Friday, February 11, 2011

यूपी में रोजाना 6 बहुओं को लील रहा दहेज


उत्तर प्रदेश में दहेज का दावानल दिन पर दिन विकराल होता जा रहा है। सूबे में रोजाना कम से कम छह औरतें दहेज के लिए जलायी जा रही हैं। तीन साल के अंदर 6470 बहुओं को सिर्फ दहेज के लिए अपनी जान गंवानी पड़ी है। तकनीकी और सामाजिक उन्नति के इस दौर में यह आंकड़े समाज की स्याह तस्वीर दिखाने व कानून- व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। मेरठ के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में 23 साल की प्राची को जिंदा फूंकने की कोशिश, बरेली के कैंट थाना क्षेत्र में सुषमा नामक युवती की हत्या, कानपुर के व्योहार खेड़ा में 35 साल की रानी को छत से नीचे फेंककर मार डाला। रायबरेली के जगतपुर में आरती सिंह को दहेज के लिए फूंका। यह घटनाएं दहेज के उस दावानल की बानगी हैं, जिसकी लपटें तमाम तरह के नियमों, कानून और जागरुकता के प्रयासों के बीच अचानक विकराल रूप ले लेती हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के विभिन्न जिलों में पिछले तीन सालो में (2008 में 2213, 2009 में 2205 और 2010 में 2052) छह हजार चार सौ सत्तर सुहागिनों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। हालांकि दहेज पर अंकुश लगाने को दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के तहत सभी जिला मुख्यालयों पर दहेज प्रतिषेध अधिकारी की तैनाती है, लेकिन अधिकांश अपने उत्तरदायित्व के प्रति निष्कि्रय हैं। निदेशक राज्य महिला कल्याण बिहारी स्वरूप का कहना है कि जिला दहेज प्रतिषेध कार्यालय, जिला पर्यवीक्षा अधिकारी के कार्यालय से संचालित होता है और वहां से पीडि़त महिला को मदद की जाती है। कानूनी सहायता के लिए निर्धारित धनराशि भी दी जाती है। वैसे विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल दावा है कि पुलिस की सख्ती से दहेज हत्या में कमी आयी हैं। मायके तक भी नहीं पहुंचती आह : महिलाओं के हक के लिए संघर्षरत अनुष्का, प्रमिला औैर आशा का कहना है कि परिवार न्यायालय से लेकर विभिन्न अदालतों में जितने मामले चल रहे हैं, उससे कई गुना बड़ी तादाद उन महिलाओं की है, जिनकी आह अपने ही सीने में कैद है। अदालतों तक जाने की बात दूर, पीहर तक भी वे अपना दुखड़ा नहीं पहंुचाती। दहेज के नाम पर सास, ननद का उत्पीड़न और पति की बेरुखी सहकर भी अपना मुंह बंद किये हैं।

महिला आयोग की सुनवाई नहीं
राज्य महिला आयोग ने उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाने के लिए प्रमुख सचिव गृह को पत्र लिखा है। आयोग ने पत्र में कहा गया है कि दहेज पीडि़त महिलाओं की सुनवाई के लिए पुलिस को और जिम्मेदार-जवाबदेह बनाया जाये। पुलिस ने इसमें लापरवाही बरतने वालों को दंडित करने की हिदायत दे दी है। यानी दोनों ने औपचारिकता निबाह दी।


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