Saturday, June 30, 2012

दहेज उत्पीड़न की बढ़ती समस्या

भारत में दहेज लेने व देने के खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं, फिर भी दहेज की मांग और दहेज हत्याएं नहीं रुक रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि दोषी सलाखों से बच रहे हैं। दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ की मानें तो अधिकतर परिवारों की प्रवृत्ति ही ऐसी है जिसमें वह अपनी बेटियों को जुल्म सहने देते हैं और उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते हैं। इस प्रवृत्ति के चलते दहेज के अदालती मामले कमजोर पड़ जाते हैं और कानून दोषियों को सजा नहीं दे पाता। अदालत के इस नजरिये से शायद ही कोई असहमत होगा। इस संदर्भ में एक उदाहरण काफी उपयोगी है। दिल्ली की रहने वाली सीमा का विवाह फरवरी 2006 में हुआ और शादी बाद से ही न सिर्फ उससे अधिक दहेज की मांग की जाने लगी, बल्कि उस पर अत्याचार भी शुरू कर दिए गए। तंग आकर एक दिन वह अपने मायके लौट आई, लेकिन 16 मई, 2006 को सीमा की मां व उसके भाई उसे जबरन ससुराल छोड़ आए। उसके पति व सास-सुसर से यह कहते हुए कि वह उनकी दहेज की मांगों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन ससुराल में सीमा के लिए कोई जगह नहीं थी। कम दहेज लाने वाली बहू का ससुराल में वैसे भी सम्मान कम होता है। सीमा दोबारा अपने मायके लौट आई, लेकिन उस पर मानसिक दबाव इतना अधिक था कि उसने जून 2006 में आत्महत्या का प्रयास किया। वह बुरी तरह जल चुकी थी जब उसके माता-पिता उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। उसके माता-पिता ने आरोप लगाया कि सीमा ने आत्महत्या इसलिए की, क्योंकि दहेज की मांग को लेकर उसके ससुराल वाले उसे मानसिक व शारीरिक यातनाएं दे रहे थे। पर सवाल है कि सीमा की आत्महत्या के लिए कौन दोषी है? उसके ससुराल वाले जो दहेज के लालच में उसे मानसिक व शारीरिक कष्ट पहंुचा रहे थे या उसके माता-पिता जो यातनाएं भुगत रही अपनी बेटी के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हुए अथवा दोनों ही पक्ष दोषी हैं। वास्तव में इसके लिए हमारा समाज भी दोषी है जो दहेज पर विराम लगाने के लिए सकारात्मक प्रयास नहीं करता। इस मामले में सीमा के पति व सास-ससुर को हत्या के आरोप से मुक्त करते हुए दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने पीडि़त स्कूल टीचर सीमा के माता-पिता को दोषी ठहराया, क्योंकि उन्होंने समय रहते यानी जब सीमा जीवित थी तो दहेज उत्पीड़न का मामला न तो पुलिस में दर्ज कराया और न ही अपने रिश्तेदारों व दोस्तों को इस बारे में कुछ बताया। इस कारण आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे जिससे अदालत को उन्हें मजबूरन बरी करना पड़ा। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि दहेज के मामलों, महिला उत्पीड़न व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान करने के लिए तमाम कानून भले ही बना लिए गए हैं, लेकिन बावजूद इसके जमीनी सच्चाई में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। शायद इसी कारण न्यायाधीश कामिनी लॉ ने कहा कि पीडि़तों व उनके परिवारों को यह समझना आवश्यक है कि जब तक दहेज की मांग व उत्पीड़न को समय रहते रिपोर्ट नहीं किया जाएगा और लड़की के परिवार वाले उसके समर्थन में खड़े नहीं होंगे तब तक अदालतें व अन्य एजेंसियां पीडि़तों के लिए कुछ विशेष नहीं कर पाएंगी। दरअसल इस बात को समझने की आवश्यकता है कि ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट न करने से महत्वपूर्ण साक्ष्य खत्म हो जाते हैं जिस कारण दोषी भी अक्सर बच जाते हैं। न्यायाध्ीश कामिनी लॉ के अनुसार सीमा के मामले में सबूतों का नितांत अभाव था। अगर उत्पीड़न हो रहा था या दहेज की मांग थी तो रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई गई और इस मुद्दे पर दोस्तों व रिश्तेदारों से चर्चा क्यों नहीं की गई? अगर पीडि़त को गर्म चिमटे आदि से यातनाएं दी गई थीं तो मायके पक्ष ने तुरंत मेडिकल जांच क्यों नहीं कराई और उसे इस उत्पीड़न के बावजूद आरोपी परिवार के साथ रहने के लिए क्यों मजबूर किया? जब उसकी मृत्यु हो गई तो उसके परिवार के सदस्यों ने पहली ही मुलाकात में एसडीएम व जांच अधिकारी को उत्पीड़न और यातना की घटनाओं के बारे में उस तरह से क्यों नहीं बताया जैसा अब अदालत को बताया जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई अन्य कारण रहे हों जिस वजह से महिला ने आत्महत्या की। संभव है कि सीमा के माता-पिता ने यातना, उत्पीड़न और दहेज की मांग के जो आरोप लगाए हैं वह सब सही हों और वह विश्वाास करने के लायक भी हों, लेकिन क्या ऐसी स्थिति में बेसहारा युवती को ऐसे दरिंदों के पास बेबस छोड़ना चाहिए था जो उनकी बेटी पर अत्याचार कर रहे थे? ऐसा करना अपने आपमें अनुचित, अस्वीकार्य और अपराध है। न्यायाधीश कामिनी लॉ के मुताबिक कोई भी शिक्षित व संपन्न परिवार अपनी बेटी को जबरन मजबूर नहीं कर सकता कि वह ऐसे पति व सास-ससुर के साथ रहे जो उस पर अत्याचार करते हों। सीमा एक शिक्षित व रोजगार में लगी महिला थी। वह बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी गुजार सकती थी। फिर भी वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुई तो इसका दोषी कौन है? दरअसल, यह समाज की वह मानसिकता है जो महिला को दूसरे घर का समझते हैं और यह धारणा बनाए हुए हंै कि लड़की डोली में ससुराल जाए और वहां से अर्थी पर बाहर निकले। क्या लड़की के जीवन का एकमात्र मकसद किसी से ब्याह करके उसके परिवार की सेवा करना ही है। क्या वह व्यक्तिगत तौर पर आजाद इंसान नहीं है, जिसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं और सपने हैं। क्या विवाह के बाद लड़की का अपने मायके पर कोई अधिकार नहीं रहता है? जब तक इस किस्म के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तब तक दहेज के लिए उत्पीड़न व हत्याओं को रोक पाना संभव नहीं है। इसलिए न्यायाधीश कामिनी लॉ ने प्रश्न किया कि हमारे समाज में ऐसा क्यों है कि एक महिला की खुशी व उसके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण इस बात को समझा जाता है कि संबंध चाहे कितने भी खराब हो जाएं उसे तोड़ा नहीं जाना चाहिए। जब एक महिला का ब्याह हो जाता है तो जिस परिवार में वह पैदा हुई, जहां उसका पालन-पोषण हुआ वही उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं होते है, लेकिन जब वह मर जाती है तो अनेक किस्म की शिकायतें करने लगते हैं। दरअसल, जब तक घोड़ी चढ़कर बारातें लड़कियों के घर जाती रहेंगी तब तक दहेज की मांग पर विराम नहीं लगेगा और न ही विवाहित महिलाओं का उत्पीड़न खत्म होगा। महिलाओं को बराबरी का अधिकार व सम्मान उसी सूरत में मिल सकता है जब उनका अपने घर में उसी तरह से पालन-पोषण हो, जिस तरह से लड़कों का किया जाता है। वह ब्याह होकर अपनी ससुराल जाने की बजाय अपने घर जाएं, वह घर जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से विकसित किया हो। कहने का अर्थ यही है कि घर बनाने में पति व पत्नी का जब तक बराबर का योगदान नहीं होगा तब तक किसी लड़की न तो वास्तविक हक मिलेगा और न ही सही न्याय हो पाएगा, फिर बात चाहे मायके की हो, ससुराल की हो अथवा अदालत की। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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