Wednesday, February 23, 2011

यौन कर्मियों के पुनर्वास का सवाल


पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने यौन कर्मियों की सुध लेते हुए सरकार को उनके पुनर्वास के लिए योजनाएं बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यौन कर्मियों को भी गरिमामय जिंदगी जीने का अधिकार है। वे भी इंसान हैं और किसी को भी उन पर हिंसक हमले करने व हत्या करने का अधिकार नहीं है। यौन कर्मियों की जिंदगी के प्रति यह टिप्पणी सर्वोच्च अदालत की जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा व जस्टिस मार्कडेय काटजू की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। दरअसल, 17 सितबंर 1999 की रात को बुद्धदेव करमासकर ने कोलकाता के रेड-लाइट इलाके में बूरी नामक सेक्स वर्कर पर बर्बर हमले किए थे और इस जानलेवा हमले से बूरी की मौत हो गई। दोषी बुद्धदेव ने शीर्ष अदालत में अपनी उम्रकैद की सजा के खिलाफ अपील की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया। शीर्ष अदालत ने इस मामले के माध्यम से यौन कर्मियों की जिंदगी पर रोशनी डालते हुए सरकार और समाज का ध्यान एक बार फिर उनकी समस्याओं की ओर तो खींचा है, लेकिन इसके साथ ही उसका मुख्य जोर उन्हें इंसान होने के नाते सम्मान देना है। उनके इस पेशे में होने के कारण उनके प्रति बुरे नजरिए को बदलना होगा, क्योंकि कोई भी लड़की या औरत खुशी से इस पेशे में नहीं आती। गरीबी या हालात उन्हें यहां धकेल देते हैं। शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने अपने फैसले में यौन कर्मियों की जिंदगी की दुश्वारियों को करीब से समझने के लिए मशहूर बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास व महान रूसी लेखक दोस्तोवस्की के उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट का जिक्र किया। साहित्य में उद्धृत ऐसी मजबूत छवियों के पीछे अदालत की मंशा उनके प्रति नजरिए को बदलने के साथ-साथ केंद्र सरकार और राज्यों को उसका दायित्व भी याद दिलाना है। अदालत ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से यौन कर्मियों को तकनीकी-व्यावसायिक प्रशिक्षण देने संबंधी योजनाएं तैयार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत का मानना है कि यदि ऐसी महिला को तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण का मौका दिया जाता है तो वह अपना जिस्म बेचने के बजाए अपने हुनर से रोजी-रोटी कमाने के काबिल हो जाएगी। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनका काम सिर्फ प्रशिक्षित करना ही नहीं, बल्कि यौन कर्मियों द्वारा तैयार किए गए सामान के लिए बाजार उपलब्ध कराना भी होगा। अन्यथा सामान बिकेगा नहीं, इस्तेमाल नहीं होगा तो ये महिलाएं अपना पेट कैसे भर पाएंगी। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को अनुपालन रिपोर्ट जमा कराने के निर्देश दिए हैं ताकि अदालत को पता चल सके कि किस राज्य ने अपने यहां यौन कर्मियों के पुनर्वास संबंधी क्या कदम उठाए हैं। दरअसल, यौन कर्मियों का पुनर्वास एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में 6,88,751 पंजीकृत यौन कर्मी हैं, जबकि नाको का अनुमान है कि यह संख्या 12.63 लाख है। गौरतलब है कि देश में सबसे ज्यादा सेक्स वर्कर आंध्र प्रदेश में हैं। यहां इनकी संख्या एक लाख से ज्यादा है और उसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है, जहां करीब 79,000 सेक्स वर्कर हैं। तमिलनाडु तीसरे नंबर पर है तो महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल क्रमश: चौथे व पांचवें नंबर पर। महानगरों की सूची में दिल्ली में सबसे ज्यादा सेक्स वर्कर (37,900) हैं। ये सरकारी आंकड़े हैं। गैर सरकारी आंकड़े तो ज्यादा बताते हैं। यह सच है कि अधिकांश लड़कियां-महिलाएं इस पेशे में अपनी मर्जी व खुशी से नहीं आतीं। यह एक पेशा नहीं, बल्कि यौन उत्पीड़न है। पुरुष उन्हें इस पेशे में लाते हैं, जो उनका शोषण करते हैं। और यह शोषण गैर बराबरी, जाति, लिंग, वर्ग व नस्ल पर आधारित होता है। कोई भी औरत इसमें रहना नहीं चाहती, लेकिन गरीबी और हालात उसे विवश करते हैं। कई मर्तबा उनके साथ धोखा होता है। जानकार, रिश्तेदार, तथाकथित प्रेमी उन्हें नौकरी या शादी का सपना दिखाकर कोठे में पहुंचा देते हैं। जो महिलाएं इस पेशे में हैं, उनके बच्चों व रिश्तेदारों के इस पेशे में शमिल होने के मौके ज्यादा होते हैं। वेश्यावृत्ति उनकी गरीबी को दूर नहीं करती। हर साल हजारों नेपाली लड़कियां गैरकानूनी तौर पर तस्करी के जरिए लाकर इस धंधे में धकेल दी जाती हैं। सरकार व गैरसरकारी संगठनों की चिंता युवा लड़कियों की तस्करी में तेजी आना है। असम राज्य से पता चला कि वहां तस्कर प्राय: उन गरीब लड़कियों को अपना निशाना बनाते हैं, जिनके परिवार नदी किनारे रहते हैं। ऐसे परिवार बाढ़ विस्थापित होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि यौन कर्मियों के पुनर्वास को लेकर सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई। यह बात दीगर है कि वांछित नतीजे सामने नहीं आए। कई बार पुलिस ही लुटेरे की भूमिका निभाती है, जबकि उसका काम उन्हें संरक्षण देना है। कभी कुछेक यौन कर्मियों को कोठे से छुड़ाकर पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है तो वहां नशीले पदार्थो के सेवन की आदी बन चुकी इन वेश्याओं को इस बुरी लत से मुक्ति दिलाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती और न ही उन्हें समाज में फिर से शमिल करने पर ठोस चर्चा होती है। दान, सरकारी अनुदान की कमी व समय पर अनुदान का नहीं मिलना भी पुनर्वास में रुकावट डालता है। कई मर्तबा दलाल ही ऐसे केंद्रों में यौन कर्मी का फर्जी रिश्तेदार बनकर चला जाता है और केंद्र बिना गहन पड़ताल किए यौन कर्मी को उसके हवाले कर देते हैं। कुछ दिनों बाद दलाल उसे दूसरी जगह वेश्यावृत्ति के लिए भेज देता है। एक समस्या यह भी है कि इस पेशे से बाहर निकलने के बाद उन्हें समाज में कौन अपनाएगा। यह दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब पता चलता है कि वह एचआईवी/एड्स से पीडि़त है। अगर वह इस जानकारी को छुपाए रखती है और इलाज नहीं कराती तो उसकी जान को खतरा रहता है। समाज और परिवार को पीठ फेरने की बजाए उसे अपनाने के लिए आगे आकर मिसाल कायम करनी चाहिए। पुनर्वास एक लंबी प्रक्रिया है। दरअसल, इस मोर्चे पर सरकार को ठोस रणनीतियां बनाने के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना होगा। योजनाकारों को इस क्षेत्र में कुछ गैरसरकारी संगठनों द्वारा यौन कर्मियों को सशक्त बनाने और पुनर्वास के लिए चलाए जा रहे सफल प्रोजेक्ट को ध्यान में रखना होगा। उसकी सफलता के लिए प्रतिबद्धता की जरूरत है। अब शीर्ष अदालत ने तो केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सेक्स वर्करों को तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण देने व उनके लिए बाजार उपलब्ध कराने के निर्देश जारी कर दिए हैं, लेकिन इस पर अमल कितना होगा और यौन कर्मी किस तरह से सशक्त होंगी, यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि देह बेचने का धंधा रातोंरात खत्म नहीं हो सकता। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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