समलैंगिकता को महिमामंडित करने पर आपत्ति जता रहे हैं...
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को अवैध ठहराने के बाद शुरू हुआ गे प्राइड परेड का सिलसिला अभी तक थमा नहीं है। हाल ही में एक बार फिर समलैंगिकों ने प्राइड परेड यानी गौरव यात्रा निकालकर इन संबंधों को महिमामंडित करने का प्रयास किया। पारिवारिक मूल्य व सामाजिक मान्यताओं की गहरी जड़ें होने के कारण भारतीय समाज में आज भी किसी अंतरंग मुद्दे पर संवाद स्थापित करने में संकोच किया जाता है। ये पारिवारिक मूल्य ही भारत के सांस्कृतिक स्तंभों की मजबूती प्रदान करते हैं। समलैगिंकता को अदालत द्वारा जायज ठहराए जाने के बाद इसके समर्थकों ने जगह-जगह परेड निकाली। समलैंगिकों के आपसी विवाह को भारतीय मीडिया ने भी जमकर कवरेज दिया। हालांकि मीडिया यह बताना भूल गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को वैध करार दिया है न कि समलैंगिक विवाह को मान्यता दी है अथवा इन्हें परिभाषित किया है। मीडिया यह भी भूल गया कि भारत के ज्यादातर परिवारों में 5 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक के सदस्य साथ बैठकर टीवी देखते हैं। कितना सहज होगा एक छत के नीचे बैठकर इस प्रकार के कार्यक्रमों को देखना? दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद हद तो तब हो गई कि जब भारत की कई हस्तियां भी इसके समर्थन में आगे आ गई। मुझे नहीं लगता ऐसे लोग अपने पारिवारिक सदस्यों के समलैंगिक संबंधों को स्वीकार करेंगे। लगता है उन्होंने महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए इन संबंधों का समर्थन किया है। ऐसे लोगों ध्यान रखना चाहिए कि यह मामला समाज की भावनाओं से जुड़ा है। गे राइट्स के आधार पर न्यायालय के फैसले से समलैंगिक संबंध अब आईपीसी की धारा 377 के तहत दंडनीय नहीं हैं। फैसले के अनुसार धारा 377 में संशोधन किया जाना चाहिए और वयस्कों में सहमति से बनने वाले यौन संबंधों को वैध माना जाना चाहिए। सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस फैसले के बाद पुलिस अब सहमति से बने समलैंगिक संबंधों के आरोप में किसी भी वयस्क को गिरफ्तार नहीं कर सकेगी। न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया है। कुछ पाश्चात्य देशों में समलैंगिकों की अपनी अलग दुनिया है। कनाडा, अर्जेटीना, ब्रिटेन, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में इसे कानूनी मान्यता हासिल है, वहीं दक्षिण अफ्रीका को छोड़ संपूर्ण अफ्रीकी महाद्वीप व एशिया के ज्यादातर देशों में यह एक बड़ा अपराध है और इसके लिए मृत्यदंड व आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। भारत एक मिली-जुली परंपरा और संस्कृतियों वाला देश है इसलिए हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम इस परंपरा को सहेजें। गे प्राइड परेड जैसा भड़काऊ और भौंडा प्रदर्शन समझ के परे है। इस तरह की परेड से देश के पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों का Oास होता है। दो मित्रों की नजदीकियों की भी संदेह की दृष्टि से देखा जा सकता है, जो मित्रता जैसे पवित्र संबंधों को दागदार ही करेगा। कुछ लोग समलैगिंकता को मानसिक बीमारी कहते हैं, किंतु मेरा मानना है यह एक वर्ग के लोगों की आवश्यकता है। यदि किसी पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षण न हो तो कहा जाता है वह शारीरिक रूप से पुरुष होकर भी स्त्री ही है। यह भी प्रकृति की ही एक देन है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 75 हजार समलिंगी पंजीकृत हैं और जर्मनी में करीब 5 लाख। समलैंगिक संबंधों को भले ही अदालत ने मान्यता दे दी हो, समाज इन्हें नहीं स्वीकारता। ऐसे में समलैंगिकों को इनका महिमंडन करने पर अंकुश लगाना चाहिए और मीडिया को इस प्रकार के भौंडे प्रदर्शन के प्रचार से बचना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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