विदेश सचिव निरुपमा राव ने अपने एक ताजा बयान में कहा है कि उनका विभाग अपने किसी भी मुलाजिम द्वारा महिलाओं से दुर्व्यवहार के मामले कतई सहन नहीं करेगा। इस मुद्दे पर संगीन आरोपों से घिरे दो आला भारतीय अधिकारियों, ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग के अनिल वर्मा तथा अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े भारतीय विदेश सेवा के एक अन्य उच्चाधिकारी को भारत वापस बुलवा लिया गया है। उनके खिलाफ मामलों की जांच के बाद दोषी पाए जाने की स्थिति में उनको कठोर दंड दिया जाएगा आदि। लेकिन जो लोग भारतीय समाज में व्यापक घरेलू हिंसा पर मीडिया की सघन रिपोर्टिंग से आंखें नहीं मूंदे हुए हैं, उनको इस बयान से औरतों पर घर के भीतर हुई हिंसा की कई घटनाओं के बाद राज-समाज के अलमबरदारों के शुतुर्मुर्गाना रुख और राष्ट्रीय या पारिवारिक ‘इज्जत’ के नाम पर वाकये पर चादर डालने के अनेक हालिया प्रकरण भी जरूर याद आए होंगे।
सामान्य घरेलू तकरार पर अपनी पत्नी को पीट-पीट कर लहूलुहान कर देने के आरोपी अनिल वर्मा के मामले में हमारा लंदन उच्चायोग स्थानीय अखबारों में घटना के सुर्खियां बनने और खौफजदा पत्नी पारोमिता के अपने पांच बरस के बच्चे समेत भूमिगत होकर अपनी सुरक्षार्थ इंग्लैंड में पनाह मांगने के बाद ही सार्वजनिक रूप से हरकत में आया। वह भी यह कहते हुए कि भारतीय राजनयिक होने के नाते ब्रिटिश सरकार को अनिल वर्मा से पुलिसिया पूछताछ का हक भी नहीं बनता। अनिल वर्मा का डिप्लोमेटिक पासपोर्ट भारतीय प्रशासनिक सेवा के इस राजनयिक को परदेस में पुलिसिया पकड़-धकड़ के खिलाफ अभेद्य कवच प्रदान करता है। इधर भारत में टीवी चर्चाओं पर यह भी स्पष्ट हुआ कि घरेलू हिंसा निषेध बिल पास करा चुकी हमारी सरकार की दृष्टि में अंतत: यह मामला एक औरत के खिलाफ वहशियाना व्यवहार का कम, भारत सरकार की संप्रभुता और साख में परदेसियों के अनावश्यक हस्तक्षेप का अधिक है। खबरिया चैनलों में जिरह कर रहे विदेश सेवा के बड़े अफसरों ने वियेना संधि का हवाला देकर कहा कि अपराध चाहे जितना भी गंभीर क्यों न हो, आरोपी भारतीय राजनयिक है, इसलिए हम तो अपने देश के कानूनों के तहत भारत में लाकर मामला निपटाएंगे। वे यह इशारा करने से भी नहीं चूकि कि पीड़िता की चोटें संगीन नहीं थीं। पीड़िता पारोमिता खुद भी भारतीय रेल प्रशासनिक सेवा की अफसर तथा पति के बूते राजनयिक पासपोर्टधारक हैं, अत: उनको पति की घर वापसी के बाद परदेस में रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। आरोप साबित करने को उनको बच्चे समेत भारत लौटना ही होगा। मीडिया ने जब यह सचाई उजागर की कि मारपीट का यह सिलसिला पहले से चल रहा था और अनिल वर्मा की पूर्व पत्नी ने भी उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए उनसे तलाक ले लिया था, तो कुछ चैनलों में अनिल वर्मा के माता-पिता के बयान आ गए, जिसमें उन्होंने न सिर्फ अपने पुत्र को पाक दामन बताया, बल्कि उत्पीड़िता के चरित्र को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं।
ये तथ्य दिखाते हैं कि तमाम सामाजिक सुधारों, आर्थिक, शैक्षिक तरक्की तथा हिंसा निरोधक कानूनों के बावजूद घरेलू हिंसा हमारे शिक्षित समाज में भी मौजूद है, और उसे राज-समाज से एक तरह की सांस्कृतिक स्वीकृति भी हासिल होती रहती है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि घरेलू हिंसा के पीछे औरत को असुरक्षित और दब्बू बनाए रखने का इच्छुक एक पूरा सामाजिक वातावरण और गैरबराबरी के बूते चलने वाली व्यवस्था का भूगोल होता है। इसी वजह से हाथ छोड़ने वाले पुरुष से हमारा राज-समाज जहां गांधी या बुद्ध सरीखी करुणा और सहनशीलता की उम्मीद नहीं करता, वहीं हिंसा की शिकार हर औरत से मांग की जाती है कि ‘देश या परिवार की इज्जत’ बचाने के लिए गम खाकर भी घर की बात घर में ही रखी जाए, तो बेहतर।
मार्क्सवादियों के अनुसार औरत की इस स्थिति के मूल में सामंतवादी पूंजीवादी सोच है, जो औरतों को शिक्षा तथा आर्थिक उत्पादन से दूर रखती रही है। साम्यवादी व्यवस्था में जब हर औरत कामकाजी और आर्थिक तौर से उत्पादक बनेगी, तो स्त्री के खिलाफ होनेवाली हर तरह की हिंसा और शोषण पर रोक लग जाएगी। पर चीनी, रूसी या भारतीय हर मॉडल के साम्यवाद में पोलितब्यूरो से लेकर घरों तक में औरत-मर्द के बीच गैरबराबरी बनी रही है। घर की चहारदीवारी में जड़ जमाए पुरुष सत्ता की वजह से ही हर तरह की व्यवस्था में पुरुष को मालिक तथा औरत को पुरुष की संपत्ति मानने की भावना घर कर जाती है। औरत के खिलाफ हिंसा इसीलिए तब गंभीरता से ली जाती है, जब वह पुरुष की अमानत में खयानत साबित हो जाए। अकेली पीड़िता की ओर से मामला उछलने पर हर अभियुक्त की तरफ से पहला वार हिंसा की शिकार स्त्री के चाल-चलन पर किया जाता है। औरत की गवाही दर्ज करने, उसकी मेडिकल जांच कराने या साक्ष्य जमा करने में बेहद लापरवाही बरती जाती है। यदि आरोपी महत्वपूर्ण ओहदे पर हुआ, तब उसके बचाव में यहां तक कहा जाता है कि इस औरत की शिकायत पर उसे सजा हो गई, तो उसके परिवार या देश या पार्टी की साख को गहरा धक्का पहुंच सकता है। तब भी बात न बनी, तो तारीख पर तारीख पड़वाने का नुसखा पकड़ा जाता है कि अकेली औरत जात कब तक अदालत में लड़ेगी?
पर अब राजनीति की ही तरह औरत और मर्द के रिश्तों में भी लोकतंत्र दस्तक देकर बराबरी और चयन की आजादी के बुनियादी सवाल उठा रहा है। औरत जब तक एक समर्पिता धरोहर मानी जाती थी, तब तक प्रेम और दांपत्य में उसके हिस्से में पिटना और क्षमा करना ही आता रहा। पर आज की आत्मसजग औरत उस खांचे में फिट नहीं होना चाहती। इसलिए वह हिंसा की शिकार होने पर मानवाधिकारों का हवाला देती हुई प्रतिवाद करती है, थाने जाकर प्राथमिकी दर्ज कराती है। इसमें वह उन मीडिया तथा महिला संगठनों की मदद लेती है, जो मामले को सदयता से बरतते हैं और आक्रामकता से उसके लिए न्याय की गुहार लगाते हैं। औरतों की निंदा या पिटाई से उनके हकों के पक्ष में आया उफान नहीं बैठनेवाला।
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