Monday, May 28, 2012

बाल संरक्षण गृहों की नारकीय स्थिति


अपने मुल्क में सरकारी व गैर सरकारी बाल संरक्षण गृहों में बाल अधिकारों के प्रति असंवेदनशील भूमिका और वहां शरण लेने वाले बच्चों के प्रति संचालन समितियों का गैर जिम्मेदराना नजरिया बहुत ही चिंताजनक सवाल है। सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि यह बड़ा सवाल जब किसी हादसे के बाद सामने आता है तो सरकार जो फौरी कार्रवाई करती है, उसका असर तात्कालिक होता है लेकिन समय बीतने के साथ ही संबंधित सरकारी दिशा-निर्देश अपना असर खो बैठते हैं। ऐसे सरकारी और गैर-सरकारी संरक्षण गृहों में सरकारी दिशा निर्देशों के पालन में उदासीनता क्यों बरती जाती है, यह जानना बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की हाल में आयोजित एक बैठक में आयोग के सदस्यों ने कहा कि कई स्वयंसेवी संस्थाओं को निजी घरानों से बाल संरक्षण गृह चलाने के लिए भारी-भरकम राशि मिल जाती है, जिसके कारण वे सरकारी मदद के मोहताज नहीं होते मगर इसका मतलब यह नहीं है कि निजी गृहों में बाल अधिकारों को लेकर किसी तरह की नरमी की गुंजाइश है। इसके बावजूद कोताही की स्थिति में सख्त एक्शन की दरकार है।मैं एक साल से रोहतक के अपना घरनामक एनजीओ में रह रही थी। संचालक मैडम काम के बहाने मुझे दिल्ली स्थित जीबी रोड ले जाती और पैसे लेकर मेरा यौन शोषण कराती थी। विरोध करने पर वह धमकी देती थी कि किसी को बताया तो जान से मार दूंगी। संस्था से भागकर मामले का खुलासा करने वाली तीन अन्य लड़कियों का भी उक्त संचालक ने यौन शोषण कराया है।एक पीड़ित लड़की ने पुलिस को दिए उक्त बयान में अपनी व अन्य लड़कियों की उस पीड़ा व सच्चाई को सामने रखा है, जिससे सरकार व समाज दोनों ही परिचित हैं। कारण, ऐसी खबरें अक्सर मीडिया के जरिए हम तक पहुंचती रहती हैं। ऐसे ही हाल में हरियाणा के ही गुड़गांव जिले के वजीराबाद गांव में सुपर्णा का आंगननामक एनजीओ में रहने वाली 10-12 वर्ष की पांच बच्चियों ने वहां के केयरटेकर पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। मेडिकल जांच में दो बच्चियों से तो दुष्कर्म की पुष्टि हुई और बाकी तीन के सैंपल जांच के लिए भेजे गये। अपना घरमें युवतियों के यौन शोषण का मामला ही सामने नहीं आया बल्कि यहां रहने वाली कई लड़कियों को शादियों में नाच गाने के लिए भेजे जाने के बावत भी पुलिस को पता चला। पुलिस ने रोहतक की सीजीएम अदालत को बताया कि 15 से 18 साल की छह लड़कियों ने जांच में खुलासा किया कि संचालक उन्हें कई बार शादी समारोहों में नाच-गाने के लिए लेकर गई और पुलिस पूछताछ के बाद खुद संचालक ने यह स्वीकार किया। बेशक अपना घर की संचालक ने अपने बचाव में यह दलील दी कि वह लड़कियों को इसलिए ले गई थी, ताकि वे ऐसे माहौल में खुश रहें मगर ऐसा होता तो वह अपने साथ मंदबुद्धि या कम उम्र के बच्चों को भी साथ लेकर जाती। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार की वित्तीय बजट से चल रही अपना घर नामक संस्था को सरकार की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है। करीब डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के राजकीय शिशु सदन में तीन मासूम अनाथ बच्चियों के साथ बलात्कार वाली खबर ने राज्य सरकार पर निशाना साधा था। यहां भी महफूज नहीं बेटियां, यह कड़वी हकीकत बार-बार सरकार को अगाह करती है कि सरकारी साए में जो खामियां हैं, उन्हें फौरन दूर कर वहां शरण लेने वालों को और समाज को भरोसा दिलाया जाए कि वे यहां सुरक्षित हैं। इलाहाबाद वाली घटना का तब पता चला जब एक छह साल की लड़की ने बाल सुधार गृह की गतिविधियों के बारे में उस दंपती को बताया, जिसने इस बच्ची को गोद लिया है। बलात्कार का आरोप सदन के ही चपरासी विद्याभूषण ओझा पर लगाया गया है। चिकित्सा जांच से तीन बच्चियों के साथ हुए यौन दुष्कर्म की पुष्टि के बाद दुराचार के आरोपी ने भी कबूल किया कि वह काफी समय से ऐसी घिनौनी हरकत करता रहा है। जब और बच्चियां दूसरे कामों में मशगूल होतीं तो वह किसी एक बच्ची को टॉफी दिखाकर किचन में ले जाता था। पूरी तरह से स्तब्धइलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए एक दिशानिर्दे श जारी किया है, ताकि समाज में ऐसा कड़ा संदेश जाए, जिससे फिर कोई ऐसी हरकत करने की जुर्रत न करे और आदेश दिया कि इसे आपराधिक जनहित याचिका के रूप में माना जाए। जिला प्रशासन ने आरोपी विद्याभूषण को जहां नौकरी से बर्खास्त कर दिया वहीं बाल सुधार गृह की अधीक्षक उर्मिला गुप्ता को लापरवाही बरतने के एवज में निलंबित कर दिया। जनता को फौरी तौर पर संतुष्ट करने के लिए सरकार द्वारा ऐसे कदम उठाने में जो सक्रियता बरती जाती है, वह अंतत: सरकार के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं। हालांकि राज्य सरकारें इस तरह के मामलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने में अपनी विफलता उजागर न होने देने के मकसद से बर्खास्त या निलंबन का ढोंग करने से बाज नहीं आतीं। यूं तो अपने देश में बाल अधिकारों के उल्लघंन पर कड़ी निगरानी रखने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग का गठन किया गया है और इस आयोग ने रोहतक प्रकरण के बाद भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए राज्य सरकार को सख्त निर्देश भी दिए हैं। आयोग की अध्यक्ष प्रो. शांता सिन्हा का कहना है कि अधिकारियों का जोर इस तरह के मामलों को प्रभावी ढंग से रोकने और बाल संरक्षण गृहों के नियमों के तहत कुशल संचालन पर होना चाहिए। पर सवाल है कि ऐसे मामलों को गंभीरतम उल्लंघन की श्रेणी में शमिल किया जाए और कठोर कार्रवाई होती दिखाई दे। मामला देश के किसी भी सूबे का हो, उसके खिलाफ की गई कार्रवाई का संदेश दूसरे सूबों में भी जाए। बाल संरक्षण गृह सरकारी हों या गैर सरकारी- शिुशओं व लड़कियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का सम्मान करना उनका प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। इस समझ को सरकारी व गैर सरकारी अधिकारियों के बीच विकसित करना आज भी एक बड़ी चुनौती है।

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