समलैंगिकता को लेकर हाईकोर्ट के फैसले को विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भले ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी हो लेकिन केंद्र सरकार के साथ अब दिल्ली सरकार भी समलैंगिकता पर दिए गए हाईकोर्ट के निर्णय के पक्ष में है। इस संबध में दिल्ली सरकार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष शपथपत्र देकर यह स्पष्ट करेगी कि हाईकोर्ट के निर्णय पर केंद्र सरकार की राय का दिल्ली सरकार समर्थन करती है। दिल्ली सरकार के एक सव्रे के मुताबिक दिल्ली में 28000 समलैंगिक हैं जिनमें 7.9 प्रतिशत लोग एड्स का शिकार हैं। समलै¨गकता को लेकर हाईकोर्ट ने जुलाई 2009 में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए दो बालिग समलैंगिकों के बीच आपसी सहमति से बनाए जाने वाले संबध को मान्यता दी थी और स्पष्ट किया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 का प्रयोग दो बालिग युवकों द्वारा आपसी सहमति से बनाए जाने वाले आपसी यौन संबधों पर नहीं किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह फैसला समलैंगिकों के अधिकारों के लिए आवाज उठा रही संस्था नाज फाउंडेशन की एक याचिका पर दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले को अनेक संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। इस मामले में दिल्ली सरकार भी एक पक्ष है तथा दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग व एडस नियंतण्रसोसायटी को भी अपना पक्ष भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखना है। इस बाबत केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि समलैंगिकता पर हाईकोर्ट के फैसले में कुछ भी गलत नहीं है। केंद्र सरकार के इस रुख से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार समलैंगिकता के पक्ष में है। केंद्र सरकार के बाद अब दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार की राय पर ही चलने का निर्णय लिया है। उल्लेखनीय है कि सोमवार को दिल्ली सरकार के मत्रिमंडल की बैठक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अध्यक्षता में हुई। बैठक में यह प्रस्ताव पेश किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल किए जाने वाले शपथपत्र के मसौदे पर विचार किया गया। सूत्रों के अनुसार बैठक में हालांकि एक-दो मंत्री हाईकोर्ट के निर्णय से पूरी तरह सहमत नहीं थे लेकिन बाद में सर्वसम्मति से यह तय किया गया कि दिल्ली सरकार का कोई भी निर्णय केंद्र सरकार के निर्णय के खिलाफ नहीं होगा। केबिनेट सदस्यों का कहना था कि यदि केंद्र सरकार के निर्णय के खिलाफ कोई राय दी जाती है तो इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि समलैंगिकता पर हाईकोर्ट के निर्णय को लेकर जो भी केंद्र की राय है उसी राय का समर्थन करते हुए दिल्ली सरकार भी अपना शपथपत्र सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश करेगी। सूत्रों के अनुसार इस संबध में दिल्ली सरकार की ओर से दो शपथपत्र पेश किए जाएंगे जिसमें एक शपथपत्र स्वास्थ्य विभाग की ओर से होगा जबकि दूसरा शपथपत्र एड्स नियंतण्रसोसायटी की ओर से होगा। गौरतलब है कि दिल्ली में लगभग 28000 समलैंगिक हैं जिनमें 7.9 प्रतिशत एड्स का शिकार हैं। सरकार का मानना है कि यदि इन लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल करने के लिए इन लोगों के बीच स्वास्थ्य विभाग को काम करना है तो इन्हें कानूनी दायरे से मुक्त करना आवश्यक है।
Tuesday, March 20, 2012
Wednesday, March 14, 2012
घर में शौचालय नहीं पर जेब में मोबाइल
देश की जनसंख्या में से लगभग आधे लोगों के पास घर में अपना शौचालय नहीं है। वह खुले में शौच जाते हैं, लेकिन इससे अधिक लोगों के पास अपना मोबाइल फोन है। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने मकान, घरेलू सुविधाओं और संपत्ति पर वर्ष 2011 के आकंड़ा जारी किए। इन आकड़ों के अनुसार भारत के 24.66 करोड़ घरों में से केवल 46.9 फीसद घरों में शौचालय की सुविधा है। 49.8 फीसद खुले में शौच जाते हैं। 3.2 फीसद सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। झारखंड इस सूची में शीर्ष पर है, जहां 77 फीसद घरों में कोई शौचालय की सुविधा नहीं है। इस मामले में ओड़िशा दूसरे और बिहार तीसरे स्थान पर है। यहां क्र मश: 76.6 फीसद और 75.8 फीसद घरों में शौचालय नहीं है। गृह सचिव की ओर से जारी आकड़ों के अनुसार हालांकि 63.2 फीसद घरों में टेलीफोन और 53.2 फीसद के पास मोबाइल फोन है। टेलीफोन के मामले में लक्षद्वीप सबसे आगे है, जहां 93.6 फीसद घरों में अपना मोबाइल सेट है। इसके बाद दिल्ली और केंद्रीय संघ शासित प्रदेशों दिल्ली और चंडीगढ़ का नम्बर है, जहां क्र मश: 90.8 फीसद और 89.2 फीसद 89.2 फीसद घरों में अपना टेलीफोन सेट है। इसके अतिरिक्त 62.5 फीसद ग्रामीण जनता अभी भी खाना बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करती है, जबकि 44.8 फीसद लोग परिवहन के लिए साइकिल प्रयोग करते हैं। वहीं इंटरनेट सुविधा के साथ कम्प्यूटर 3.1 फीसद जनसख्या के पास पहुंच चुका है। महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त सी चंद्रमौली ने यहां कहा कि खुले में शौच देश के लिए अभी भी बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। पारंपरिक कारण और शिक्षा की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। इस मोच्रे पर काफी कुछ करने की जरूरत है।’
दिल्ली में 57.7 प्रतिशत शहरी गरीब बच्चे कुपोषण के कारण बौने
राजधानी दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय भले ही देश में सर्वाधिक हो लेकिन दिल्ली के बच्चे ही सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार हैं और उनका शारीरिक विकास सही तरीके से नहीं हो रहा है। शहरी गरीब परिवारों में 57.7 प्रतिशत 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे कुपोषण व पर्याप्त भोजन न मिलने केकारण औसत कद से छोटे हैं और कई तरह के संक्रमण का शिकार हैं। मध्यम वर्ग में भी करीब 38 प्रतिशत बच्चों का कद कुपोषण के कारण कम है। यह बच्चे अंडरवेट होने के साथ- साथ एनीमिया के भी शिकार हैं। यह खुलासा नेशनल फैमिली हेल्थ सव्रे-3 में हुआ। दिल्ली सरकार ने इन आंकड़ों को नकार दिया और वास्तविक आंकड़े एकत्र करने के लिए नया सव्रे कराने की बात कही है। कुपोषण के कारण मासूम बच्चों के शारीरिक विकास में आ रही इस कमी को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर मिशन न्यूट्रीशियन काउंसिल का गठन किया गया है जिसका मकसद देश के सभी राज्यों में एक मिशन के रूप में कुपोषण के खिलाफ अभियान चलाना है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं बच्चों के कुपोषण को लेकर गंभीर हैं और कुपोषण को दूर करना उनकी प्राथकिमताओं में शामिल है। नेशनल फैमिली हेल्थ सव्रे-3 (एनएफएचएस) 2005- 06 में किया गया था लेकिन सामने आये आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2008-09 में दिल्ली के आंकड़ों पर पुन: मंथन हुआ। पता चला कि शहरी गरीब वर्ग में 57.7 प्रतिशत पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे कुपोषण के कारण कद में छोटे, वजन में कम और एनीमिया के शिकार हैं। उनका विकास भी सही ढंग से नहीं हो रहा है। मिशन न्यूट्रीशियन काउंसिल की ओर से यह आंकड़े मंगलवार को एक बैठक में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सामने भी रखे गए। जो आंकड़े बैठक में रखे गए उनके अनुसार मध्यमवर्गीय परिवारों के 37.9 प्रतिशत बच्चों के अलावा समूची दिल्ली में औसतन 42.2 प्रतिशत 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। एनएफएचएस की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में गरीब परिवारों के 45.9 प्रतिशत बच्चों का वजन कम है जबकि इस वर्ग के 67 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। इसी तरह 5 वर्ष से कम आयु के मध्यमवर्गीय 23 प्रतिशत बच्चे औसत वजन से कम हैं तथा 54 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। आंकड़ों के अनुसार पोषण की दृष्टि से महिलाओं की स्थिति भी बदतर है। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में 15 से 49 वर्ष आयु की गरीब वर्ग की 51.4 प्रतिशत शहरी महिलाएं कुपोषण के कारण एनीमिया की शिकार हैं। इसी आयु वर्ग की मध्यम वर्गीय महिलाओं में भी 43.6 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण के कारण एनीमिया की शिकार हैं। बैठक में मिशन न्यूट्रीशियन के पदाधिकारियों ने जब इन आंकड़ों पर चिंता व्यक्त कर मुख्यमंत्री से आवश्यक कदम उठाने को कहा तो सरकार ने इन आंकड़ों को ही खारिज कर दिया। बैठक में मौजूद समाज कल्याण मंत्री प्रो. किरण वालिया का कहना है कि जो आंकड़े पेश किए गए वह सत्य से परे हैं उन पर विास नहीं किया जा सकता। दिल्ली में बच्चों के उचित पोषण के लिए मिड डे मील, आईसीडीएस आदि योजनाओं के अलावा आंगनवाड़ी स्तर पर भी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। आंकड़ों में मध्यमवर्गीय परिवारों के 38 प्रतिशत बच्चों को भी कुपोषण का शिकार बताया गया है जो आश्चर्यजनक है। बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना सरकार का लक्ष्य है। सरकार ने मिशन न्यूट्रीशियन से कहा कि नए सिरे से कोई सव्रे कराया जाए और यदि सरकार के स्तर पर किए जा रहे उपायों में कोई कमी है तो वह भी बताई जाए ताकि उन्हें दूर किया जा सके। उन्होंने बताया कि नए सिरे से एक सव्रे कराने पर सहमति बनी है। सव्रे एक वर्ष में पूरा होगा। सव्रे के आधार पर ही सरकार अपनी आगामी योजनाएं बनाएगी।
देश में 25 लाख पुरुष समलैंगिक
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश में कुल 25 लाख पुरुष समलैंगिक हैं जिनमें से 4 लाख एचआइवी संक्रमण के गंभीर खतरे की जद में हैं। यह भी कहा है कि देश में कुल 24 लाख लोग एचआइवी संक्रमित हैं। सरकार की ओर से ये आंकड़े सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दाखिल किए गए हलफनामे में दिए गए हैं। हलफनामा स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से दाखिल किया गया है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट आजकल समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है। पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय से एचआइवी संक्रमण व समलैंगिक लोगों के बारे में आंकड़ा बताने को कहा था। मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पेश एडिशनल सॉलीसिटर जनरल मोहन जैन ने मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ के समक्ष स्वास्थ्य मंत्रालय का हलफनामा पेश किया। पीठ ने इस हलफनामे पर गौर भी फरमाया। हलफनामे में सरकार ने एचआइवी/ एड्स महामारी को रोकने के लिए देश में किए जा रहे उपायों का विस्तृत ब्योरा दिया है। साथ ही एचआइवी संक्रमित कुल जनसंख्या के साथ-साथ देश में पुरुष समलैंगिकों की कुल संख्या का भी ब्योरा दिया है। सरकार ने कहा है कि विशेषज्ञों के मुताबिक देश में करीब 25 लाख पुरुष समलैंगिक हैं। 25 लाख में से 4 लाख समलैंगिक पुरुष एचआइवी के गंभीर खतरे की जद में हैं। इनमें से 28 हजार से 31 हजार पुरुष समलैंगिक एचआइवी संक्रमित हो सकते हैं। सरकार ने एचआइवी के गंभीर खतरे की जद में आने वाले 4,27045 पुरुष समलैंगिकों का राज्यवार ब्योरा भी दिया है। सबसे बड़ी संख्या महाराष्ट्र में हैं जहां 99,533 पुरुष समलैंगिक गंभीर खतरे की जद में हैं। दिल्ली में भी इनकी संख्या 28,999 है। सरकार ने गिनती का तरीका भी बताया है जिसमें कहा गया है कि एड्स नियंत्रण अभियान के तहत ऐसे लोगों के आने-जाने और एकत्र होने के हॉट स्पाट चिन्हित किए जाते हैं और उसी आधार पर आंकड़े तैयार होते हैं। यह भी कहा है कि ये आंकड़े अभियान की जद में आने वाले लोगों के ही हैं। कुल एचआइवी पीडि़तों का आंकड़ा भी दिया गया है। जिसके मुताबिक देश में कुल 24 लाख लोग एचआइवी संक्रमित हैं। इसमें 20 लाख वयस्क (15 से 49 वर्ष), 3 लाख बुजुर्ग (49 वर्ष से अधिक) और 1 लाख बच्चे (15 वर्ष से कम आयु) के हैं। मंत्रालय ने कहा है कि 85 फीसदी एचआइवी/एड्स शारीरिक संबंधों के जरिए फैलता है बाकी संक्रमित सुई के इस्तेमाल, संक्रमित मां की संतान आदि से होता है। शारीरिक संबंधों को दो श्रेणी में बांटा गया है पहली महिला सेक्स वर्कर और दूसरी पुरुष समलैंगिकों का आपस में संबंध बनाना। पुरुष समलैंगिकों में किन्नर भी शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल का गांव बना किडनी का बिग बाजार
जीने के लिए दो जून की रोटी अनिवार्य है। मगर, उतना ही अनिवार्य है शरीर के महत्वपूर्ण अंगों का दुरुस्त होना। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जीने की ललक ने बंगाल के उत्तर दिनाजपुर के बिंदौल गांव की 90 फीसदी आबादी की जिंदगी दांव पर लगा दी है। शासन और प्रशासन जीवन के इस कुत्सित खेल के खामोश गवाह बने हुए हैं। मामला किडनी के धंधे का है। दो जून की रोटी और जीवन की अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए यहां के ग्रामीण अपनी किडनी तक बेच रहे हैं। अवैध तरीके से चल रहा यह धंधा यहां खूब फला-फूला। उसने गांव के 90 फीसदी लोगों को मौत के दरवाजे पर पहुंचा दिया। ये वे लोग हैं जो अपनी किडनी गंवा चुके हैं। अब तो यह गांव किडनी के बिग बाजार के रूप में सुर्खियों में है। रायगंज प्रखंड का यह गांव आदिवासी बहुल है। विकास की रोशनी से महरूम इस गांव की बड़ी आबादी भूमिहीन है। जिंदगी मजदूरी पर आधारित है, मगर काम के अवसर नगण्य। ऐसी स्थिति में पलायन की विवशता ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। काम की तलाश में बाहर जाने वाले यहां के लोग अक्सर दलालों के चक्कर में फंसकर अपनी किडनी गंवा रहे हैं। 80 घरों के इस गांव में शायद ही कोई परिवार बचा हो, जिसके किसी सदस्य ने अपनी किडनी नहीं गंवाई हो। पहले तो किडनी बेचने का धंधा सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित था, मगर अब महिलाओं को इसके लिए लालच दिया जा रहा है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसे इस गांव में साल में एक बार मक्के की फसल दिखाई पड़ती है। वह भी वर्षा पर निर्भर है। अभाव की परिस्थितियों का लाभ उठाकर गांव के ही एक बड़े किसान ने किडनी की दुकानदारी शुरू कर दी। वह ग्रामीणों को किडनी के एवज में तीन-चार लाख रुपये दिलाने का झांसा देकर बाहर ले जाता है। इतनी रकम पाने का सपना देखकर ग्रामीण अपना जीवन दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें होश तब आता है, जब उनका सबकुछ लुट चुका होता है। किडनी निकाल लेने के बाद वादे के मुताबिक राशि नहीं दी जाती। किडनी गंवाने वाला व्यक्ति भी डर के कारण पुलिस के पास जाने से कतराता है। इस संबंध में पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मीडिया के सामने कुछ भी कहने से इंकार करते हैं।
यूपी के 85 स्कूलों में पानी 2000 में टॉयलेट नहीं
उत्तर प्रदेश में अभी भी 85 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में पीने के पानी और 2024 स्कूलों में टॉयलेट की सुविधा नहीं है। स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं के बारे में राज्य सरकार की ओर से दिए गए हलफनामे में यह तथ्य उजागर हुआ है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्यों को स्कूलों में पेय जल और टॉयलेट सुविधा सुनिश्चित करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक जिन स्कूलों में टॉयलेट नहीं हैं वहां माता-पिता अपने बच्चों, विशेषकर लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते। ये शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्यों को स्कूलों में ये सुविधाएं उपलब्ध कराने के बारे में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने हलफनामा में कहा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी और निजी कुल मिलाकर 21,482 माध्यमिक स्कूल हैं। इन सभी स्कूलों में पीने का पानी तथा टायलेट की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा राज्य में 1,46,959 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। इनमें से 1,46,874 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा है, लेकिन 85 स्कूलों में अभी भी यह सुविधा नहीं है। यहां पीने के पानी का स्थायी इंतजाम नहीं हो पाया। क्योंकि कुछ जगह बोरिंग के बाद भी पानी नहीं निकला जबकि कुछ जगहों पर इसके दूसरे कारण थे। इन 85 स्कूलों में से 55 स्कूल गांवों में हैं और 30 स्कूल शहरी क्षेत्र में आते हैं। हालांकि इनमें अस्थायी तौर पर पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। मुख्य सचिव ने कहा है कि राज्य सरकार स्कूलों में टायलेट सुविधा की उपलब्धता पर भी ध्यान दे रही है। जिलाधिकारियों से इस बाबत रिपोर्ट मांगी गई थी। जिसके जवाब में मिले आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 1,46,959 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में से 2024 विद्यालयों में टॉयलेट की सुविधा नहीं है। राज्य सरकार ने कहा है कि शहरी क्षेत्र के टॉयलेट रहित स्कूलों में टॉयलेट बनवाने के लिए फंड का प्रस्ताव केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को भेजा गया है।
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