हाल में हेल्पेज इडिया ने बुजुर्गो के प्रति व्यवहार पर अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। हेल्पेज इंडिया देश में बुजुर्गो के लिए काम करने वाली एक प्रतिष्ठित संस्था है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में राजधानी में बुजुर्गो के अपमान के मामले में 12 फीसद की बढ़ोतरी आंकी गई है। इस वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि 29.82 प्रतिशत बुजुर्ग राजधानी में किसी न किसी प्रकार से परेशान किए गए हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में परिवार के लोगों के खिलाफ ही शिकायतें अधिक पाई गई हैं। देश के प्रमुख 20 शहरों में 5,600 बुजुर्गो से 20 प्रकार के प्रश्नों के माध्यम से यह सर्वेक्षण कराया गया। 75 फीसद बुजुर्गो ने कहा कि यह अपमान उन्हें अपनों से मिला है। इसलिए वे अपनों के साथ रहने के बजाय अकेले रहना अधिक पसंद करते हैं। ध्यान देने लायक यह तथ्य है कि हमेशा यह समझा जाता है कि बुजुर्ग अपनी संतानों के साथ रहना चाहते होंगे, लेकिन वे अकेले भी रहना चाहते हैं। यदि संतानों का अपना परिवार उनके साथ ही जमे रह गया तो अकेले अपने भरोसे रहने की ख्वाहिश माता-पिता से छिनती भी है। हालांकि इस पर कोई एक राय बनाना उचित नहीं हो सकता है। कोई तरीका किसी एक के लिए अनुकूल होगा तो हो सकता है, वही तरीका दूसरे के लिए प्रतिकूल साबित हो। इसलिए यह मुद्दा व्यक्तियों की जरूरतों और इच्छा के आधार पर ही निकाला जा सकता है। बुजुर्गो के सम्मानजनक जीवन जीने के रास्ते में सबसे अहम चीज है कि उनके पास अपने हाथ में अपना पैसा भी हो। कई बार पाया गया है कि परिवार में पैसा और संपत्ति है, लेकिन बुजुर्ग को खर्च करने का अधिकार नहीं है। यह अपना पैसा सबसे ठीक रूप में अपनी पेंशन ही हो सकती है। हालांकि यह नहीं माना जा सकता है कि मात्र पेंशन का इंतजाम ही पूरा समाधान है, लेकिन यह सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है। हमारे देश में बड़ी संख्या ऐसे बुजुर्गो की है, जो किसी प्रकार की सरकारी नौकरी में नहीं रहे हैं, जिसमें पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था अब तक चली आ रही है। वैसे विगत कुछ सालों से इसके नियम बदले गए हैं। खेती-बारी, अन्य व्यवसाय या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का बुढ़ापा पेंशनविहीन होता है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गरीब समुदाय के लोगों को जो वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, उसमें रोटी-नमक भी नहीं पूरा हो सकता तो बुढ़ापे का दवा-इलाज कहां संभव होगा? दूसरा अहम मसला बनता है स्वयं लोगों द्वारा अपने बुढ़ापे की कारगर योजना खुद बनाने की। इस मसले पर हमारे समाज में लोग रामभरोसे ही रहते हैं। कुछ समय पहले कुछ बैंकों और बीमा कंपनियों के एक सर्वेक्षण में उजागर हुआ कि अब भी रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुके अधिकतर लोग अपने बुढ़ापे के बारे में कोई योजना नहीं बनाकर सिर्फ बच्चों के साथ रहने के बारे में सोचकर निश्चिंत रहते हैं। लोग संतानों पर मानसिक रूप से इतने निर्भर रहते हैं कि वह निर्भरता बोध भी एक समय बाद मानसिक असुरक्षा बोध का कारण बन जाता है। सिर्फ संतानों को ही एकमात्र आधार मानने से उनका क्या होगा, जिनकी कोई संतान न हो या हो भी तो दूसरे शहर या देश में उसे अपनी नौकरी आदि के कारण रहना पड़ता हो। उन शहरों या देशों का परिवेश जरूरी नहीं कि बुजुर्गो को रास आए। यानी ऐसे उपाय भी तलाशने ही चाहिए, जो सिर्फ बच्चों को केंद्र में रखकर न बनाया गया हो। किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ लोगों को शर्मसार करके नहीं निकाला जा सकता है, जैसे कि बच्चों से उम्मीद की जाए कि वे स्वार्थी न बनें और अपने बुजुर्गो का खयाल करें। वे निश्चित मानवीय, संवेदनशील और जिम्मेदार भी बनें, लेकिन इसी के साथ भविष्य के हर बुजुर्ग के पास कुछ अन्य समाधान भी हों, जो वे स्वयं और सरकारें मिलकर निकालें। जापान के प्रधानमंत्री योशिहिको नोडा ने देश में बुजुर्गो की बढ़ती तादाद की जिम्मेदारी सरकार उठा सके, इसलिए युवाओं को योगदान करने के लिए आह्वान किया है ताकि सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ते खर्च को पूरा किया जा सके। इसके लिए युवाओं पर टैक्स का बोझ बढ़ाया जाएगा। कहा गया है कि जो लोग काम करने की उम्र में पहुंच रहे हैं, उनके लिए आने वाले दो दशक कठिन होंगे। उनकी आय उनके अभिभावकों से कम होगी, उन्हें पेंशन के लिए अधिक अंशदान देना होगा और सेवानिवृत्ति के बाद कम धन मिलेगा तथा बहुत कम सामाजिक सेवाएं प्राप्त हो पाएंगी। अर्थशास्ति्रयों एवं अधिकारियों का कहना है कि यदि सरकार ने कड़ाई से फैसले को लागू किया तो जापान की स्थिति संभल जाएगी। जापान में बच्चे और युवाओं की तुलना में बुजुर्गो की बढ़ती संख्या ने वहां के समाज और सरकार को चिंतित कर दिया है। 1965 तक 9.1 कार्यरत कर्मचारी पर 1 रिटायर कर्मचारी था, वहीं 2050 तक 5 कार्यरत कर्मचारी पर दो रिटायर यानी 65 से अधिक उम्र वाला होगा। अनुमान के मुताबिक भारत में भी 2050 तक 50 साल से अधिक उम्र वाले आज के मुकाबले दोगुने हो जाएंगे। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में सभी के लिए पेंशन के नारे के साथ जो पांच दिवसीय धरने का आयोजन किया गया, उसका बुनियादी सरोकार यही था कि साठ साल से ऊपर हर व्यक्ति को औसतन दो हजार रुपये पेंशन मिलनी चाहिए। प्रो. प्रभात पटनायक ने सर्वव्यापी वृद्धावस्था पेंशन योजना पर केंद्रित अपने आलेख में आर्थिक संसाधनों की बात की है। उनके मुताबिक भारत में 60 वर्ष से ऊपर कम से कम आठ करोड़ लोगों को अगर ऐसी पेंशन का इंतजाम किया गया तो सरकार को 1 लाख 92 हजार करोड़ रुपये की राशि का इंतजाम करना पड़ेगा। उनके मुताबिक अगर सरकार कारोबारी घरानों को करीब पांच लाख करोड़ की कर राहत देती है तो क्या वह उससे भी आधी रकम का इंतजाम बुजुर्गो को सम्माननीय जीवन प्रदान करने के लिए नहीं कर सकती है। हमारे यहां अप्रत्यक्ष कर जो खरीदी जाने वाली हर वस्तु पर खरीददार से लिए जाते हैं, जो अमीर-गरीब सभी समान रूप से देते हैं, उसकी वसूली तो हो जाती है, लेकिन प्रत्यक्ष कर जिनसे अधिक लिया जाना चाहिए यानी अमीर तबका, वह तीन-तिकड़म से काफी हद तक बच निकलता है। टैक्स की वसूली ठीक से नहीं हो पाना और मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा भी अपना टैक्स चुरा लेने में माहिर है। सरकार को भी पता है कि कारपोरेट घराने अपनी जिम्म्ेादारी पूरी नहीं कर रहा है। ऐसे में पहले सरकार को अपनी नीतियां दुरुस्त करनी होंगी तथा मौजूदा व्यवस्था में भी सामाजिक सुरक्षा की गारंटी कर युवाओं को अधिकाधिक योगदान के लिए पे्ररित करना होगा। दूसरी बात पेंशनधारी भी जब तक समाज में अपनी मेहनत का योगदान कर सकते हैं, कुछ काम कर सकते हैं, तब तक उन्हें भी ऐसा कर पाने के लिए अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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