हमारा समाज जैसे-जैसे आधुनिक हुआ वैसे-वैसे उसमें आधुनिकता के दोष भी उत्पन्न हुए। बीते दो दशकों के दौरान मुल्क में बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हुई है। आए-दिन मासूम बच्चों के यौन शोषण की खबरें मीडिया में छाई रहती हैं। घर से लेकर स्कूल या फिर कार्यस्थल कहीं भी बच्चे महफूज नहीं हैं। यहां तक कि बाल सुधार गृहों में भी उनके यौन शोषण की खबरें आम बात हैं। भूमंडलीकरण, उदारीकरण के बाद हुए उपभोक्तावाद के हमले और सेटेलाईट टीवी चैनलों की बाढ़, मोबाइल, व इंटरनेट क्रांति ने इन अपराधों को फैलाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। हालांकि बाल यौन शोषण को रोकने के लिए हमारे यहां पहले से ही कई कानून मौजूद हैं, लेकिन फिर भी अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह कानून नाकाफी ही साबित हुए हैं। कमजोर कानून और पुलिस की चिर-परिचित उदासीनता के चलते अपराधी अक्सर बच निकलते हैं और बच्चों का शोषण किसी न किसी रूप में जारी रहता है। जाहिर है इसे रोकने के लिए गंभीर कदम उठाने की आवश्यकता है। बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों और यौन शोषण पर अंकुश लगाने के लिए हमारे यहां एक सख्त कानून की जरूरत बरसों से महसूस की जा रही है। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा हाल ही में बाल यौन शोषण निरोधक विधेयक की मंजूरी बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रस्तावित विधेयक में ऐसे अपराधों को अंजाम देने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। यहां तक कि अपराधियों को उम्र कैद की सजा तक दिया जा सकता है। विधेयक में बच्चों से दुष्कर्म के मामलों को तीन अलग-अलग वगरें में बांटा गया है। जिसमें क्रमश: पांच, सात और दस साल की कैद का प्रावधान है। सबसे संगीन अपराधों में सजा को उम्र कैद तक बढ़ाया जा सकता है। प्रस्तावित कानून में कुल नौ अध्याय और 44 धाराएं हैं। यह कानून कुछ इस तरह से बनाया गया है कि इसमें सभी तरह के बाल यौन शोषण के अपराधों को शामिल किया जा सके। बच्चों के यौन शोषण की सबसे ज्यादा घटनाएं घर, स्कूल, अस्पताल, बाल सुधार गृह और पुलिस थानों में होती हैं। इसके अलावा घर के बाहर जो बच्चे काम करते हैं, वे अक्सर अपने नियोक्ताओं के द्वारा यौन शोषण के शिकार होते हैं। अनेक अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाली ज्यादातर बच्चियां अपने मालिक की हवस का शिकार होती हैं। इसी तरह होटल, ढाबों, मोटर गैराज, चाय की दुकानों, कारखानों, ईट भट्टों जैसे जगहों में काम करने वाले लड़कों के साथ भी अप्राकृतिक दुष्कर्म होने की घटनाएं आम बात है। हाल के कुछ सालों में बच्चों की चोरी या तस्करी की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं। हर साल जारी होने वाली ऐन रिसर्च ऑन ट्रैफिकिंग इन वूमेन एंड चिल्ड्रेन रिपोर्ट बताती है कि अगवा अथवा अपहरण किए गए बच्चों को भीख मांगने के काम और सेक्स टूरिज्म अथवा अश्लील फिल्मों के घिनौने कारोबार में धकेल दिया जाता है। जाहिर है प्रस्तावित विधेयक में इन सभी तमाम पहलुओं पर न सिर्फ संजीदगी से विचार किया गया, बल्कि आरोपियों को सख्त सजा का भी प्रावधान किया गया है। ताकि भविष्य में कोई भी अपराध करने से पहले दस बार सोचे। अक्सर देखने में आता है कि बच्चों का सबसे ज्यादा यौन शोषण उनके संरक्षण का दायित्व निभाने वाले अभिभावक, सुरक्षा बल के सदस्य, पुलिस अधिकारी, लोक सेवक, बालसुधार गृह, अस्पताल या शैक्षणिक संस्थान के कर्मचारियों आदि के द्वारा किया जाता है। प्रस्तावित कानून में इन लोगों द्वारा बच्चों पर किए गए अपराध को सबसे ज्यादा संगीन अपराध माना है और इस संगीन अपराध की सजा उम्रकैद तक हो सकती है। जाहिर है विधेयक के मार्फत सरकार का इरादा उस पूरे परिवेश को बच्चों के परिवेश संवेदनशील बनाने का है जहां बच्चों को कायदे से सबसे ज्यादा सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। बहुत सारे मामलों में बच्चे डर के मारे इन दुष्कृत्यों को उजागर ही नहीं करते। वहीं जिन मामलों में उनके मां-बाप कानून की मदद लेना चाहते हैं उनमें भी गुनहगार को कड़ी सजा नहीं मिल पाती। ऐसे में अपराधियों के हौसले और भी बुलंद होते हैं। दरअसल ठीक तरह से सबूत पेश नहीं करने के चलते अकसर अपराधी बच निकलते हैं। कई मामलों में मां-बाप ही अपने खानदान की इज्जत को ध्यान में रखते हुए बच्चों पर मुंह न खोलने का दबाव बनाते हैं। स्कूलों में बच्चियों के साथ शिक्षकों के यौन दुर्व्यवहार की शिकायतें मिलने पर स्कूल प्रशासन तो उस पर पर्दा डालता ही है, मां-बाप भी चुप्पी साध जाते हैं। इसी तरह घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाली लड़कियां अपने मालिकों के यौन शोषण को इसलिए सहन कर जाती हैं कि उनके सामने अपना और अपने परिवार का पेट पालने की मजबूरी होती है। जाहिर है यह कुछ वजहें हैं, जिनके चलते बच्चों का यौन शोषण बदस्तूर जारी रहता है। सरकार ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े अभी तक के तमाम अध्ययनों को मद्देनजर रखते हुए ऐसे सख्त कानून की पहल नए विधेयक के जरिये की है जिसमें कोई भी अपराधी कानून से बच न पाए। प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक बच्चों के यौन शोषण, उत्पीड़न, बच्चों की पोर्नोग्राफी और बच्चों से जुड़ी पोर्नोग्राफी सामग्री रखने जैसे मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतें गठित की जाएंगी। बाल मजदूरी और सेक्स कारोबारियों से मुक्त बच्चों का उचित पुर्नस्थापन किया जाएगा। बहरहाल बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए हमेशा कड़े कानून की बात की जाती है, लेकिन जब इन पर अमल करने की बात आती है तो ठोस तौर पर कोई भी कार्रवाई नहीं हो पाती है। केंद्र सरकार बच्चों की सुरक्षा को लेकर इससे पहले भी वर्ष 2000 में जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट यानी केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन कानून लाई थी, लेकिन एक दशक गुजर जाने के बावजूद ज्यादातर राज्यों ने इन पर अमल ही नहीं किया है। जिन सूबों में बोर्ड बने भी हैं तो वहां बच्चों की सुरक्षा की दिशा में कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है। मुल्क में इस वक्त शायद ही ऐसा कोई राज्य हो जहां मुताल्लिक दफाओं के तहत एक साथ बाल अपराध न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति कायम हुई हो। इतना ही नहीं बच्चों की स्मगलिंग और सेक्स टूरिज्म के प्रभावितों को इस खौफनाक जाल से निकालने के लिए एक स्पेशल पुलिस फोर्स कायम करने की जरूरत भी वर्षो से महसूस की जा रही है, लेकिन इस दिशा में किसी तरह की व्यवस्था अमल में नहीं आ पा रही है। केंद्र सरकार महज कागजों पर खाका तैयार करके बाल यौन शोषण से छुटकारा नहीं पा सकती। इसके लिए संबंधित कायदे-कानून को सख्त बनाए जाने और उनको असरदार तरीके से लागू करने की जरूरत है। तभी हमारे नौनिहाल महफूज रहेगें। प्रस्तावित कानून के संदर्भ में जन-जागरूकता की एक बड़ी मुहिम भी जरूरी है। सिर्फ कानून बना देने भर से अपराध नहीं रुक जाते, बल्कि उन कानूनों को अच्छी तरह से जानना और उनका सही इस्तेमाल करना भी जरूरी होता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, March 23, 2011
Tuesday, March 15, 2011
ढूंढ़ते रह जाओगे दुल्हन!
बेटे की चाह में बेटी से मुंह मोड़ना भारतीय समाज को मुश्किल में डालने वाला है। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि कन्या भ्रूण हत्या के कारण अगले 20 वषरें में भारत में 10 से 20 प्रतिशत युवा पुरुषों को पत्नियां नहीं मिल सकेंगी। कैनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत समेत चीन और दक्षिण कोरिया में अगले बीस वर्षो में युवा पुरुषों और महिलाओं की संख्या में 10-20 प्रतिशत का असंतुलन हो सकता है, जिसके अप्रत्यक्ष सामाजिक परिणाम होंगे। गर्भ में भ्रूण की जांच करने वाली अल्ट्रा साउंड के विकसित होने के कारण एसआरबी (सेक्स रेश्यो एट बर्थ यानी जन्म के समय सेक्स अनुपात) में काफी असमानता बढ़ी है। भारत में हुए एक ताजा अध्ययन में भी कहा गया था कि पंजाब, गुजरात और राजधानी दिल्ली में ये अनुपात समान रूप से 125 पुरुष प्रति 100 महिला का है। हालांकि केरल और आंध्रप्रदेश में ये अनुपात सामान्य 105 पुरुष प्रति 100 महिला ही है। दक्षिण कोरिया और चीन की स्थिति भी भारत जैसी है। साल 1992 में दक्षिण कोरिया के कुछ प्रांतो में एसआरबी 125 और चीन में 130 तक पहुंच गया था। यूसीएल सेंटर फॉर हेल्थ एंड डेवलपमेंट इन लंदन के प्रोफेसर थेरिस हेस्केथ के नेतृत्व वाले अध्ययनकर्ताओं के दल ने कहा, साल 2005 में ही 20 साल से कम आयु के पुरुषों की संख्या, महिलाओं की तुलना में तीन करोड़ 20 लाख अधिक दर्ज की गई थी। अध्ययन ने यह भी बताया है कि इन देशों में यदि किसी जोड़े का पहला या दूसरा शिशु लड़की है, तो वे अगले बच्चे की भ्रूण जांच करा कर लड़का होना सुनिश्चित करते हैं। इस कारण भविष्य में महिलाओं की संख्या में भारी कमी होगी और लाखों पुरुष विवाह से वंचित रह जाएंगे। वर्तमान में चीन में 28 से 49 वर्ष की आयु के गैर शादीशुदा लोगों में 94 प्रतिशत पुरुष हैं। शादी नहीं होने का उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। जिससे उनके हिंसा और अपराध में लिप्त होने का खतरा बढ़ जाता है। आइयूडी का इस्तेमाल सिर्फ दो फीसदी नई दिल्ली, एजेंसी : बाजार में मौजूद तमाम गर्भनिरोधकों में डॉक्टर सबसे बेहतर तरीका आइयूडी (कॉपर-टी) को मानते हैं लेकिन, भारत में इसका ज्यादा प्रचलन नहीं है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसे महिलाएं पांच या दस साल के लिए लगवा सकती हैं और जरूरत होने पर इसे कभी भी निकाला जा सकता है। इसका एक लाभ यह भी है कि आइयूडी को निकालने के बाद महिला को गर्भधारण के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। लेकिन विडंबना है कि भारत में इसका इस्तेमाल सिर्फ दो प्रतिशत महिलाएं ही करती हैं। भारत सरकार, पॉपुलेशन सर्विस इंटरनेशनल (पीएसआइ) एंड फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रीक्स एंड गायानोकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (फॉक्सी) के संयुक्त कार्यक्रम पहल-2 के लांच कार्यक्रम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की उपायुक्त डॉक्टर किरण अंबवानी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि भारत में कुल गर्भनिरोधक तरीकों के इस्तेमाल में आइयूडी का सिर्फ दो प्रतिशत का योगदान है। जबकि चीन में 67 प्रतिशत लोग इसका इस्तेमाल करते हैं|
Saturday, March 12, 2011
दान में यह धनवर्षा किसके लिए
क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं भारतवासी किस काम के लिए इतना बढ़-चढ़कर चंदा देंगे कि दो घंटों में ही दो सौ करोड़ की नकद और सोने के रूप में संपत्ति जमा हो जाए? इतना ही नहीं, इसके बाद भी हर रोज चेक और ड्राफ्ट के रूप में एक लाख रुपये से अधिक की रकम पहुंचने लगे? अधिकतर लोग समझ जाएंगे, क्योंकि वे अपने लोगों की प्रवृत्ति से वाकिफ होंगे या खुद भी वैसे होंगे। समाचार मिला है कि मथुरा में 108 एकड़ भूमि में प्रस्तावित श्रीश्री वृंदावन धाम मंदिर के लिए मानों धन की वर्षा हो रही है। वृंदावन के चौमुहा में 23 से 25 जनवरी के बीच एक यज्ञ का आयोजन हुआ था, जिसमें आयोजकों ने एक भव्य मंदिर का प्रस्ताव रखा था, जिसकी अनुमानित लागत करीब पांच सौ करोड़ बताई गई। समारोह में उपस्थित भक्तों ने अपनी तिजोरी और जेबें खाली करनी शुरू कर दीं तथा महिलाओं ने अपने शरीर पर पहने आभूषणों को दानपात्र में डालना शुरू कर दिया। बताया गया की दो घंटों में दो सौ करोड़ रुपये का चंदा एकत्र हो गया और अब भी इंटरनेट, ड्राफ्ट-चेक से लगभग हर रोज एक लाख से ऊपर धन एकत्र हो रहा है। मध्य फरवरी तक लगभग 20 लाख इस तरह आ चुका है। सवाल उठता है कि अपनी जेबें तक खाली कर देने वाले इन्हीं दानदाताओं से यदि स्कूल, अस्पताल या अन्य कोई आपदा के लिए दान मांगा जाता तो क्या वे इतनी आसानी से और इतनी कीमत वाले दान देते? मानवीय आधार पर तो लोग कभी इतनी बड़ी रकम दान में नहीं देते, लेकिन आस्था के नाम पर दान देने में कोई गुरेज नहीं, न कोई शक या सवाल! यह स्थिति तब है, जब पहले से ही देशभर में मंदिरों की कमी नहीं है। शायद जमीन कब्जा करने का यह सबसे बड़ा और प्रचलित माध्यम बन गया है कि वहां किसी संप्रदाय का प्रार्थना स्थल बना दिया जाए। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लॉनिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (न्यूपा) की 2009-10 कि रिपोर्ट हाल में आई है। इसके अनुसार देश में प्रति दस किलोमीटर पर कक्षा 1 से 8वीं तक के स्कूलों की संख्या दो है और प्रति दस किलोमीटर पर धर्मस्थलों की संख्या करीब 14, जिसमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघर आदि हंै। शिक्षा के अधिकार के तहत प्राइमरी स्कूल एक किलोमीटर के दायरे में होना चाहिए यानी दस किलोमीटर में दस स्कूल होने चाहिए। सर्वे के मुताबिक 2009 में प्राइमरी व मिडिल स्कूलों की संख्या 13 लाख थी, जबकि 2001 के आंकड़ों के मुताबिक धार्मिक केंद्रों की संख्या 25 लाख थी, जो 2009 तक काफी बढ़ गई होगी। इसके साथ ही गली-मोहल्लों के कई केंद्रों की गणना नहीं हो पाई होगी, क्योंकि स्कूलों की कुछ औपचारिकताएं होती हैं। इसलिए उनकी गणना फिर भी ठीक से हो सकती है, लेकिन छोटे-मोटे धार्मिक स्थल हर गली-कूचे में मिल जाएंगे, जो कहीं पंजीकृत नहीं होते। अधिकतर धार्मिक केंद्रों पर आने वाले चढ़ावे या दान में मिली संपत्ति का कोई ब्यौरा नहीं होता है, लेकिन जितना होता है, उससे उस क्षेत्र की अथाह धन-संपत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। मसलन, शिरडी के साई बाबा की संपत्ति अरबों में आंकी गई है। मंदिर की तरफ से संपत्ति का जो आंकड़ा पेश किया गया है, वह है 32 करोड़ मूल्य के आभूषण तथा चार अरब से अधिक का निवेश। यह वह है, जो आधिकारिक दस्तावेज में सामने आया है। आंध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् के पास आठ हजार किलो तक के कीमती जवाहरात हैं, जिसकी कीमत 52 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। केरल के गुरुवायुर मंदिर में 400 किलोग्राम के जेवरात तथा 400 करोड़ का बैंक डिपॉजिट, 50 लाख तक के इंश्योरेंस प्रीमियम सालाना है। अय्यप्पा सबरीमाला मंदिर में तो सिर्फ दो महीने की अवधि में 150 करोड़ रुपये की आय हो जाती है। गुजरात स्थित अम्बाजी शक्तिपीठ यात्रा धाम के लिए 1.23 अरब का बीमा कवच है, जिसका प्रीमियम करीब 2.73 लाख रुपये सालाना चुकाया जाता है। यह आतंकी हमलों के संदेह के हिसाब से लिया गया है। दान स्वरूप आई इस अकूत संपदा पर एक तो सरकार को टैक्स नहीं दिया जाता, दूसरे सरकार को ही जनता से मिले टैक्स में से इन धर्म केंद्रों के इर्दगिर्द कुछ सुविधाएं देनी होती हैं। तीर्थयात्री जब किसी हादसे के शिकार होते हैं तो धर्म केंद्र के प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, न ही उसके अधिकारियों को या मालिकों को सजा मिलती है। इसकी अपेक्षा सरकार से की जाती है और सरकारें भी प्रबंधन से न तो टैक्स वसूलने में सख्ती करती हैं और न ही प्रबंधन को जवाबदेह बनाने के लिए सख्त नियम-कानून बनाती हैं। उन्हें वोटबैंक खिसकने का डर लगा रहता है। गत वर्ष सबरीमाला हादसे के संदर्भ में कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए उसने क्या किया है। केरल सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि आगे ऐसे हादसे न हों, इसके लिए वह एक कार्ययोजना तैयार कर रहा है, जिसके तहत नीलाक्कल आधार शिविर विकसित किया जाएगा और कई अन्य उपाय भी सरकार करेगी। किसी ने मंदिर प्रबंधन के खिलाफ इस अव्यवस्था और हादसे के लिए कोई केस दायर नहीं किया है। इलाहाबाद में 2012-13 में होने वाले महाकुंभ मेले के लिए यात्रियों को सुविधा मुहैया कराने तथा मेला प्रबंधन पर होने वोले खर्च के लिए इलाहाबाद के जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश सरकार से 20.76 अरब रुपये का बजट दिया है। राज्य सरकार ने इस राशि को विशेष अनुदान के रूप में केंद्र सरकार से मांगा है, जिसे केंद्र सरकार ने मना नहीं किया है, बल्कि प्रस्तावित कार्यो का ब्यौरा मांगा है तथा वास्तविक खर्च बताने को कहा है। यह ब्यौरा पहली फरवरी तक दिया जाने वाला था। राज्य के अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि 2001 के कुंभ मेले में करीब 100 करोड़ का खर्च तथा 2007 के अर्धकुंभ मेले का खर्च 150 करोड़ आया था, जो सिर्फ बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने पर खर्च हुआ था। इसी तरह हज यात्रा पर मुस्लिम समुदाय को या मानसरोवर यात्रा पर हिंदू समुदाय तथा पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा जाने के लिए भी सरकार सब्सिडी उपलब्ध कराती है, जबकि यह लोगों की अपनी आस्था के अनुरूप उनकी निजी जरूरत है, जो उनके अपने कथित पापों से मुक्ति या स्वर्ग की मान्यता से जुड़ी होती है। किसी भी सरकार के खजाने में रुपये उसकी अपनी जेब के नहीं होते हंै। वह आम लोगों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में वसूला जाता है। हमारे देश में अप्रत्यक्ष कर के रूप में ठीक से कर वसूल हो पाता है, क्योंकि यह हर वस्तु खरीदने में अमीर-गरीब सभी को उस सामान के बदले देना होता है, जबकि प्रत्यक्ष कर की चोरी एक बड़ी समस्या है। खासतौर से अमीर तथा मध्यवर्ग कर चोरी अधिक करता है। सहज कल्पना की जा सकती है कि ढेरों धर्मस्थलों पर होने वाले आय को यदि जनहित के काम लगाया जाता तथा सरकारी खजाने की राशि लोगों की धार्मिक आस्था को पूरा करने पर खर्च न होकर उसे बुनियादी सुविधाएं जिसमें स्कूल, अस्पताल आदि पर लगाया जाता तो अधिक लोगों का भला हो पाता। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Thursday, March 10, 2011
जीने का अधिकार
प्राण या चेतना पर अधिकार किसका हो, व्यक्ति का या राज्य का?
पिछले 37 वर्षों से बेहोश अरुणा शानबाग की इच्छा मृत्यु की कामना इसलिए पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि संविधान के मूल अधिकारों के अनुच्छेद-21 में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के आरक्षण का प्रावधान है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। यह बात दूसरी है कि देश में आत्महत्या करने वालों की संख्या निरंतर बढ़ी है। इसके लिए न तो उन्हें घर-परिवार के लोगों का मुंह देखना पड़ता है, न व्यवस्था के संचालकों का और न ही न्यायपालिका या संविधान का उपरोक्त बंधन उन्हें रोक पाता है।
यह केवल ऐसे मामलों में ही संभव हो पाता है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के भरोसे हो, अचेत-बेसुध हो या लंबे समय से अस्पताल पर आश्रित हो। यदि ऐसे मामले न्यायालय के पास जाएं, तो जवाब नहीं में ही मिलेगा। जहां तक विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का संबंध है, उसका हाल तो यही है कि मानवाधिकारों को धता बताते हुए मुठभेड़ के नाम पर या पुलिस हिरासत में पूछताछ के नाम पर लोग अपनी जान गंवाते हैं। लेकिन ऐसा करने वालों को कानून के दायरे में लाने वाली व्यवस्था में इतने छेद हैं कि असली अपराधी को जानते हुए भी कानून के बंधन में आसानी से नहीं बांधा जा सकता।
गरीबी, बेकारी, भूख, अभाव का सामना करने से रोकने में व्यवस्था कहीं भी मददगार के रूप में सामने नहीं आती। लेकिन आत्महत्या के प्रयास में विफल लोगों को दंडित जरूर किया जाता है। आखिर मृत्यु है क्या? चेतना का विलोप ही मृत्यु है और माना जाता है कि चेतना का केंद्र मस्तिष्क है। इसके सफल संचालन में शरीर के शेष अंग योगदान करते हैं। अर्द्धचेतना की स्थिति, जिसे बेसुध होना कहा जाता है, न तो जिंदा होने की स्थिति है और न मृत होने की। लेकिन शरीर के कई अंगों के काम करना बंद करने के बाद भी चेतना रहती है और चिंतन प्रक्रिया में अपना योगदान करती है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को अंगहीन और अपंग तो कहा जा सकता है, लेकिन बेसुध या बेहोश नहीं। अब इस प्राण या चेतना पर अधिकार किसका हो, व्यक्ति का या राज्य का, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवन शरीर के साथ ही जुड़ा हुआ है। इसीलिए कहा जाता है कि इससे परे उसका कोई अस्तित्व नहीं है। सच्चिदानंद की परिकल्पना भी यही है कि सत् चेतना के फलस्वरूप ही आनंद या दुख प्राप्त हो सकता है। यानी सत प्रथम तत्व है, उसके बिना न तो चेतना है, न आनंद। इस प्रकार चेतना ही हमारे समस्त कार्यों का निर्णायक तत्व है। ज्ञान-विज्ञान, दिशा, इच्छा-अनिच्छा सब कुछ चेतना से ही संभव है।
डॉक्टरों का भी मानना है कि इच्छा मृत्यु, यानी कष्टकर रोगों से मुक्ति के लिए मृत्यु का अधिकार लाइलाज रोगियों को ही मिलना चाहिए। अरुणा शानबाग न तो वेंटीलेटर पर हैं और न अभी तक यह माना गया है कि उनका इलाज, जो मुख्य रूप से थोड़ी देखभाल पर आधारित है, नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में यह कह दिया है कि किसी व्यक्ति को इच्छा मृत्यु मांगने का अधिकार नहीं है। परिवार यदि चाहे, तो उच्च न्यायालय डॉक्टरों से विचार के बाद उस पर अनुमति दे सकता है। इसलिए अब मामला यहां आकर फंसता है कि जीवन पर अधिकार किसका माना जाए-व्यक्ति का या परिवार का। हमारा संविधान व्यक्ति आधारित है और उसे ही सारे अधिकार, विशेषाधिकार और मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन यदि परिवार के मांगने पर मृत्यु का अधिकार मिल सकता है, तो व्यक्ति को क्यों नहीं? मौलिक अधिकार, जिसमें जिंदा रहने का भी अधिकार सम्मिलित है, व्यक्ति के लिए ही है। उसके निर्णय में बाधा तभी आती है, जब कोई व्यक्ति उसका कार्यान्वयन न्यायालय या अस्पताल के माध्यम से कराना चाहे। तब इन दोनों संस्थाओं को व्यक्ति के अधिकार बोध के बजाय अपने सांविधानिक दायित्वों की याद आती है। तब वे बाधक बनकर खड़े हो जाते हैं और ये बाधाएं उन्हीं लोगों तक सीमित हो जाती है, जो अक्षम हैं। चेतना का लोप हो चुका है, तो यहां दायित्व बोध का अस्त्र क्या सही दृष्टि और दिशा में प्रयुक्त हो रहा है? केईएम अस्पताल में नर्स के रूप में कार्यरत अरुणा शानबाग को, जिसे परिस्थितिजन्य कारणों के फलस्वरूप घोर यातना की इस स्थिति तक पहुंचना पड़ा है, बचाना भी तो राज्य या समाज का ही दायित्व था। अब मामला यह है कि जिन कारणों से वह इन स्थितियों में पहुंची हैं और अस्पताल में पड़ी हैं, क्या उसे वैसे ही तब तक के लिए छोड़ दिया जाए, जब तक वह मृत्यु की शिकार नहीं हो जातीं? मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। इस जीवन के लिए व्यक्ति को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका उपयोग वह ऐसी स्थिति में कैसे कर पाएगा? जब वह स्वयं सक्षम ही नहीं है और संविधान के रक्षक इस स्थिति में बदलाव करने में अक्षम हों, तब क्या होना चाहिए? इसी के साथ, जब परिवार को इस संबंध में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उचित निर्देश पाने का अधिकार है, तो उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था होगी, जिनका परिवार नहीं है? यदि उनके परिवार में वसुधैव कुटुंबकम है, तो यह दायित्व किसे सौंपा जाएगा? जिस प्रकार किसी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है, उसी प्रकार क्या उसे सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार नहीं है? ऐसी जिंदगी, जिसे डॉक्टर ‘वेजिटेटिव स्टेट’ कहते हैं, उसका अर्थ तो यही है कि वह व्यक्ति लाइलाज है और उसकी चेतना कोई काम नहीं कर रही। अब इसे सजा के रूप में देखा जाए या पुरस्कार के रूप में? इसलिए ऐसे व्यक्तियों को सम्मान पूर्वक मृत्यु का अधिकार सम्मान पूर्वक जीने के अधिकार का विरोधी नहीं है। Monday, March 7, 2011
दलितों की सवर्ण जाति चेतना
लखनऊ में पिछले दिनों एक विजातीय विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह की विशेष बात यह थी कि इसे आर्यसमाज मंदिर में पुलिस ने सम्पन्न कराया। पुलिस आम तौर पर विवाहेच्छुक प्रेमी जोड़ों को लग्न मंडप में नहीं बिठाती मगर इस मामले में उसे ऐसा करना पड़ा। यह दीगर बात है कि पुलिस ने घरात-बरात के विधि-विधान उच्च न्यायालय के आदेश से पूरे किये। इस विवाह में एक उल्लेखनीय सामाजिक पहलू छिपा हुआ था जिस पर विचार करना किसी ने जरूरी नहीं समझा जबकि यह जरूरी था। भारतीय समाज में कई लोकतांत्रिक दशक बीत जाने के बावजूद जातीय असहिष्णुता गहरे पैठी हुई है, जो प्रेम और विवाह के मामलों में कुछ क्षेत्रों में इतनी उग्र है कि प्रेमी जोड़ों को सीधे-सीधे मृत्यु दंड दे दिया जाता है। खासतौर पर उन मामलों में जिनमें सवर्ण जातीय संस्कार आहत होता है। यह सही है कि बहुत से शहरी क्षेत्रों में लोगों के सोच में बदलाव आया है और सवर्ण जातियों के लोग अपने पुत्र-पुत्रियों के प्रेम विवाह की सहमति दे देते हैं। विशेष तौर पर तब जब अगला व्यक्ति भी सवर्णता के दायरे में आता हो। किसी सवर्ण को अपनी बेटी या बेटे के किसी दलित लड़के या लड़की के साथ विवाह की अनुमति देने में आज भी कठिनाई होती है और उनकी प्राथमिक सांस्कारिक प्रतिक्रिया ऐसे विवाह के प्रति उग्र विरोध की ही होती है। यह वह सवर्ण जातिग्रंथि है जिसे पराजित करने में कई शताब्दियां और समाज परिवर्तनवादियों की कई पीढ़ियां खप गयी हैं, मगर यह ग्रंथि अब भी अपराजेय है। लेकिन जो सर्वाधिक चिंतनीय पहलू है वह यह कि केवल कथित सवर्ण जातियां ही इस ग्रंथि की चपेट में नहीं हैं बल्कि दलित जातियां भी इसकी उतनी ही शिकार हैं। यानी आर्थिक और सामाजिक समानता तथा न्याय के लिए संघर्ष करने वाली तथा शताब्दियों की अधिकार वंचन प्रक्रिया को पलटकर संविधान में अपने लिए बराबरी तथा आरक्षण जैसे विशेषाधिकार को अर्जित कर लेने वाली दलित जातियां भी पूरी तरह से उस सवर्ण जातिग्रंथ से ग्रस्त हैं जिसके विरुद्ध समूची वैचारिक दलित चेतना खड़ी होती है। मैंने जिस विवाह का उल्लेख किया है, उसमें लड़का अमित चतुव्रेदी था और लड़की किरन दलित। जब दोनों का प्रेम हुआ और दोनों ने शादी करनी चाही तो जातिग्रंथीय पारिवारिक विरोध शुरू हो गया। तब दोनों भाग निकले। लड़की के परिजनों ने लड़के के विरुद्ध अपहरण की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी। लड़के के वापस लौट आने और स्वेच्छा से जाने की बात बताने पर भी पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया, अपनी पारम्परिक शैली के अनुसार। तब लड़के की मां ने अदालत में गुहार लगायी। लड़की को अदालत में बुलाया गया तो उसने कहा कि वह और अमित शादी करना चाहते हैं लेकिन उसके परिजन उसे न केवल शादी करने से रोक रहे हैं बल्कि अमित को प्रताड़ित भी कर रहे हैं। उसने यह भी बताया कि वह जहां की रहने वाली है वहां उसके लिए अमित से शादी करना सम्भव नहीं है। इस पर अदालत ने आदेश दिया था कि अमित और किरन की शादी पुलिस अभिरक्षा में कराई जाये। यहां पुलिस के अमित को गिरफ्तार कर जेल में डाल देने के व्यवहार पर कोई टिप्पणी करने का कोई अर्थ इसलिए नहीं है कि पुलिस ऐसे मामलों में प्राय: असंवेदनशील होती है, और इनमें पर्याप्त पैसे की गुंजाइश भी तलाशती है। इसके अलावा किरन का परिवार एक पढ़ा-लिखा परिवार था, और बहिन मायावती के शासन में अपनी अहमियत के प्रति जागरूक था। इसलिए उसे अमित को, निरपराध होने के बावजूद, जेल भिजवाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन इस प्रकरण का मूल प्रश्न यह है कि आखिर किरन के परिजनों ने अपनी वयस्क, परास्नातक तथा अपने स्वैच्छिक विवाह अधिकार के प्रति सजग लड़की को एक विजातीय लड़के से शादी करने की अनुमति क्यों नहीं दी? उन्होंने इस मामले में ठीक वैसा ही रवैया क्यों अपनाया जैसा कि कथित सवर्ण जातियों के लोग अपनाते हैं? जो दलित जाति समूह अपने आर्थिक-सामाजिक बराबरी के अधिकार के प्रति बेहद सक्रिय और उद्वेलित रहता है, अपने सामाजिक व्यवहार में वह उन्हीं सवर्णो की तरह व्यवहार क्यों करता है, जिनके व्यवहार के विरुद्ध वह समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना कर रहा है? इन सवालों के जवाब एक बेहद विरोधाभासी और विसंगतिपूर्ण स्थिति में छिपे हैं। दलित जाति समूह जहां एक ओर बेहद सजग ढंग से अपने प्रति हुए सवर्ण जाति समूहों के गैर बराबरी, असजग ढंग से वे सवर्ण समूहों के ही जातीय व्यवहार को अपना भी लेते हैं। कथित उच्च जातियों की जातीय अहमन्यता उन्हें बुरी तरह विचलित करती है लेकिन एक जाति के तौर पर वे उसी जातीय अहमन्यता को अपने सामाजिक आचरण का हिस्सा भी बना लेते हैं। सवर्ण जातियों की जो सामाजिक संस्कृति व्यक्ति की निजी आजादी की घोर विरोधी रही है, दलित जातियां भी जाने-अनजाने उसी सामाजिक संस्कृति को अपना लेती हैं। उनकी दलित चेतना उच्च जातियों के अन्याय के संदर्भ में बेहद आक्रामक होती है लेकिन जब स्वयं उनके अपने बीच से वैयक्तिक आजादी का लोकतांत्रिक और अब संविधान सम्मत भी आग्रह उभरता है तो उन्हें भी परेशानी होने लगती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि दलित जातियों का सवर्ण वर्चस्वतावादी ढांचे में अनुकूलन हो रहा है। यानी पिछले दशकों में राजनीतिक-आर्थिक बदलावों के चलते जिस दलित मध्यवर्ग का उदय हुआ है वह सवर्ण जातीय व्यवहार संस्कृति को ही अपना रहा है और यही चिंतनीय स्थिति है। इस स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है कि भारतीय समाज का जातिवादी ढांचा टूटने के बजाय और अधिक मजबूत हो रहा है। भले ही कल की आर्थिक राजनीतिक तौर पर विपन्न जातियां आज सम्पन्नता की ओर अग्रसर हों, मगर उनकी जातीय सामाजिक संस्कृति जातिवादी ही है। दलित जाति समूहों को इसके प्रति सचेत होना चाहिए।
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