बेशक दिल्ली सरकार के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 76 हजार रुपये सालाना (लगभग 482 रुपये रोजाना) है, लेकिन इस गुलाबी तस्वीर के पीछे की सच्चाई यह है कि हर सप्ताह एक व्यक्तिदेश की राजधानी में भूख या गरीबी से दम तोड़ रहा है। दिल्ली को अंतरराष्ट्रीय शहर बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस की राज्य सरकार के 14 साल के शासन काल में 737 लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल काल का ग्रास बन चुके हैं। यह खुलासा हुआ है, सूचना के अधिकार कानून (आरटीआइ) के तहत मिले एक जवाब से। सीलमपुर निवासी नैयर आलम ने दिल्ली पुलिस से पूछा था कि 1999 से लेकर अब तक कितने लोगों ने भूख से तंग होकर आत्महत्या की या भूख के कारण उनकी मौत हुई। आलम ने इसी तरह गरीबी के कारण आत्महत्या या मौत के आंकड़े भी पुलिस से मांगे। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों से ये आंकड़े मंगाए और पिछले महीने जून में आलम को जो जवाब मिला तो वह चौंकाने वाला था। पिछले साल वर्ष 2011 में दिल्ली में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या 62 थी। इसमें से 15 लोगों ने भूख और 47 लोगों ने गरीबी के कारण दम तोड़ा। वर्ष 2012 में मार्च तक मरने वालों की संख्या 11 है। इस तरह वर्ष 2010 में भूख से 18 और गरीबी से 40 लोगों ने दम तोड़ा। दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के कारण दिल्ली पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई थी और राज्य व केंद्र सरकार दिल्ली में हुए विकास का जमकर ढिंढोरा पीट रही थी, लेकिन इस साल भूख और गरीबी से हुई मौतों के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। इससे पहले वर्ष 2009 में भी भूख और गरीबी से 60 लोग मारे गए थे। हालांकि वर्ष 2008 में यह आंकड़ा कुछ कम था और मरने वालों की संख्या 39 रिकार्ड की गई। वर्ष 2005 और 2002 में सबसे अधिक 72 मौतें हुई, जबकि वर्ष 2001 में सबसे कम 37 लोगों की मौत हुई। पुलिस के आंकड़े संदेहास्पद : हालांकि नैयर आलम को उपलब्ध कराए गए पुलिस के आंकड़े भी पूरा सच नहीं हैं। उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक इन 15 वर्षो में अकेले पश्चिमी जिले में 689 मौतें गरीबी और भूख से हुई, जबकि बाहरी जिले में 40 मौतें। उत्तरी जिले में दो और पूर्वी जिले में चार मौतें हुई। अन्य जिलों के पुलिस अधिकारियों ने अपने जिले में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या शून्य बताई है।
Thursday, July 12, 2012
Tuesday, July 10, 2012
बुजुर्गों की बहतरी का सवाल
हाल में हेल्पेज इडिया ने बुजुर्गो के प्रति व्यवहार पर अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। हेल्पेज इंडिया देश में बुजुर्गो के लिए काम करने वाली एक प्रतिष्ठित संस्था है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में राजधानी में बुजुर्गो के अपमान के मामले में 12 फीसद की बढ़ोतरी आंकी गई है। इस वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि 29.82 प्रतिशत बुजुर्ग राजधानी में किसी न किसी प्रकार से परेशान किए गए हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में परिवार के लोगों के खिलाफ ही शिकायतें अधिक पाई गई हैं। देश के प्रमुख 20 शहरों में 5,600 बुजुर्गो से 20 प्रकार के प्रश्नों के माध्यम से यह सर्वेक्षण कराया गया। 75 फीसद बुजुर्गो ने कहा कि यह अपमान उन्हें अपनों से मिला है। इसलिए वे अपनों के साथ रहने के बजाय अकेले रहना अधिक पसंद करते हैं। ध्यान देने लायक यह तथ्य है कि हमेशा यह समझा जाता है कि बुजुर्ग अपनी संतानों के साथ रहना चाहते होंगे, लेकिन वे अकेले भी रहना चाहते हैं। यदि संतानों का अपना परिवार उनके साथ ही जमे रह गया तो अकेले अपने भरोसे रहने की ख्वाहिश माता-पिता से छिनती भी है। हालांकि इस पर कोई एक राय बनाना उचित नहीं हो सकता है। कोई तरीका किसी एक के लिए अनुकूल होगा तो हो सकता है, वही तरीका दूसरे के लिए प्रतिकूल साबित हो। इसलिए यह मुद्दा व्यक्तियों की जरूरतों और इच्छा के आधार पर ही निकाला जा सकता है। बुजुर्गो के सम्मानजनक जीवन जीने के रास्ते में सबसे अहम चीज है कि उनके पास अपने हाथ में अपना पैसा भी हो। कई बार पाया गया है कि परिवार में पैसा और संपत्ति है, लेकिन बुजुर्ग को खर्च करने का अधिकार नहीं है। यह अपना पैसा सबसे ठीक रूप में अपनी पेंशन ही हो सकती है। हालांकि यह नहीं माना जा सकता है कि मात्र पेंशन का इंतजाम ही पूरा समाधान है, लेकिन यह सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है। हमारे देश में बड़ी संख्या ऐसे बुजुर्गो की है, जो किसी प्रकार की सरकारी नौकरी में नहीं रहे हैं, जिसमें पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था अब तक चली आ रही है। वैसे विगत कुछ सालों से इसके नियम बदले गए हैं। खेती-बारी, अन्य व्यवसाय या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का बुढ़ापा पेंशनविहीन होता है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गरीब समुदाय के लोगों को जो वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, उसमें रोटी-नमक भी नहीं पूरा हो सकता तो बुढ़ापे का दवा-इलाज कहां संभव होगा? दूसरा अहम मसला बनता है स्वयं लोगों द्वारा अपने बुढ़ापे की कारगर योजना खुद बनाने की। इस मसले पर हमारे समाज में लोग रामभरोसे ही रहते हैं। कुछ समय पहले कुछ बैंकों और बीमा कंपनियों के एक सर्वेक्षण में उजागर हुआ कि अब भी रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुके अधिकतर लोग अपने बुढ़ापे के बारे में कोई योजना नहीं बनाकर सिर्फ बच्चों के साथ रहने के बारे में सोचकर निश्चिंत रहते हैं। लोग संतानों पर मानसिक रूप से इतने निर्भर रहते हैं कि वह निर्भरता बोध भी एक समय बाद मानसिक असुरक्षा बोध का कारण बन जाता है। सिर्फ संतानों को ही एकमात्र आधार मानने से उनका क्या होगा, जिनकी कोई संतान न हो या हो भी तो दूसरे शहर या देश में उसे अपनी नौकरी आदि के कारण रहना पड़ता हो। उन शहरों या देशों का परिवेश जरूरी नहीं कि बुजुर्गो को रास आए। यानी ऐसे उपाय भी तलाशने ही चाहिए, जो सिर्फ बच्चों को केंद्र में रखकर न बनाया गया हो। किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ लोगों को शर्मसार करके नहीं निकाला जा सकता है, जैसे कि बच्चों से उम्मीद की जाए कि वे स्वार्थी न बनें और अपने बुजुर्गो का खयाल करें। वे निश्चित मानवीय, संवेदनशील और जिम्मेदार भी बनें, लेकिन इसी के साथ भविष्य के हर बुजुर्ग के पास कुछ अन्य समाधान भी हों, जो वे स्वयं और सरकारें मिलकर निकालें। जापान के प्रधानमंत्री योशिहिको नोडा ने देश में बुजुर्गो की बढ़ती तादाद की जिम्मेदारी सरकार उठा सके, इसलिए युवाओं को योगदान करने के लिए आह्वान किया है ताकि सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ते खर्च को पूरा किया जा सके। इसके लिए युवाओं पर टैक्स का बोझ बढ़ाया जाएगा। कहा गया है कि जो लोग काम करने की उम्र में पहुंच रहे हैं, उनके लिए आने वाले दो दशक कठिन होंगे। उनकी आय उनके अभिभावकों से कम होगी, उन्हें पेंशन के लिए अधिक अंशदान देना होगा और सेवानिवृत्ति के बाद कम धन मिलेगा तथा बहुत कम सामाजिक सेवाएं प्राप्त हो पाएंगी। अर्थशास्ति्रयों एवं अधिकारियों का कहना है कि यदि सरकार ने कड़ाई से फैसले को लागू किया तो जापान की स्थिति संभल जाएगी। जापान में बच्चे और युवाओं की तुलना में बुजुर्गो की बढ़ती संख्या ने वहां के समाज और सरकार को चिंतित कर दिया है। 1965 तक 9.1 कार्यरत कर्मचारी पर 1 रिटायर कर्मचारी था, वहीं 2050 तक 5 कार्यरत कर्मचारी पर दो रिटायर यानी 65 से अधिक उम्र वाला होगा। अनुमान के मुताबिक भारत में भी 2050 तक 50 साल से अधिक उम्र वाले आज के मुकाबले दोगुने हो जाएंगे। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में सभी के लिए पेंशन के नारे के साथ जो पांच दिवसीय धरने का आयोजन किया गया, उसका बुनियादी सरोकार यही था कि साठ साल से ऊपर हर व्यक्ति को औसतन दो हजार रुपये पेंशन मिलनी चाहिए। प्रो. प्रभात पटनायक ने सर्वव्यापी वृद्धावस्था पेंशन योजना पर केंद्रित अपने आलेख में आर्थिक संसाधनों की बात की है। उनके मुताबिक भारत में 60 वर्ष से ऊपर कम से कम आठ करोड़ लोगों को अगर ऐसी पेंशन का इंतजाम किया गया तो सरकार को 1 लाख 92 हजार करोड़ रुपये की राशि का इंतजाम करना पड़ेगा। उनके मुताबिक अगर सरकार कारोबारी घरानों को करीब पांच लाख करोड़ की कर राहत देती है तो क्या वह उससे भी आधी रकम का इंतजाम बुजुर्गो को सम्माननीय जीवन प्रदान करने के लिए नहीं कर सकती है। हमारे यहां अप्रत्यक्ष कर जो खरीदी जाने वाली हर वस्तु पर खरीददार से लिए जाते हैं, जो अमीर-गरीब सभी समान रूप से देते हैं, उसकी वसूली तो हो जाती है, लेकिन प्रत्यक्ष कर जिनसे अधिक लिया जाना चाहिए यानी अमीर तबका, वह तीन-तिकड़म से काफी हद तक बच निकलता है। टैक्स की वसूली ठीक से नहीं हो पाना और मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा भी अपना टैक्स चुरा लेने में माहिर है। सरकार को भी पता है कि कारपोरेट घराने अपनी जिम्म्ेादारी पूरी नहीं कर रहा है। ऐसे में पहले सरकार को अपनी नीतियां दुरुस्त करनी होंगी तथा मौजूदा व्यवस्था में भी सामाजिक सुरक्षा की गारंटी कर युवाओं को अधिकाधिक योगदान के लिए पे्ररित करना होगा। दूसरी बात पेंशनधारी भी जब तक समाज में अपनी मेहनत का योगदान कर सकते हैं, कुछ काम कर सकते हैं, तब तक उन्हें भी ऐसा कर पाने के लिए अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, June 30, 2012
कम उम्र में गर्भ से किशोरियों की मौत
किशोरियों का कम उम्र में गर्भधारण करना ही उनकी मौत का सबसे बड़ा कारण है। सेव द चिल्ड्रेन नामक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है। इसमें कहा गया है कि प्रसव के समय संक्रमण या बीमारी हो जाने से हर साल दस लाख किशोरियों की मौत हो जाती है। इस समस्या का सबसे बड़ा कारण गर्भनिरोधकों से अनभिज्ञता बताया गया है। लाइबीरिया मेंएक-तिहाई नवजात शिशुओं की मांओं की उम्र 15 से 19 वर्ष के बीच होती है। संस्था के प्रोजक्ट मैनेजरर जॉर्ज किजाना के अनुसार, कम उम्र में मां बनने से इन लड़कियों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि शारीरिक तौर पर बच्चे को जन्म देने में अक्षम होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में 40 प्रतिशत जन्म गैर-इरादतन होता है। किशोरियों को परिवार नियोजन की सुविधा उपलब्ध ही नहीं हो पाती है। बड़ी आबादी वाले देशों खास तौर पर दक्षिण एशिया में ऐसा देखने को मिलता है। भारत में 15 से 19 वर्ष की 47 प्रतिशत लड़कियां सामान्य वजन से कम हैं। जबकि 56 प्रतिशत लड़कियां रक्त की कमी से पीडि़त हैं। भारत में 2008 में हुए एक सर्वेक्षण में 15 से 24 साल के बीच उम्र के बीच की लड़कियों में आधी से ज्यादा ने कहा कि उन्हें कभी भी यौन शिक्षा नहीं मिली। जहां 30 प्रतिशत ने कंडोम के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई वहीं 77 प्रतिशत ने कहा कि उनसे कभी किसी ने गर्भनिरोधक के बारे में बात नहीं की। भारत में 15 से 19 साल केबीच शादी होने वालों की संख्या 30 प्रतिशत है। इस उम्र में शादी करने वाले लड़कों की संख्या केवल पांच प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के कई कार्यक्रम कभी पैसे की कमी तो कभी धार्मिक कारणों से सफल नहीं हो पाएं हैं।
दहेज उत्पीड़न की बढ़ती समस्या
भारत में दहेज लेने व देने के खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं, फिर भी दहेज की मांग और दहेज हत्याएं नहीं रुक रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि दोषी सलाखों से बच रहे हैं। दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ की मानें तो अधिकतर परिवारों की प्रवृत्ति ही ऐसी है जिसमें वह अपनी बेटियों को जुल्म सहने देते हैं और उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते हैं। इस प्रवृत्ति के चलते दहेज के अदालती मामले कमजोर पड़ जाते हैं और कानून दोषियों को सजा नहीं दे पाता। अदालत के इस नजरिये से शायद ही कोई असहमत होगा। इस संदर्भ में एक उदाहरण काफी उपयोगी है। दिल्ली की रहने वाली सीमा का विवाह फरवरी 2006 में हुआ और शादी बाद से ही न सिर्फ उससे अधिक दहेज की मांग की जाने लगी, बल्कि उस पर अत्याचार भी शुरू कर दिए गए। तंग आकर एक दिन वह अपने मायके लौट आई, लेकिन 16 मई, 2006 को सीमा की मां व उसके भाई उसे जबरन ससुराल छोड़ आए। उसके पति व सास-सुसर से यह कहते हुए कि वह उनकी दहेज की मांगों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन ससुराल में सीमा के लिए कोई जगह नहीं थी। कम दहेज लाने वाली बहू का ससुराल में वैसे भी सम्मान कम होता है। सीमा दोबारा अपने मायके लौट आई, लेकिन उस पर मानसिक दबाव इतना अधिक था कि उसने जून 2006 में आत्महत्या का प्रयास किया। वह बुरी तरह जल चुकी थी जब उसके माता-पिता उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। उसके माता-पिता ने आरोप लगाया कि सीमा ने आत्महत्या इसलिए की, क्योंकि दहेज की मांग को लेकर उसके ससुराल वाले उसे मानसिक व शारीरिक यातनाएं दे रहे थे। पर सवाल है कि सीमा की आत्महत्या के लिए कौन दोषी है? उसके ससुराल वाले जो दहेज के लालच में उसे मानसिक व शारीरिक कष्ट पहंुचा रहे थे या उसके माता-पिता जो यातनाएं भुगत रही अपनी बेटी के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हुए अथवा दोनों ही पक्ष दोषी हैं। वास्तव में इसके लिए हमारा समाज भी दोषी है जो दहेज पर विराम लगाने के लिए सकारात्मक प्रयास नहीं करता। इस मामले में सीमा के पति व सास-ससुर को हत्या के आरोप से मुक्त करते हुए दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने पीडि़त स्कूल टीचर सीमा के माता-पिता को दोषी ठहराया, क्योंकि उन्होंने समय रहते यानी जब सीमा जीवित थी तो दहेज उत्पीड़न का मामला न तो पुलिस में दर्ज कराया और न ही अपने रिश्तेदारों व दोस्तों को इस बारे में कुछ बताया। इस कारण आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे जिससे अदालत को उन्हें मजबूरन बरी करना पड़ा। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि दहेज के मामलों, महिला उत्पीड़न व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान करने के लिए तमाम कानून भले ही बना लिए गए हैं, लेकिन बावजूद इसके जमीनी सच्चाई में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। शायद इसी कारण न्यायाधीश कामिनी लॉ ने कहा कि पीडि़तों व उनके परिवारों को यह समझना आवश्यक है कि जब तक दहेज की मांग व उत्पीड़न को समय रहते रिपोर्ट नहीं किया जाएगा और लड़की के परिवार वाले उसके समर्थन में खड़े नहीं होंगे तब तक अदालतें व अन्य एजेंसियां पीडि़तों के लिए कुछ विशेष नहीं कर पाएंगी। दरअसल इस बात को समझने की आवश्यकता है कि ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट न करने से महत्वपूर्ण साक्ष्य खत्म हो जाते हैं जिस कारण दोषी भी अक्सर बच जाते हैं। न्यायाध्ीश कामिनी लॉ के अनुसार सीमा के मामले में सबूतों का नितांत अभाव था। अगर उत्पीड़न हो रहा था या दहेज की मांग थी तो रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई गई और इस मुद्दे पर दोस्तों व रिश्तेदारों से चर्चा क्यों नहीं की गई? अगर पीडि़त को गर्म चिमटे आदि से यातनाएं दी गई थीं तो मायके पक्ष ने तुरंत मेडिकल जांच क्यों नहीं कराई और उसे इस उत्पीड़न के बावजूद आरोपी परिवार के साथ रहने के लिए क्यों मजबूर किया? जब उसकी मृत्यु हो गई तो उसके परिवार के सदस्यों ने पहली ही मुलाकात में एसडीएम व जांच अधिकारी को उत्पीड़न और यातना की घटनाओं के बारे में उस तरह से क्यों नहीं बताया जैसा अब अदालत को बताया जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई अन्य कारण रहे हों जिस वजह से महिला ने आत्महत्या की। संभव है कि सीमा के माता-पिता ने यातना, उत्पीड़न और दहेज की मांग के जो आरोप लगाए हैं वह सब सही हों और वह विश्वाास करने के लायक भी हों, लेकिन क्या ऐसी स्थिति में बेसहारा युवती को ऐसे दरिंदों के पास बेबस छोड़ना चाहिए था जो उनकी बेटी पर अत्याचार कर रहे थे? ऐसा करना अपने आपमें अनुचित, अस्वीकार्य और अपराध है। न्यायाधीश कामिनी लॉ के मुताबिक कोई भी शिक्षित व संपन्न परिवार अपनी बेटी को जबरन मजबूर नहीं कर सकता कि वह ऐसे पति व सास-ससुर के साथ रहे जो उस पर अत्याचार करते हों। सीमा एक शिक्षित व रोजगार में लगी महिला थी। वह बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी गुजार सकती थी। फिर भी वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुई तो इसका दोषी कौन है? दरअसल, यह समाज की वह मानसिकता है जो महिला को दूसरे घर का समझते हैं और यह धारणा बनाए हुए हंै कि लड़की डोली में ससुराल जाए और वहां से अर्थी पर बाहर निकले। क्या लड़की के जीवन का एकमात्र मकसद किसी से ब्याह करके उसके परिवार की सेवा करना ही है। क्या वह व्यक्तिगत तौर पर आजाद इंसान नहीं है, जिसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं और सपने हैं। क्या विवाह के बाद लड़की का अपने मायके पर कोई अधिकार नहीं रहता है? जब तक इस किस्म के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तब तक दहेज के लिए उत्पीड़न व हत्याओं को रोक पाना संभव नहीं है। इसलिए न्यायाधीश कामिनी लॉ ने प्रश्न किया कि हमारे समाज में ऐसा क्यों है कि एक महिला की खुशी व उसके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण इस बात को समझा जाता है कि संबंध चाहे कितने भी खराब हो जाएं उसे तोड़ा नहीं जाना चाहिए। जब एक महिला का ब्याह हो जाता है तो जिस परिवार में वह पैदा हुई, जहां उसका पालन-पोषण हुआ वही उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं होते है, लेकिन जब वह मर जाती है तो अनेक किस्म की शिकायतें करने लगते हैं। दरअसल, जब तक घोड़ी चढ़कर बारातें लड़कियों के घर जाती रहेंगी तब तक दहेज की मांग पर विराम नहीं लगेगा और न ही विवाहित महिलाओं का उत्पीड़न खत्म होगा। महिलाओं को बराबरी का अधिकार व सम्मान उसी सूरत में मिल सकता है जब उनका अपने घर में उसी तरह से पालन-पोषण हो, जिस तरह से लड़कों का किया जाता है। वह ब्याह होकर अपनी ससुराल जाने की बजाय अपने घर जाएं, वह घर जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से विकसित किया हो। कहने का अर्थ यही है कि घर बनाने में पति व पत्नी का जब तक बराबर का योगदान नहीं होगा तब तक किसी लड़की न तो वास्तविक हक मिलेगा और न ही सही न्याय हो पाएगा, फिर बात चाहे मायके की हो, ससुराल की हो अथवा अदालत की। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, June 1, 2012
गुमशुदा संवेदना
हम लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में रह रहे हैं, लेकिन जो घटनाएं घट रही हैं उनसे तो कभी-कभी यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या लोकतंत्र के पावन मंदिर में बैठे हुए सांसद संवेदना शून्य हो गए हैं। जिस संसद में एक नेता विशेष के कार्टून को लेकर हंगामा हो गया और राष्ट्र के करोड़ों रुपये खर्च करके यह विचार होता रहा कि जिन्होंने कार्टून बनाया उन्हें क्या दंड दिया जाए और भविष्य में कार्टून बनाने की आज्ञा दी जाए अथवा नहीं तथा जिन किताबों में कार्टून बने हैं उन्हें शिक्षालयों से वापस ले लिया जाए अथवा पढ़ाने दिया जाए, उसी संसद के समक्ष कुछ दिन पूर्व भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने यह दुखद रिपोर्ट भी रखी थी कि भारत में सन 2009 से लेकर 2011 के बीच 1 लाख 77 हजार 660 बच्चे लापता हुए और इनमें से अभी तक 55 हजार 470 बच्चों का कोई सुराग नहीं मिला। लापता बच्चों में 60 प्रतिशत लड़कियां हैं। ध्यान रहे कि अभी पंजाब और जम्मू-कश्मीर सरकार ने गुमशुदा बच्चों की संख्या नहीं बताई है। आज का सच यह है कि पूरे देश में रोजाना करीब 162 बच्चे लापता होते हैं। कटु सत्य यह भी है कि गायब हुए बच्चों में से अधिकतर गरीबों के बच्चे हैं। कौन नहीं जानता के देह व्यापार के धंधे में जो लड़कियां धकेली जाती हैं और जीवन भर नारकीय यातना तथा समाज का तिरस्कार सहती हैं, उनमें अधिकांश यही बच्चियां हैं, जिन्हें उठाया, बेचा जाता है और जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। हर चौक-चौराहे पर भिक्षा मांगते बच्चे मिलते हैं, कुछ कारों के शीशे चमकाने के बाद हाथ फैलाते हैं। इनमें कुछ विकलांग होते हैं। इन्हें देखते ही बहुत से लोगों का पर्स खुलता है और उनका हाथ कार के बाहर जाकर इन बच्चों पर रहम करके धन्य हो जाता है। अपने ही देश में मानव अंगों का व्यापार और दूसरे देशों में तस्करी भी जोर-शोर से हो रही है। सैकड़ों बच्चे मैं भी देखती हूं, आप भी देखते हैं, शायद सरकारी नहीं देखतीं। पूरे देश में बाल कल्याण मंत्रालय हैं, बाल संरक्षक आयोग हैं, बाल कल्याण समितियां हैं और केंद्र में मंत्री और आयोग हैं, पर उनकी किताब में इन बच्चों के लिए कोई स्थान नहीं। इन बच्चों को ढूंढ़ लेना, उन्हें माता-पिता के पास पहुंचा देना अथवा सरकार एवं समाजसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों में उनका पालन-पोषण कर देना कोई कठिन काम नहीं, केवल हृदय चाहिए, जो संवेदनापूर्ण हो। क्या भारत का गृह मंत्रालय यह बताएगा कि देश के किस-किस प्रांत में इन लापता बच्चों को खोजने और उनको बसाने के लिए कोई अलग विभाग है? पुलिस का कोई विंग लापता बच्चों के लिए विशेष रूप में बनाया गया है? क्या किसी महिला आयोग ने वेश्यालयों में जाकर उन महिलाओं की पीड़ा सुनी है, उनके माता-पिता के बारे में जानकारी ली है? मैंने स्वयं हैदराबाद में एक समाजसेवी महिला की छाया में बचाई हुई उन सैकड़ों लड़कियों को देखा है जो अब देह व्यापार के नर्क से निकलकर समाज की मुख्यधारा में आ गई हैं और दूसरों को भी रास्ता दिखा रही हैं। क्या यही काम भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों के मंत्री और अधिकारी नहीं कर सकते? गृह मंत्रालय केवल इतनी ही जानकारी दे दे कि देश के केंद्रीय आयोगों समेत कितने प्रांतों में महिला और बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष राजनेता नहीं अपितु सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कौन नहीं जानता कि इन आयोगों की अध्यक्षता राजनीतिक तुष्टिकरण और रिश्तेदारियां निभाने के लिए की जाती हैं। क्या भारत सरकार एक शपथ पत्र जारी करेगी कि इन आयोगों में केवल देश और देशवासियों का दर्द दिल में लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों को ही महिला और बाल कल्याण का काम सौंपा गया है? अभी तो मेरा सवाल देश के सांसदों से है कि इस रिपोर्ट को वे कैसे कॉफी और चाय के साथ पी गए और पचा गए? (लेखिका पंजाब की पूर्व मंत्री हैं) लापता बच्चों की बढ़ती संख्या पर चिंता जता रही हैं लक्ष्मीकांता चावला
Monday, May 28, 2012
बाल संरक्षण गृहों की नारकीय स्थिति
अपने मुल्क में सरकारी व गैर सरकारी बाल संरक्षण गृहों में बाल अधिकारों के प्रति असंवेदनशील भूमिका और वहां शरण लेने वाले बच्चों के प्रति संचालन समितियों का गैर जिम्मेदराना नजरिया बहुत ही चिंताजनक सवाल है। सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि यह बड़ा सवाल जब किसी हादसे के बाद सामने आता है तो सरकार जो फौरी कार्रवाई करती है, उसका असर तात्कालिक होता है लेकिन समय बीतने के साथ ही संबंधित सरकारी दिशा-निर्देश अपना असर खो बैठते हैं। ऐसे सरकारी और गैर-सरकारी संरक्षण गृहों में सरकारी दिशा निर्देशों के पालन में उदासीनता क्यों बरती जाती है, यह जानना बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की हाल में आयोजित एक बैठक में आयोग के सदस्यों ने कहा कि कई स्वयंसेवी संस्थाओं को निजी घरानों से बाल संरक्षण गृह चलाने के लिए भारी-भरकम राशि मिल जाती है, जिसके कारण वे सरकारी मदद के मोहताज नहीं होते मगर इसका मतलब यह नहीं है कि निजी गृहों में बाल अधिकारों को लेकर किसी तरह की नरमी की गुंजाइश है। इसके बावजूद कोताही की स्थिति में सख्त एक्शन की दरकार है। ‘मैं एक साल से रोहतक के ‘अपना घर’ नामक एनजीओ में रह रही थी। संचालक मैडम काम के बहाने मुझे दिल्ली स्थित जीबी रोड ले जाती और पैसे लेकर मेरा यौन शोषण कराती थी। विरोध करने पर वह धमकी देती थी कि किसी को बताया तो जान से मार दूंगी। संस्था से भागकर मामले का खुलासा करने वाली तीन अन्य लड़कियों का भी उक्त संचालक ने यौन शोषण कराया है।’ एक पीड़ित लड़की ने पुलिस को दिए उक्त बयान में अपनी व अन्य लड़कियों की उस पीड़ा व सच्चाई को सामने रखा है, जिससे सरकार व समाज दोनों ही परिचित हैं। कारण, ऐसी खबरें अक्सर मीडिया के जरिए हम तक पहुंचती रहती हैं। ऐसे ही हाल में हरियाणा के ही गुड़गांव जिले के वजीराबाद गांव में ‘ सुपर्णा का आंगन’ नामक एनजीओ में रहने वाली 10-12 वर्ष की पांच बच्चियों ने वहां के केयरटेकर पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। मेडिकल जांच में दो बच्चियों से तो दुष्कर्म की पुष्टि हुई और बाकी तीन के सैंपल जांच के लिए भेजे गये। ‘अपना घर’ में युवतियों के यौन शोषण का मामला ही सामने नहीं आया बल्कि यहां रहने वाली कई लड़कियों को शादियों में नाच गाने के लिए भेजे जाने के बावत भी पुलिस को पता चला। पुलिस ने रोहतक की सीजीएम अदालत को बताया कि 15 से 18 साल की छह लड़कियों ने जांच में खुलासा किया कि संचालक उन्हें कई बार शादी समारोहों में नाच-गाने के लिए लेकर गई और पुलिस पूछताछ के बाद खुद संचालक ने यह स्वीकार किया। बेशक अपना घर की संचालक ने अपने बचाव में यह दलील दी कि वह लड़कियों को इसलिए ले गई थी, ताकि वे ऐसे माहौल में खुश रहें मगर ऐसा होता तो वह अपने साथ मंदबुद्धि या कम उम्र के बच्चों को भी साथ लेकर जाती। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार की वित्तीय बजट से चल रही अपना घर नामक संस्था को सरकार की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है। करीब डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के राजकीय शिशु सदन में तीन मासूम अनाथ बच्चियों के साथ बलात्कार वाली खबर ने राज्य सरकार पर निशाना साधा था। यहां भी महफूज नहीं बेटियां, यह कड़वी हकीकत बार-बार सरकार को अगाह करती है कि सरकारी साए में जो खामियां हैं, उन्हें फौरन दूर कर वहां शरण लेने वालों को और समाज को भरोसा दिलाया जाए कि वे यहां सुरक्षित हैं। इलाहाबाद वाली घटना का तब पता चला जब एक छह साल की लड़की ने बाल सुधार गृह की गतिविधियों के बारे में उस दंपती को बताया, जिसने इस बच्ची को गोद लिया है। बलात्कार का आरोप सदन के ही चपरासी विद्याभूषण ओझा पर लगाया गया है। चिकित्सा जांच से तीन बच्चियों के साथ हुए यौन दुष्कर्म की पुष्टि के बाद दुराचार के आरोपी ने भी कबूल किया कि वह काफी समय से ऐसी घिनौनी हरकत करता रहा है। जब और बच्चियां दूसरे कामों में मशगूल होतीं तो वह किसी एक बच्ची को टॉफी दिखाकर किचन में ले जाता था। ‘पूरी तरह से स्तब्ध’ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए एक दिशानिर्दे श जारी किया है, ताकि समाज में ऐसा कड़ा संदेश जाए, जिससे फिर कोई ऐसी हरकत करने की जुर्रत न करे और आदेश दिया कि इसे आपराधिक जनहित याचिका के रूप में माना जाए। जिला प्रशासन ने आरोपी विद्याभूषण को जहां नौकरी से बर्खास्त कर दिया वहीं बाल सुधार गृह की अधीक्षक उर्मिला गुप्ता को लापरवाही बरतने के एवज में निलंबित कर दिया। जनता को फौरी तौर पर संतुष्ट करने के लिए सरकार द्वारा ऐसे कदम उठाने में जो सक्रियता बरती जाती है, वह अंतत: सरकार के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं। हालांकि राज्य सरकारें इस तरह के मामलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने में अपनी विफलता उजागर न होने देने के मकसद से बर्खास्त या निलंबन का ढोंग करने से बाज नहीं आतीं। यूं तो अपने देश में बाल अधिकारों के उल्लघंन पर कड़ी निगरानी रखने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग का गठन किया गया है और इस आयोग ने रोहतक प्रकरण के बाद भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए राज्य सरकार को सख्त निर्देश भी दिए हैं। आयोग की अध्यक्ष प्रो. शांता सिन्हा का कहना है कि अधिकारियों का जोर इस तरह के मामलों को प्रभावी ढंग से रोकने और बाल संरक्षण गृहों के नियमों के तहत कुशल संचालन पर होना चाहिए। पर सवाल है कि ऐसे मामलों को गंभीरतम उल्लंघन की श्रेणी में शमिल किया जाए और कठोर कार्रवाई होती दिखाई दे। मामला देश के किसी भी सूबे का हो, उसके खिलाफ की गई कार्रवाई का संदेश दूसरे सूबों में भी जाए। बाल संरक्षण गृह सरकारी हों या गैर सरकारी- शिुशओं व लड़कियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का सम्मान करना उनका प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। इस समझ को सरकारी व गैर सरकारी अधिकारियों के बीच विकसित करना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
Monday, April 23, 2012
नशे की गिरफ्त में बच्चे
नशा मुक्ति के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों और युवाओं में मादक पदार्थो की लत बढ़ना चिंता की बात है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक में बच्चों द्वारा नशा करने के मामले सामने आ रहे हैं। बीते दिनों मानव व्यवहार विज्ञान संस्थान (इहबास) एवं मेडिकल साइंसेज विश्वविद्यालय ने दिल्ली स्कूल स्वास्थ्य योजना के तहत 24 निजी व 12 सरकारी स्कूलों के 11,234 बच्चों का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि 12 प्रतिशत बच्चे नशे की लत से जुड़े हैं। यह नशा सिगरेट या शराब का नहीं है। यह बच्चे नई तरह का नशा सूंघ कर ले रहे थे। विभिन्न शोधों से भी यही निष्कर्ष सामने आया है कि निम्न वर्ग के ही नहीं, बल्कि मध्यम एवं उच्च वर्ग के बच्चे इरेजर फ्लुइड, ग्लू, दर्द निवारक मलहम, पेंटथिनर, नेलपॉलिश रिमूवर जैसे नशे के आदी हैं। इसके अलावा पांच से आठ प्रतिशत युवा एम फेटेमाइन टाइप ऑफ स्टीमुलेट्स (एटीएस) का शिकार हैं और उनकी यह तादाद दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी वर्ष 2009 की रिपोर्ट बताती है कि देश में पहली बार नशा करने वालों की उम्र महज 10 से 11 वर्ष होती है और नशा करने वाले 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थियों को यह पता होता है कि वे कौन सा मादक पदार्थ ले रहे हैं। सच तो यह है कि देश की भावी पीढ़ी को नशा पूरी तरह खोखला करता जा रहा है। नशे की गिरफ्त में संभ्रांत परिवारों से लेकर निचले तबके के परिवारों के बच्चे शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और सयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से देश में पिछले दशक में कराए गए सर्वे से भी खतरनाक होती स्थिति का पता चलता है। रिपोर्ट के मुताबिक नौंवीं कक्षा में आने से पहले 50 प्रतिशत किशोर किसी एक नशे का कम से कम एक बार सेवन कर चुके होते हैं। प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों ये बच्चे नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं? बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं बिना यह जाने कि कि उनके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। वह हर नई चीज को आजमाने की कोशिश करते हैं और यही प्रवृत्ति उन्हें अनजाने में नशे की ओर धकेल देती है। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहंुचते बच्चों के लिए परिवार की बजाय अपने दोस्तों का साथ अच्छा लगने लगता है और उनके द्वारा किए गए कार्य को वह स्वयं करने में झिझकते नहीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण, बच्चों का भावनात्मक रूप से अकेला होना है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं और एकल परिवार में माता-पिता के पास ज्यादा समय होता नहीं। ऐसे में अकेलेपन में बच्चे खुद को एक ऐसी दुनिया में धकेल रहे हैं जहां वहां कुछ पलों के लिए ही सही, खुद को जीवन की सच्चाई से दूर कर लेते हैं। वहीं निर्धन बच्चे अपनी दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में, संघर्ष करते-करते जीवन के सुखों को नशे में ढूंढने की कोशिश करते हैं। परंपरागत नशे के विपरीत सूंघकर किए जाने वाले नशे की सहज उपलब्धता नन्हे बच्चों को आसानी से अपनी गिरफ्त में ले लेता है। शोध बताते हैं कूड़ा बीनने वाले बच्चों में 75 प्रतिशत ड्रग एडिक्ट होते हैं। सूंघकर किए जाने वाले नशे की गिरफ्त में निरंतर बच्चों की संख्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि लंबे समय तक अभिभावकों को इसके बारे में पता ही नहीं चलता, क्योंकि इन नशों का प्रभाव तुरंत दिखाई नई देता। चिकित्सकों का मानना है कि लंबे समय तक इसका सेवन करने से दिमाग की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है तथा कैंसर का खतरा रहता है। किशोर बच्चों की ये आदत युवा होते-होते खतरनाक नशीले पदार्थ के सेवन में परिवर्तित हो जाती है। नशे की ओर बढ़ते इन बच्चों के कदमों को रोकने के लिए जरूरी है कि उन्हें स्नेह दिया जाए। यह हर अभिभावक का दायित्व बनता है कि किशोरावस्था की ओर बढ़ते अपने बच्चों के वह मित्र बनें और उनकी हर खुशी एवं परेशानी में उनके साथ रहें। भावनात्मक संबलता ही नशे की गिरफ्त में फंसते बच्चों को रोकने का उपाय है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) बच्चों में नशे की बढ़ती लत पर डॉ. ऋतु सारस्वत की टिप्पणी
Monday, April 9, 2012
बेतहाशा बढ़ेगी भारत की शहरी आबादी
संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया की जनसंख्या और शहरीकरण के रुझान पर शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद 2025 तक एक करोड़ से अधिक आबादी वाले शहर होंगे। दुनिया में ऐसे नगरों की संख्या 37 तक पहुंच जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले चार दशक में भारत और चीन की शहरी जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है। इससे इन देशों को अपने नागरिकों को रोजगार, ऊर्जा, घर और बुनियादी ढांचे मुहैया कराने की नई चुनौती से जूझना होगा। राजधानी दिल्ली तीन करोड़ 29 लाख की आबादी के साथ दुनिया में जापान की राजधानी टोक्यो (तीन करोड़ 87 लाख) के बाद सर्वाधिक आबादी वाला दूसरा शहर होगा। मुंबई दो करोड़ 66 लाख के साथ चौथे और कोलकाता एक करोड़ 87 लाख के साथ 12वें स्थान पर होगा। बेंगलुरू की आबादी एक करोड़ 32 लाख, चेन्नई की एक करोड़ 28 लाख और हैदराबाद की एक करोड़ 16 लाख हो जाएगी तथा दुनिया में उनका स्थान क्रमश: 23वां, 25वां और 31वां होगा। दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले प्रथम दस शहर होंगे- टोक्यो, दिल्ली, शंघाई, मुम्बई, मेक्सिको सिटी, न्यूयार्क, साओ पाउलो, ढाका, बीजिंग और कराची। संयुक्त राष्ट्र से जारी आंकड़ों में मुख्य नगरों की आबादी में उपनगरों के निवासियों को भी शामिल किया गया है। दुनिया में शहरों और गांवों में जनसंख्या के बदलते अनुपात के बारे में कहा गया है कि 2050 तक शहरी आबादी में 72 प्रतिशत की वृद्धि होगी तथा यह वर्तमान तीन अरब 60 करोड़ से बढ़कर छह अरब तीस करोड़ हो जाएगी। ग्रामीण आबादी 2050 तक करीब तीन अरब होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ‘वि शहरीकरण संभावना समीक्षा 2011’ में कहा गया है कि अगले चार दशक में नगरीय जनसंख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी अफ्रीका और एशिया में होगी। शहरी और ग्रामीण आबादी का अनुपात इस समय 52 और 48 प्रतिशत है जो 2050 तक 67 प्रतिशत और 33 प्रतिशत हो जाएगा। वर्ष 2011 से 2030 के बीच दुनिया में शहरी आबादी में एक अरब 40 करोड़ की वृद्धि होगी। जिसमें चीन में करीब 28 करोड़ और भारत में करीब 22 करोड़ की बढ़ोतरी होगी। वर्ष 2010 से लेकर 2050 तक भारत में 49.7 करोड़ और अधिक शहरी आबादी जुड़ जाएगी।
बोझ नहीं, जीवन का विस्तार बुढ़ापा
| इक्कीसवीं शताब्दी की एक विशेषता यह है कि इसमें लोगों की औसत आयु बढ़ गई है। साथ ही एक कालक्रम में आयु सीमा में हुए इस परिवर्तन से नयी पीढ़ी पर दबाव भी बढ़ गया है। भारत सहित दुनिया की जनसंख्या पर नजर डालें तो सन 2000 से 2050 तक पूरी दुनिया में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोगों की तादाद 11 फीसद से बढ़कर 22 फीसद तक पहुंच जाएगी। वि स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुमान के अनुसार वृद्ध लोगों की आबादी 605 मिलियन (60 करोड़ 50 लाख) से बढ़कर 2 बिलियन (2अरब) हो जाएगी। इन तथ्यों के आलोक में डब्लूएचओ ने इस वर्ष वि स्वास्थ्य दिवस की थीम ‘बुढ़ापा और स्वास्थ्य’ निर्धारित की है। इस मौके पर डब्लूएचओ के दक्षिण एशिया क्षेत्र के निदेशक डॉ. सामली प्लियाबांगचांग ने जारी अपने संदेश में कहा है कि, ‘बुढ़ापा या उम्र का बढ़ना एक जीवनपर्यन्त तथा अवश्यंभावी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बदलाव होता है। अब चूंकि एक बड़ी आबादी वृद्ध लोगों की है तो दुनिया भर में विभिन्न सरकारों और योजनाकारों को तदनुरूप योजनाएं और नीतियां बनानी चाहिए।’ डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन 2050 में 300 मिलियन (30 करोड़) यानी 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है। बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी हैं। जैसे 60 वर्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है। 80 वर्ष से ज्यादा की उम्र वाले वृद्ध सन 2050 तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे। अगले 5 वर्षो में ही 65 वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की तादाद पांच वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी। सन 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें। डब्लूएचओ की नई चिन्ताओं में दुनिया में बढ़ते वृद्धों की ज्यादा संख्या है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि बढ़ती उम्र, बुढ़ापा अथवा अधेड़ उम्र के ज्यादा लोगों की वजह से डब्लूएचओ परेशान है। दरअसल यह मुद्दा समय से पहले चेतने और समय रहते समुचित प्रबन्धन करने का है। संगठन की मौजूदा चिंता भी इसी की कड़ी है। वैीकरण के दौर में एक बात तो समान रूप से सर्वत्र देखी जा रही है कि अर्थ अथवा धन ने मानवीयता एवं संवेदना पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। धन और सम्पत्ति के सामने सम्बन्धों व मानवता की हैसियत घटती जा रही है। ऐसे संवेदनहीन होते जा रहे समाज में यदि अधेड़ उम्र के लोगों की तादाद ज्यादा होगी तो कई मानवीय दिक्कतें भी बढ़ेंगी इसलिए इनकी सामाजिक सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा वृद्धावस्था से जुड़े अन्य सभी पहलुओं पर सम्यक दृष्टि तो डालनी ही होगी। संगठन की मौजूदा चिन्ता भी यही है इसलिए इस वर्ष अपने स्थापना दिवस पर संगठन ने ‘बुढ़ापा एवं स्वास्थ्य’ की थीम पर स्लोगन दिया है- दीर्घ जीवन के लिये अच्छा स्वास्थ्य (गुड हेल्थ एड्स लाइफ टू इयर्स) स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि बुढ़ापे को देखें तो यह कई तरह से संवेदनशील उम्र है। इस दौरान यानी 50 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में कई तरह के क्रियात्मक परिवर्तन होते हैं। जैसे गुर्दे, जिगर, फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। दांत कमजोर होने लगते हैं, आंखों की रोशनी, सुनने की क्षमता, यौन क्षमता, याददाश्त आदि कमजोर होने लगते हैं। वृद्ध होते व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता भी कम होने लगती है। ऐसे में व्यक्ति तथा उसके परिजनों दोनों के लिए बुढ़ापा समस्या बन जाता है। ऐसे में बुढ़ापे से सम्बन्धित विभिन्न स्वास्थ्य एवं सामाजिक पहलुओं की विचेचना जरूरी है। डब्लूएचओ की मौजूदा चिन्ता में केवल विकासशील देश ही नहीं, विकसित देशों के वृद्ध भी शामिल हैं। दोनों देशों के वृद्धों की अपनी- अपनी समस्याएं हैं। विकसित देशों में जहां वृद्धों को आर्थिक दिक्कत अपेक्षाकृत कम है, वहीं विकासशील देशों में उनकी मुख्य समस्या आर्थिक ही है। सामाजिक सुरक्षा के अभाव में विकासशील अथवा गरीब देश के वृद्धों की स्थिति बहुत दर्दनाक है। संगठन ने दुनिया भर के देशों की सरकारों से अपील की है कि वे अपने- अपने क्षेत्र में ऐसी योजनाएं बनाएं ताकि वृद्धावस्था लोगों को जीवन बोझ न लगे। संगठन ने वृद्धावस्था व उससे जुड़ी समस्याओं से निबटने के लिए कुछ बिन्दु सुझाए हैं। इनमें समय रहते वृद्ध होते लोगों की सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा आदि के लिए बिन्दुवार नीतियां और कार्यपण्राली बनाने की जरूरत है। इस पहलू से जुड़ा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वृद्ध लोगों की कार्यकुशलता तथा अनुभव को उपयोग में लेने की नीति पर कई देश काम कर रहे हैं। भारत में भी वृद्ध लोगों के प्रति सकारात्मक नजरिए के लिए कई स्वयंसेवी संगठनों की ओर से अभियान चलाया जा रहा है। बढ़ती उम्र अथवा वृद्धावस्था को लेकर पश्चिमी समाजों की अवधारणा आज भी अमानवीय और क्रूर है। भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में वृद्धों के प्रति शुरू से ही सकारात्मक नजरिया रहा है। वृद्धाश्रम या ओल्ड होम की परिकल्पना मूलत: पश्चिम की है, भारतीय नहीं पर पश्चिमी समाज भी अब यह महसूस कर रहा है कि ‘ओल्ड होम्स’ वृद्धावस्था की समस्याओं का समाधान नहीं हैं। इसलिए ज्यादा वृद्धों वाले समाज को विशेष रूप से इस योजना पर काम करना पड़ेगा कि वृद्ध लोग कैसे सार्थक और सुकून भरा जीवन जी सकें। समाज कल्याण और बाल विकास की अनेक योजनाएं हैं जिसमें वृद्धों को महत्वपूर्ण भूमिका के लिए आग्रह किया जा सकता है। इस प्रकार जहां वे सक्रिय और उत्पादक जीवन जी पाएंगे, वहीं समाज को एक अनुभवी तथा परिपक्व सेवा भी मिल जाएगी। डब्लूएचओ की इस थीम (बुढ़ापा और स्वास्थ्य) का मतलब यह भी है कि ‘उम्र कोई बाधा नहीं’ अथवा ‘रिटार्यड बट नाट टार्यड’। दरअसल तकनीक व आधुनिक विकास ने व्यक्ति को ज्यादा उम्र तक जीने का वरदान दे दिया है। जाहिर है युवा और वृद्ध के बीच एक नया अन्तराल पैदा हुआ है। यह अन्तराल विकास की नयी इबारत लिख सकता है। आवश्यकता है कि हम पीढ़ियों और उम्रों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकें। बुढ़ापा बोझ तब होता है जब परिवारों में समझ और संवेदना का अभाव हो। हमें साधन और समृद्धि के साथ- साथ संवेदना और प्राकृतिक सत्य को भी महत्व देना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि विविद्यालयों एवं सामाजिक संस्थाओं में अलग-अलग विषयों के लिए विशेष पाठ्यक्रम या व्यावहारिक हॉबी की कक्षाएं चलाई जा सकती हैं। कहते हैं कि शिक्षा का पहला दौर जीवन की तैयारी है और इसका दूसरा दौर मृत्यु की तैयारी होना चाहिए। हम जीवन की तमाम योजनाएं बनाते हैं लेकिन यह जानते हुए भी कि ‘मृत्यु निश्चित है’, इस पर तनिक भी नहीं सोचते। यदि हमने मृत्यु का पाठ ठीक से पढ़ लिया तो यह जीवन की ही तरह सरल लगने लगेगा। फिर बुढ़ापा समस्या नहीं, एक उत्सव की तरह होगा। वि स्वास्थ्य दिवस के बहाने यदि हम बुढ़ापे के सवालों को ठीक से समझ सकें तो शायद हम बुढ़ापे को समस्या नहीं, बल्कि जीवन के एक आवश्यक अंग की तरह देखेंगे और यही आज की जरूरत भी है। इसलिए बुढ़ापे को स्वास्थ्य संगठन से जोड़ने की जरूरत है। हम सबको इस अभियान में लगना चाहिए क्योंकि हम सब भी धीरे-धीरे बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे हैं। |
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