 रही वहीं शादी के बंधन में नहीं बंधने वाली 10,063 महिलाओं ने मौत को गले लगाया। इस साल आत्महत्या का कदम उठाने वाले लोगों में 4.3 प्रतिशत विधुर या विधवा के दर्जे वाले थे। खुदकुशी करने वालों में 3.4 प्रतिशत लोग तलाकशुदा थे या किसी वजह से अपने जीवनसाथी से अलग रह रहे थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2009 में खुदकुशी के मामलों में पुरुष-स्त्री अनुपात 64:36 का था, यानी इस दौरान जान देने वाले हर सौ लोगों में 64 पुरुष और 36 महिलाएं थीं। एक और चिंताजनक पहलू की ओर ध्यान खींचते हुए आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2009 में आत्महत्या करने वाले हर पांच लोगों में से एक गृहिणी थी। आत्महत्या पर एनसीआरबी के आंकड़ों को आंखें खोल देने वाला बताते हुए मनोचिकित्सक दीपक मंशारमानी ने कहा कि भारतीय समाज के ताने-बाने में आ रहे बदलावों के कारण व्यक्तिगत सहनशीलता लगातार कम होती जा रही है। आम तौर पर यह देखने में आता है कि किसी व्यक्ति के मन में हालात से निराशा की लहर आती है और वह चंद पलों में जान देने का सबसे बड़ा फैसला कर लेता है। डॉ. मंशारमानी के मुताबिक कुंवारों के मुकाबले विवाहितों में जान देने की प्रवृत्ति ज्यादा होना स्पष्ट करता है कि वैवाहिक रिश्तों में अब पहले जैसी भावनात्मक ऊष्मा नहीं रह गई है और ये संबंध धीरे-धीरे किसी पेशेवर भागीदारी की तासीर अख्तियार करते जा रहे हैं।
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