Monday, February 28, 2011

अपनी जमीन की तलाश


बंजारों के अभावग्रस्त जीवन से परिचित करा रहे हैं लेखक
तमाशा दिखाने वाले बंजारों (भीलों) की जिंदगी खुद ही एक तमाशा बन कर रह गई है। इनका न कोई वर्तमान है, न ही भविष्य। उन्हें दो जून की रोटी और चंद सिक्कों के लिए कोड़ों से अपने आपको तब तक पीटना पड़ता है जब तक उनके शरीर पर खून न उतर आए और देखने वाले की आंखें गीली न हो जाएं। सरकार की किसी भी योजना से इनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। योजनाएं कागजों तक ही सीमित रहती हैं और पैसा अधिकारियों की जेब के हवाले हो जाता है। देश के महानगरों में सड़कों पर, बाजारों में कहीं भी बंजारे तमाशा दिखाते या भीख मांगते मिल जाते हैं। एक महिला गीत गाते हुए ढोल बजाती है और उसके सामने एक पुरुष अपने आपको कोड़ों से लहूलुहान करता है। कोड़ों की आवाज जितनी तेज आती है, उतनी ही अधिक तालियां बजती हैं। किंतु इनकी चीखें न सरकार तक पहुंच पाती है और न ही इन तमाशबीनों तक। ये बंजारे अमूमन 40 से 70 रुपये पूरे दिन में कमा पाते हैं। इनका यह खेल चाबुक तक ही सीमित नहीं रहता। लोगों की जेब से पैसा निकालने के लिए बंजारे अपने हाथों में लोहे के सूएं तक घोंप लेते हैं। इन बंजारों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। इस वर्ग में साक्षरता दर करीब-करीब शून्य है। इसका एक कारण तो यह है कि इनके बच्चे तीन साल की उम्र से ही भीख मांगना या करतब दिखाना शुरू कर देते हैं। और दूसरे, स्थायी आवास न होने के कारण ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। सहीं अथरें में इन्हें भारत का नागरिक ही नहीं समझा जाता है। जनजातियों की स्थिति के अध्ययन के लिए फरवरी 2006 में बने आयोग के अध्यक्ष बालकिशन रेनके के अनुसार केंद्र सरकार के पास इन्हें राहत देने के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है, इसलिए इन्हें राज्यों के अधीन कर दिया गया है। पहली और तीसरी पंचवर्षीय योजना तक इनके लिए प्रावधान था लेकिन किसी कारणवश यह राशि खर्च नहीं हो सकी, तो इन्हें इस सूची से ही हटा लिया गया। काका कालेलकर आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था, कुछ जातियां अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ी जातियों से भी पिछड़ी हैं। योजनाओं में उनके लिए अलग से प्रावधान होना चाहिए। मुक्तिधार संस्था के अनुसार बंजारों की संख्या दस करोड़ से भी ज्यादा है। फिर भी इन्हें आज तक ना राशन कार्ड मिला है और ना ही मताधिकार का हक। देश में अनुसूचित जाति जनजाति के लिए 500 करोड़ से भी अधिक धनराशि खर्च करने का प्रावधान है लेकिन इन्हें कुछ भी हासिल नहीं। बंजारा जाति की सामाजिक एवं आर्थिक दशा काफी पिछड़ी हुई है। पिछली प्रदेश सरकारों में इस जाति को पिछड़ी जाति में शामिल करने का आश्र्वासन दिया लेकिन मामला अटका ही रह गया। सरकारी -गैरसरकारी नौकरियों पर निगाह डाली जाए तो इनकी भागीदारी लगभग नहीं के बराबर है। बंजारा जाति की सामाजिक दशा सुधारने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकारों से इन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही हैं, लेकिन इनके कल्याण के लिए किसी ने कोई जहमत नहीं उठाई। राजनीतिक आकाओं ने इसलिए भी कोई पहल नहीं की कि उनके वोट भी तो नहीं मिलते। भारत सरकार को चाहिए कि मूलभूत अधिकारों से भी वंचित बंजारों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए विशेष योजनाएं बनाए ताकि उन्हें भी औरों की तरह अपनी मुकम्मल जमीन मिल सके। आर्थिक सुधार के लिए विशेष पैकेज मिले, बच्चों के लिए नि:शुल्क कोचिंग और स्कूली व्यवस्था की जाए तभी शायद उनकी दशा सुधर सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, February 23, 2011

यौन कर्मियों के पुनर्वास का सवाल


पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने यौन कर्मियों की सुध लेते हुए सरकार को उनके पुनर्वास के लिए योजनाएं बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यौन कर्मियों को भी गरिमामय जिंदगी जीने का अधिकार है। वे भी इंसान हैं और किसी को भी उन पर हिंसक हमले करने व हत्या करने का अधिकार नहीं है। यौन कर्मियों की जिंदगी के प्रति यह टिप्पणी सर्वोच्च अदालत की जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा व जस्टिस मार्कडेय काटजू की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। दरअसल, 17 सितबंर 1999 की रात को बुद्धदेव करमासकर ने कोलकाता के रेड-लाइट इलाके में बूरी नामक सेक्स वर्कर पर बर्बर हमले किए थे और इस जानलेवा हमले से बूरी की मौत हो गई। दोषी बुद्धदेव ने शीर्ष अदालत में अपनी उम्रकैद की सजा के खिलाफ अपील की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया। शीर्ष अदालत ने इस मामले के माध्यम से यौन कर्मियों की जिंदगी पर रोशनी डालते हुए सरकार और समाज का ध्यान एक बार फिर उनकी समस्याओं की ओर तो खींचा है, लेकिन इसके साथ ही उसका मुख्य जोर उन्हें इंसान होने के नाते सम्मान देना है। उनके इस पेशे में होने के कारण उनके प्रति बुरे नजरिए को बदलना होगा, क्योंकि कोई भी लड़की या औरत खुशी से इस पेशे में नहीं आती। गरीबी या हालात उन्हें यहां धकेल देते हैं। शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने अपने फैसले में यौन कर्मियों की जिंदगी की दुश्वारियों को करीब से समझने के लिए मशहूर बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास व महान रूसी लेखक दोस्तोवस्की के उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट का जिक्र किया। साहित्य में उद्धृत ऐसी मजबूत छवियों के पीछे अदालत की मंशा उनके प्रति नजरिए को बदलने के साथ-साथ केंद्र सरकार और राज्यों को उसका दायित्व भी याद दिलाना है। अदालत ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से यौन कर्मियों को तकनीकी-व्यावसायिक प्रशिक्षण देने संबंधी योजनाएं तैयार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत का मानना है कि यदि ऐसी महिला को तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण का मौका दिया जाता है तो वह अपना जिस्म बेचने के बजाए अपने हुनर से रोजी-रोटी कमाने के काबिल हो जाएगी। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनका काम सिर्फ प्रशिक्षित करना ही नहीं, बल्कि यौन कर्मियों द्वारा तैयार किए गए सामान के लिए बाजार उपलब्ध कराना भी होगा। अन्यथा सामान बिकेगा नहीं, इस्तेमाल नहीं होगा तो ये महिलाएं अपना पेट कैसे भर पाएंगी। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को अनुपालन रिपोर्ट जमा कराने के निर्देश दिए हैं ताकि अदालत को पता चल सके कि किस राज्य ने अपने यहां यौन कर्मियों के पुनर्वास संबंधी क्या कदम उठाए हैं। दरअसल, यौन कर्मियों का पुनर्वास एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में 6,88,751 पंजीकृत यौन कर्मी हैं, जबकि नाको का अनुमान है कि यह संख्या 12.63 लाख है। गौरतलब है कि देश में सबसे ज्यादा सेक्स वर्कर आंध्र प्रदेश में हैं। यहां इनकी संख्या एक लाख से ज्यादा है और उसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है, जहां करीब 79,000 सेक्स वर्कर हैं। तमिलनाडु तीसरे नंबर पर है तो महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल क्रमश: चौथे व पांचवें नंबर पर। महानगरों की सूची में दिल्ली में सबसे ज्यादा सेक्स वर्कर (37,900) हैं। ये सरकारी आंकड़े हैं। गैर सरकारी आंकड़े तो ज्यादा बताते हैं। यह सच है कि अधिकांश लड़कियां-महिलाएं इस पेशे में अपनी मर्जी व खुशी से नहीं आतीं। यह एक पेशा नहीं, बल्कि यौन उत्पीड़न है। पुरुष उन्हें इस पेशे में लाते हैं, जो उनका शोषण करते हैं। और यह शोषण गैर बराबरी, जाति, लिंग, वर्ग व नस्ल पर आधारित होता है। कोई भी औरत इसमें रहना नहीं चाहती, लेकिन गरीबी और हालात उसे विवश करते हैं। कई मर्तबा उनके साथ धोखा होता है। जानकार, रिश्तेदार, तथाकथित प्रेमी उन्हें नौकरी या शादी का सपना दिखाकर कोठे में पहुंचा देते हैं। जो महिलाएं इस पेशे में हैं, उनके बच्चों व रिश्तेदारों के इस पेशे में शमिल होने के मौके ज्यादा होते हैं। वेश्यावृत्ति उनकी गरीबी को दूर नहीं करती। हर साल हजारों नेपाली लड़कियां गैरकानूनी तौर पर तस्करी के जरिए लाकर इस धंधे में धकेल दी जाती हैं। सरकार व गैरसरकारी संगठनों की चिंता युवा लड़कियों की तस्करी में तेजी आना है। असम राज्य से पता चला कि वहां तस्कर प्राय: उन गरीब लड़कियों को अपना निशाना बनाते हैं, जिनके परिवार नदी किनारे रहते हैं। ऐसे परिवार बाढ़ विस्थापित होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि यौन कर्मियों के पुनर्वास को लेकर सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई। यह बात दीगर है कि वांछित नतीजे सामने नहीं आए। कई बार पुलिस ही लुटेरे की भूमिका निभाती है, जबकि उसका काम उन्हें संरक्षण देना है। कभी कुछेक यौन कर्मियों को कोठे से छुड़ाकर पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है तो वहां नशीले पदार्थो के सेवन की आदी बन चुकी इन वेश्याओं को इस बुरी लत से मुक्ति दिलाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती और न ही उन्हें समाज में फिर से शमिल करने पर ठोस चर्चा होती है। दान, सरकारी अनुदान की कमी व समय पर अनुदान का नहीं मिलना भी पुनर्वास में रुकावट डालता है। कई मर्तबा दलाल ही ऐसे केंद्रों में यौन कर्मी का फर्जी रिश्तेदार बनकर चला जाता है और केंद्र बिना गहन पड़ताल किए यौन कर्मी को उसके हवाले कर देते हैं। कुछ दिनों बाद दलाल उसे दूसरी जगह वेश्यावृत्ति के लिए भेज देता है। एक समस्या यह भी है कि इस पेशे से बाहर निकलने के बाद उन्हें समाज में कौन अपनाएगा। यह दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब पता चलता है कि वह एचआईवी/एड्स से पीडि़त है। अगर वह इस जानकारी को छुपाए रखती है और इलाज नहीं कराती तो उसकी जान को खतरा रहता है। समाज और परिवार को पीठ फेरने की बजाए उसे अपनाने के लिए आगे आकर मिसाल कायम करनी चाहिए। पुनर्वास एक लंबी प्रक्रिया है। दरअसल, इस मोर्चे पर सरकार को ठोस रणनीतियां बनाने के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना होगा। योजनाकारों को इस क्षेत्र में कुछ गैरसरकारी संगठनों द्वारा यौन कर्मियों को सशक्त बनाने और पुनर्वास के लिए चलाए जा रहे सफल प्रोजेक्ट को ध्यान में रखना होगा। उसकी सफलता के लिए प्रतिबद्धता की जरूरत है। अब शीर्ष अदालत ने तो केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सेक्स वर्करों को तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण देने व उनके लिए बाजार उपलब्ध कराने के निर्देश जारी कर दिए हैं, लेकिन इस पर अमल कितना होगा और यौन कर्मी किस तरह से सशक्त होंगी, यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि देह बेचने का धंधा रातोंरात खत्म नहीं हो सकता। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Monday, February 21, 2011

आरक्षण के नाम पर आमने-सामने जातियां


आरक्षण बचाने और हटाने के संघर्ष में एक बार फिर जातियां आमने-सामने हो गयी हैं। रविवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी इसका गवाह बनी। दोनों पक्षों ने अपने अपने तरकश से विचारों के तीर छोड़े। इन तीरों के सीधे निशाने पर सर्वसमाज की बुनियाद थी, जो दरकती नजर आई। सहकारिता भवन में आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने आरक्षण के पक्ष में, जबकि सर्वजन हिताय संरक्षण समिति ने गन्ना सभागार में आरक्षण के विपक्ष में विमर्श आयोजित किया। सहकारिता भवन के विमर्श में शामिल लगभग सभी वक्ताओं ने आरक्षण के बहाने 15 और 85 प्रतिशत का नारा उछाल कर एक लकीर खींच दी। इन वक्ताओं ने अनुसूचित जाति, जन जाति, पिछड़ी जाति और मुसलमानों को लामबंद करने का आह्वान सिर्फ आरक्षण तक केन्दि्रत नहीं किया। कमोबेश सबने आने वाले समय में एक नये सियासी समीकरण पर जोर दिया। हक के लिए लंबी लड़ाई का आह्वान किया। पिछड़ों को साथ जोड़ने और अगड़ों पर आक्रामक होने की इनकी रणनीति साफ-साफ दिखी। गौर करें तो वर्ष 1993 में अनुसूचित जाति, पिछड़ों और मुसलमानों को एक साथ जोड़ने का प्रयोग सपा और बसपा ने मिलकर किया था और सूबे में गठबंधन की सरकार भी बनाई थी। मण्डल कमीशन की सिफारिशों के बाद 15 और 85 के बीच खिंची लकीर के दृष्टिगत ही तबका गठबंधन था। यद्यपि दो साल के भीतर आपसी टकराव में सपा और बसपा की राहें जुदा हो गयीं। तबसे अब तक अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति को एक साथ जोड़ने की कवायद विभिन्न मुद्दों के बहाने शुरू हुई, लेकिन परवान नहीं चढ़ी। अलबत्ता बसपा ने सपा के साथ समझौते का प्रयोग असफल होने के बाद अगड़ों को साथ जोड़कर एक नया फार्मूला शुरू कर दिया, लेकिन हाल के दिनों में पदोन्नति में आरक्षण के मसले को लेकर टकराव शुरू हो गया है। सर्वजन हिताय समिति ने पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे को लेकर जो अभियान शुरू किया है, उसमें पिछड़ी जाति के अधिकारियों-कर्मचारियों की भरपूर भागीदारी है। आरक्षण समर्थक इस समीकरण को तोड़ने का भी रास्ता तलाश रहे हैं। आरक्षण समर्थकों का जोर पिछड़ी जाति के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रभावित करने का है। इसीलिए आरक्षण संरक्षण सम्मेलन में मंच पर पिछड़ी जाति के अवधेश कुमार वर्मा को बतौर संयोजक प्रस्तुत किया गया। सम्मेलन की कमान भी वर्मा ही संभाले रहे। यद्यपि वर्मा के अलावा पिछड़ी जाति का कोई दूसरा प्रमुख परिदृश्य में नहीं था। पिछड़ी जाति के एक और नेता राकेश सिंह मंच पर पीछे बैठे थे।

Tuesday, February 15, 2011

अब ऑनलाइन मिलेगी बच्चों को गोद लेने संबंधी जानकारी

 केंद्र सरकार बच्चों को गोद लेने और उनके संरक्षण की प्रक्रिया के दिशानिर्देशों में परिवर्तन करने जा रही है और इसके तहत देश एवं विदेश में दत्तक बच्चों को अपनाने के लिए पहले से अधिक शुल्क अदा करना होगा। बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिहाज से मंत्रालय की केयरिंग्सयोजना की शुरूआत करते हुए केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने सोमवार को कहा कि सरकार बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के लिहाज से दिशानिर्देशों में संशोधन करने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में अधिसूचना जल्दी जारी हो सकती है। मंत्रालय की एक अधिकारी ने बताया कि देश के भीतर ही बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया में अभी 25 हजार रुपए शुल्क अदा करना होता है जो संशोधन के बाद 40 हजार रुपए किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि विदेश में भारतीय बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया में अभी 3500 अमेरिकी डॉलर की राशि ली जाती है जिसे संशोधित दिशानिर्देशों में 5000 डालर करने का प्रस्ताव है। इससे पहले तीरथ ने महिला और बाल विकास मंत्रालय की कारायोजना के तहत केयरिंग्स’ (सेंट्रल एडाप्शन रिसर्च इंफर्मेशन एंड गाइडेंस सिस्टम) की शुरूआत की, जिसके तहत देश में गोद लिए जाने के लिए उपलब्ध सभी बच्चों और इन्हें दत्तक पुत्र-पुत्री के तौर पर अपनाने के लिए तैयार अभिभावकों का पूरा डाटा ऑनलाइन उपलब्ध होगा तथा इसके लिए अभिभावक ऑनलाइन ही आवेदन कर सकते हैं।

Saturday, February 12, 2011

देश में दलित थाने भी होने चाहिए: पुनिया


दलितों के बीच जागरूकता अभियान का संदेश लेकर आगरा पहुंचे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया के संबोधन में आरक्षण का मुद्दा हावी रहा। पुनिया ने खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए उन्हें दलित विरोधी करार दिया। उन्होंने दलितों की सुरक्षा के लिए दलित थाने भी बनाने की मांग की। सांसद राज बब्बर ने पुनिया का स्वागत करते हुए दलितों के लिए उनके प्रयासों और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान को सराहनीय कदम बताया। पीएल पुनिया ने बताया कि दलितों को ये ही नहीं मालूम कि केंद्र द्वारा उनके लिए क्या योजनाएं हैं, संविधान में उनके अधिकार क्या हैं। इसीलिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की ओर से देश भर में जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री मायावती पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा दलित होने के बावजूद वे उत्थान के पथ से हटकर भ्रष्टाचार की राह पर चल रही हैं। 90 फीसदी मामलों में शिकायत ही दर्ज नहीं होती। उन्होंने मांग की कि दलितों को न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका में दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए और दलितों के लिए दलित थाने बनाए जाने चाहिए। आयोग अध्यक्ष ने कहा कि दलित वर्ग को आरक्षण की मांग भी उठाई जाएगी।

Friday, February 11, 2011

यूपी में रोजाना 6 बहुओं को लील रहा दहेज


उत्तर प्रदेश में दहेज का दावानल दिन पर दिन विकराल होता जा रहा है। सूबे में रोजाना कम से कम छह औरतें दहेज के लिए जलायी जा रही हैं। तीन साल के अंदर 6470 बहुओं को सिर्फ दहेज के लिए अपनी जान गंवानी पड़ी है। तकनीकी और सामाजिक उन्नति के इस दौर में यह आंकड़े समाज की स्याह तस्वीर दिखाने व कानून- व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। मेरठ के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में 23 साल की प्राची को जिंदा फूंकने की कोशिश, बरेली के कैंट थाना क्षेत्र में सुषमा नामक युवती की हत्या, कानपुर के व्योहार खेड़ा में 35 साल की रानी को छत से नीचे फेंककर मार डाला। रायबरेली के जगतपुर में आरती सिंह को दहेज के लिए फूंका। यह घटनाएं दहेज के उस दावानल की बानगी हैं, जिसकी लपटें तमाम तरह के नियमों, कानून और जागरुकता के प्रयासों के बीच अचानक विकराल रूप ले लेती हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के विभिन्न जिलों में पिछले तीन सालो में (2008 में 2213, 2009 में 2205 और 2010 में 2052) छह हजार चार सौ सत्तर सुहागिनों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। हालांकि दहेज पर अंकुश लगाने को दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के तहत सभी जिला मुख्यालयों पर दहेज प्रतिषेध अधिकारी की तैनाती है, लेकिन अधिकांश अपने उत्तरदायित्व के प्रति निष्कि्रय हैं। निदेशक राज्य महिला कल्याण बिहारी स्वरूप का कहना है कि जिला दहेज प्रतिषेध कार्यालय, जिला पर्यवीक्षा अधिकारी के कार्यालय से संचालित होता है और वहां से पीडि़त महिला को मदद की जाती है। कानूनी सहायता के लिए निर्धारित धनराशि भी दी जाती है। वैसे विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल दावा है कि पुलिस की सख्ती से दहेज हत्या में कमी आयी हैं। मायके तक भी नहीं पहुंचती आह : महिलाओं के हक के लिए संघर्षरत अनुष्का, प्रमिला औैर आशा का कहना है कि परिवार न्यायालय से लेकर विभिन्न अदालतों में जितने मामले चल रहे हैं, उससे कई गुना बड़ी तादाद उन महिलाओं की है, जिनकी आह अपने ही सीने में कैद है। अदालतों तक जाने की बात दूर, पीहर तक भी वे अपना दुखड़ा नहीं पहंुचाती। दहेज के नाम पर सास, ननद का उत्पीड़न और पति की बेरुखी सहकर भी अपना मुंह बंद किये हैं।

महिला आयोग की सुनवाई नहीं
राज्य महिला आयोग ने उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाने के लिए प्रमुख सचिव गृह को पत्र लिखा है। आयोग ने पत्र में कहा गया है कि दहेज पीडि़त महिलाओं की सुनवाई के लिए पुलिस को और जिम्मेदार-जवाबदेह बनाया जाये। पुलिस ने इसमें लापरवाही बरतने वालों को दंडित करने की हिदायत दे दी है। यानी दोनों ने औपचारिकता निबाह दी।