Monday, February 7, 2011

जातीय पहचान के नाम पर आज भी दागे जाते हैं बच्चें


बिहार के बांका जिले में फुल्लीडुमर प्रखंड क्षेत्र के आदिवासी समाज में जातीय पहचान के लिए बच्चों को गर्म सलाखों से दागने की परंपरा 21 सदी में भी कायम है। यह समाज इसे आवश्यक रस्म मानता है जिसका नाम चिखा दिया गया है। वाकई इस रस्म के दौरान बच्चों की चीख निकल जाती है। फुल्लीडुमर प्रखंड क्षेत्र के भितिया पंचायत के सदस्य संत लाल मूर्मू का कहना है कि यह आदिवासी समाज का एक संस्कार है, जिसे हम तब तक निर्वहन करेंगे जब तक हमारा अस्तित्व है। इलाके के ही आदिवासी बहुल पिरम्मा गांव निवासी बाल किशोर हांसदा, बड़ा प्रधान रसिक टुडडू, सुनील टूडडू, बड़की देवी, मक्को देवी आदि का कहना है कि यह एक उत्सव है। यह रस्म बच्चों के तीन से चार वर्ष के हो जाने के बाद पूरी की जाती है। कुछ बच्चों को जख्म हो जाता है, जिसका उपचार जंगली जड़ी बूटी से किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस रस्म के बच्चों के बीमार होने की बात बिल्कुल ही गलत है। रस्म के बाबत बुर्जुग आदिवासी महिला बड़की देवी ने कहा, इसके तहत परिजनों के समक्ष बच्चे को जलते कपड़े की बत्ती अथवा गर्म छड़ से उसकी कोहनी एवं हथेली को दागा जाता है। यह निशान एक घड़ी के आकार का होता है। इसमें जख्म होना शुभ माना जाता है। जख्म इस बात का संकेत है कि उनकी रगों में हम वनवासी का खून दौड़ रहा है। वहीं,स्वास्थ्य केंद्र फुल्लीडुमर के प्रभारी का कहना है कि यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। वे समय-समय पर लोगों को इसके प्रति जागरूक करने की कोशिश करते हैं, लेकिन लोग इसे संस्कार की बात बता अनसुना कर देते हैं।


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