जीने के लिए दो जून की रोटी अनिवार्य है। मगर, उतना ही अनिवार्य है शरीर के महत्वपूर्ण अंगों का दुरुस्त होना। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जीने की ललक ने बंगाल के उत्तर दिनाजपुर के बिंदौल गांव की 90 फीसदी आबादी की जिंदगी दांव पर लगा दी है। शासन और प्रशासन जीवन के इस कुत्सित खेल के खामोश गवाह बने हुए हैं। मामला किडनी के धंधे का है। दो जून की रोटी और जीवन की अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए यहां के ग्रामीण अपनी किडनी तक बेच रहे हैं। अवैध तरीके से चल रहा यह धंधा यहां खूब फला-फूला। उसने गांव के 90 फीसदी लोगों को मौत के दरवाजे पर पहुंचा दिया। ये वे लोग हैं जो अपनी किडनी गंवा चुके हैं। अब तो यह गांव किडनी के बिग बाजार के रूप में सुर्खियों में है। रायगंज प्रखंड का यह गांव आदिवासी बहुल है। विकास की रोशनी से महरूम इस गांव की बड़ी आबादी भूमिहीन है। जिंदगी मजदूरी पर आधारित है, मगर काम के अवसर नगण्य। ऐसी स्थिति में पलायन की विवशता ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। काम की तलाश में बाहर जाने वाले यहां के लोग अक्सर दलालों के चक्कर में फंसकर अपनी किडनी गंवा रहे हैं। 80 घरों के इस गांव में शायद ही कोई परिवार बचा हो, जिसके किसी सदस्य ने अपनी किडनी नहीं गंवाई हो। पहले तो किडनी बेचने का धंधा सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित था, मगर अब महिलाओं को इसके लिए लालच दिया जा रहा है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसे इस गांव में साल में एक बार मक्के की फसल दिखाई पड़ती है। वह भी वर्षा पर निर्भर है। अभाव की परिस्थितियों का लाभ उठाकर गांव के ही एक बड़े किसान ने किडनी की दुकानदारी शुरू कर दी। वह ग्रामीणों को किडनी के एवज में तीन-चार लाख रुपये दिलाने का झांसा देकर बाहर ले जाता है। इतनी रकम पाने का सपना देखकर ग्रामीण अपना जीवन दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें होश तब आता है, जब उनका सबकुछ लुट चुका होता है। किडनी निकाल लेने के बाद वादे के मुताबिक राशि नहीं दी जाती। किडनी गंवाने वाला व्यक्ति भी डर के कारण पुलिस के पास जाने से कतराता है। इस संबंध में पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मीडिया के सामने कुछ भी कहने से इंकार करते हैं।
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