देश में हर एक हजार नवजात बच्चों में से 50 दम तोड़ देते हैं, जबकि एक लाख महिलाओं में से 230 की प्रसव के दौरान मृत्यु हो जाती है। सरकार ने हालांकि सहसाब्दि विकास लक्ष्यों के तहत 2015 तक नवजात मृत्यु दर 28 प्रति एक हजार जन्म और मातृ मृत्युदर 106 प्रति एक लाख जन्म पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री सुदीप बंदोपाध्याय ने शुक्रवार को लोकसभा में बताया कि वि स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के 2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत में नवजात मृत्यु दर 50 है और वह घटते क्र म में अन्य देशों की सूची में 49वें नंबर पर आता है। इस सूची में 134 की दर के साथ अफगानिस्तान सबसे ऊपर है। हालांकि घाना, बांग्लादेश, सोलोमन आइलैंड, गुयाना और जमैका जैसे कई देश इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में हैं। डब्ल्यूएचओ के ही 2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत में मातृ मृत्युदर 230 प्रति एक लाख जन्म है। दुनिया के अनेक देशों की सूची में भारत 55वें स्थान पर आता है। हालांकि जमैका, श्रीलंका, त्रिनिदाद टोबेगो, यूक्रेन, सऊदी अरब आदि देशों की स्थिति भारत से बेहतर है। उन्होंने बताया कि केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने पांच साल के कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर और मातृ मृत्यु दर के संबंध में आंके गए लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। दिल्ली ने पांच साल के कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर को कम करने का लक्ष्य पूरा किया है। बंदोपाध्याय ने बताया कि लैंसेट की अप्रैल 2011 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2009 में मृत जन्मे बच्चों की दर 22.1 प्रति एक हजार जन्म यानी करीब 5.8 लाख थी, जबकि भारत के महापंजीयक की नमूना पंजीयन पण्राली के आंकड़ों के अनुसार उस साल यह दर आठ प्रति एक हजार जन्म यानी करीब 2.1 लाख थी।
Monday, December 19, 2011
Friday, December 16, 2011
तीन दशक में देश भर में 1.20 करोड़ बच्चियों की भ्रूण हत्या
भारत में पिछले तीन दशक में एक करोड़ बीस लाख बच्चियों को गर्भ में लिंग का पता लगाकर मार दिया गया। सेंटर फार ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के इस साल कराए गए सव्रेक्षण में यह तथ्य सामने आया हैं। इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति की अक्टूबर, 2010 की रिपोर्ट में भी हुई है। भारत में वर्ष 2011 की जनगणना से यह साफ संकेत मिलता है कि छह साल तक के बच्चों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में लगातार कमी दिखाई दे रही है। प्रति एक हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या 914 रह गई है। सव्रेक्षण के मुताबिक देश के कई बड़े राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में यह प्रतिशत 914 से भी कम है। पंजाब और हरियाणा में यह आंकड़ा क्रमश: 846 और 830 है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति का मानना है कि एशियाई देशों खासकर भारत और चीन में 11 करोड़ 70 लाख कन्याओं की भ्रूण हत्या की गई। लड़कियों के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए सरकार के सात स्वयं सेवी संस्थाएं भी बढ़चढ कर हिस्सा ले रहे हैं। कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाने तथा इसके लिए जमीनी स्तर पर लोगों को जानकारी देने के लिए पिछले 10 साल से काम किया जा रहा है, ताकि लड़कों के मुकाबले लड़कियों का कम अनुपात ठीक हो। इसके तहत कन्या भ्रूण हत्या के व्यवहार को चुनौती देना और रोकना तथा बड़े पैमाने पर जागरुकता पैदा करना है, ताकि लड़के और लड़कियों की बराबरी और लड़कियों के अधिकार के मुद्दे को संवेदनशील बनाया जा सके।
अजन्मी चीख
परिवार नियोजन कार्यक्रम को सकारात्मक नजरिए से देखा जाता रहा है लेकिन आबादी नियंतण्रकी इस आड़ में, खासकर पढ़े-लिखे लोग जिस अनैतिक ढंग से कन्या भ्रूण हत्या को अंजाम दे रहे हैं, वह किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। बहाना महंगाई की मार को दिया जाता है लेकिन संतान को सीमित रखने की यह विवशता लड़कियों के लिए मारक साबित हो रही है। ‘सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च’ का यह सव्रेक्षण इसकी पुष्टि के लिए काफी है। इसके मुताबिक बीते तीन दशकों में बेहद नियोजित तरीके से लगभग सवा करोड़ बच्चियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई। विपरीत तर्क होगा कि इसमें नया क्या है? लड़कियों की पहचान तो सदियों से हमारे देश में अनचाही संतान के बतौर रही है लेकिन इस सव्रेक्षण के नतीजे कन्या भ्रूण हत्या के जिन नए पहलुओं पर रोशनी डालते हैं, वे पढ़े-लिखे तबके के जेहनी अंधकार की हकीकत बयान करते हैं। इस सव्रे में ढाई लाख शिशुओं के जन्म का गहन निरीक्षण किया गया और खास ध्यान परिवारों के दूसरे बच्चे पर आधारित लिंगानुपात पर केंद्रित किया गया। नतीजा यह मिला कि जिन परिवारों में पहली संतान लड़की थी, उनमें वर्ष 1990 में कन्या जन्म दर प्रति हजार लड़कों के मुकाबले महज 906 ही रही। अधिक खौफनाक यह कि वर्ष 2005 के आते-आते कन्या जन्म का औसत 836 के बेहद असंतुलित आंकडे तक पहुंच गया। जबकि जिन परिवारों में पहली संतान लड़के थे, उनमें ऐसी असंगति नदारद थी। यह रपट हमारे उस भ्रम को भी तोड़ती है कि अशिक्षा कन्या जन्म के प्रति अनिच्छा का प्रमुख आधार है। इसके अनुसार अजन्मी लड़कियों से नियोजित छुटकारे की चाह उन परिवारों में अधिक देखी गई जो खाते-पीते कहे जाते हैं और जहां माएं सिर्फ साक्षर ही नहीं बल्कि शिक्षित भी हैं। डरावनी सचाइयों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। रिपोर्ट यह भी बयान करती है कि वर्ष 1991 में केवल देश की दस फीसद आबादी उन राज्यों की निवासी थी जहां प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 915 तक थी लेकिन 2001 में यह तादाद बढ़कर 27 फीसद और 2011 में तो बेहद चिंतनीय 56 फीसद तक पहुंच गई। यानी फिलहाल, हमारी आधी से अधिक आबादी में लड़कियां न केवल अल्पसंख्यक हैं बल्कि उन्हें सीमित रखने की कोशिशें भी जारी हैं। जाहिर है, नारी के भौतिक और आध्यात्मिक वजूद को सराहने और पूजने का दिखावा करने वाला हमारा समाज हकीकत में उनके प्रति आपराधिक हद तक असहिष्णु होता जा रहा है। वैसे तो दूर बैठे और भारत पर सतही नजर रखने वाले व्यक्ति के लिए इस सचाई को पचाना मुमकिन नहीं क्योंकि जिस देश में राष्ट्राध्यक्ष, सत्ताधारी दल के शीर्ष पद और नेता विपक्ष के पदों पर महिलाएं आसीन हों; वहां समाज और व्यवस्था की नारी-हितैषी छवि को दूसरे प्रमाण की दरकार नहीं। यदि नजर जयललिता, मायावती या ममता जैसी सशक्त नेताओं तक पहुंच जाए तो लड़कियों के प्रति अन्याय की सचाई सिरे से बेबुनियाद लगेगी। लेकिन दुर्भाग्य से हकीकत हमेशा आवरण से कहीं परे होती है। इसीलिए अजन्मी बच्चियों की चीख शायद हमें सुनाई नहीं देती। यदि गौर से सुने तो वे यही कहतीं मिलेंगी कि महिला आरक्षण बाद में, पहले हमारे वजूद में आने का इंतजाम तो करो।
Friday, December 2, 2011
सामाजिक सोच से लड़ना ज्यादा कठिन
चेन्नई में 1986 में जब एक सेक्स वर्कर की भारत के पहले एड्स रोगी के रूप में पहचान हुई थी, तब पूरे देश के सामने एक नई चुनौती ने दस्तक दी थी। यह चुनौती थी पूरी दुनिया में महामारी की तरह फैल रहे इस रोग का देश में इलाज उपलब्ध कराना और इसके प्रसार की रोकथाम। 1996 में एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी, बाद में हाइली एक्टिव एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी की खोज, देश में उपलब्धता और एड्स के इलाज में इसके सकारात्मक असर ने चिकित्सकीय चुनौती का मोर्चा काफी हद तक फतह कर लिया लेकिन अब भी भारत में इस रोग को हराने में सामाजिक चुनौतियां पहाड़ की तरह खड़ी हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) ने कुछ महीने पहले जो आंकड़ें जारी किये, उनके अनुसार 2004 के बाद से वयस्कों में एचआईवी पॉजिटिव और एड्स के मामले कम हो गये हैं। नये मामले सामने आने की दर में 56 फीसद की गिरावट आयी है। 2004 में कुल जनसंख्या की 0.41 फीसद एचआईवी व एड्स संक्रमित थी और 2008 में यह आंकड़ा 0.29 फीसद रहा। ये आंकड़ें सुखद लगते हैं लेकिन शंका भी पैदा करते हैं कि इस संक्रमण से पीड़ित लोगों का सामाजिक- आर्थिक स्तर पर जो हश्र सामने आ रहा है, उसकी वजह से तो लोग अपनी बीमारी तो नहीं छिपा रहे हैं? गोरखपुर में एक एड्स पीड़ित ट्रक ड्राइवर की मौत के बाद उसकी पत्नी व बच्चों को गांव से निकाल देने की घटना हो या जौनपुर में एड्स पीड़ित पत्नी को तलाक देने या फिर मुम्बई में इस संक्रमण से ग्रस्त मैनेजर से इस्तीफा लेने के मामले, ये इस रोग के प्रति कम जानकारी और पुरातन सोच को आईना दिखाते हैं। यूनीसेफ के अनुसार भारत में एचआईवी पॉजिटिव और एड्स रोगियों में 39 फीसद महिलाएं हैं। चिंताजनक यह है कि ये महिलाएं जाने-अनजाने बच्चे पैदा कर उन्हें संक्रमण दे रही हैं। सामाजिक तिरस्कार के डर से संक्रमित महिलाएं इलाज के लिए आगे नहीं आतीं। अनेक महिलाओं को अपने संक्रमण के बारे में पता ही नहीं होता है क्योंकि परदेस (अन्य राज्यों व खाड़ी देशों) से कमा कर लौटे उनके पति उन्हें ये संक्रमण देकर वापस लौट जाते हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 22 लाख बच्चे इस संक्रमण से ग्रस्त हैं और हर साल एचआईवी पॉजिटिव माताओं की कोख से जन्म लेकर 55 से 60 हजार बच्चे इस आंकड़ें को बढ़ाते जा रहे हैं। ये आंकड़ें भयावह भविष्य की तस्वीर पेश करते हैं। एक और आंकड़ा चिंता पैदा करता है कि एचआईवी पॉजिटिव और एड्स रोगियों में 35 फीसद 25 वर्ष से कम उम्र के हैं। संक्रमण के नये मामलों में 50 फीसद पीड़ित लोग 15 से 24 वर्ष के हैं। इस रोग के प्रसार की गति देखते हुए कहा जा सकता है कि दुनिया के और देश एड्स पर नियंतण्रपाने में हमसे काफी आगे चल रहे हैं लेकिन हमारे समाज की पुरातनपंथी सोच हर कदम पर आड़े आ रही है। भारत में एड्स रोग की दस्तक के 25 साल बाद भी एचआईवी पॉजिटिव और एड्स पीड़ित सामने आने से डरते हैं। हजार में एक रोगी ही अपनी पहचान का खुलासा करता है। दरअसल, माना जाता है कि एड्स पीड़ित का आचरण अनैतिक होगा, तभी उसे यह रोग हुआ। इसे लेकर अब भी अनेक भ्रम और भ्रांतियां हैं। डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में मान्यता है कि एड्स नैतिक गलती का परिणाम है। यानी जिसे एड्स हुआ या जो एचआईवी पॉजिटिव है, उसका आचरण नैतिकता की सीमा तोड़ चुका है। माना जाता है कि या तो वह सेक्स वर्कर के पास गया होगा, या उसके पत्नी/पति से अलग किसी और से शारीरिक सम्बन्ध हैं या वह होमोसेक्सुअल है। इसी कारण लोग जांच कराने में हिचकते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव हुई तो कैसे सबका सामना करेंगे? एड्स-सोशल डिस्क्रिमिनेशन पर जारी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि धन के अभाव में इलाज न कराने वालों से चार गुना ज्यादा लोग इस भय से इलाज नहीं कराते हैं कि लोग जान जाएंगे। सरकारी स्तर पर 1987 में नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम लांच हुआ। इसके पहले चक्र में रक्त जांच और स्वास्थ्य शिक्षा पर जोर रहा। बावजूद इसके नब्बे के दशक में कोई भी ऐसा राज्य नहीं बचा, जहां इसके मरीज न मिले हों। रोग के फैलाव को देखते हुए नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के दूसरे चक्र में लोगों से व्यवहार में बदलाव लाकर एचआईवी का प्रसार रोकने सम्बन्धी प्रचार किया गया। इसमें निर्धारित सेंटर पर नि:शुल्क एंटी रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट की सुविधा दी भी गयी। तीसरे चक्र में हाई रिस्क ग्रुप (सेक्स वर्कर, मैन टू मैन सेक्स, ड्रग इंजेक्टर आदि) पर फोकस किया गया। अब जिस तरह यह जनसामान्य में फैल रहा है, इसे देखते हुए पूरी जनसंख्या लक्षित कर अभियान चलाने की जरूरत है। अखबारों की सुर्खियां बनते एड्स पीड़ितों के प्रति भेदभाव के समाचार पढ़कर यही लगता है कि मंजिल अभी दूर है। हम एचआईवी पॉजिटिव रोगी को नैतिक तौर पर अपराधी घोषित करने से बाज आएं और उसे सामान्य जीवन जीने में सहयोग करें।
Tuesday, November 1, 2011
क्या है भारत का हाल
हर मिनट में पैदा होते हैं 51 बच्चे 2050 तक भारत की आबादी एक अरब 70 करोड़ (अनुमानित) वर्तमान आबादी 121 करोड़ (2011 की जनगणना के अनुसार) 62 करोड़ पुरु ष, 58 करोड़ महिलाएं दस वर्षो में भारत की जनसंख्या 17.6 फीसद बढ़ी दस वर्षो में लिंगानुपात 933 से बढ़कर 940 हो गया बच्चों का लिंगानुपात स्वतंत्र भारत के सबसे निचले स्तर पर कुल जनसंख्या में बच्चों का आंकड़ा 3 फीसदी घटा जनसंख्या के आधार पर उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य
Monday, October 31, 2011
पिछले वर्ष 5,484 बच्चे हुए यौन उत्पीड़न के शिकार
सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में 5,484 बच्चों से यौन र्दुव्यवहार और 1,408 अन्य की हत्या होने के मामले सामने आए। बच्चों के खिलाफ हुए अपराध की खराब तस्वीर पेश करते राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10,670 बच्चों का या तो अपहरण कर लिया गया या फिर उन्हें बंधक बना लिया गया। उत्तर प्रदेश में 315 बच्चों की हत्या कर दी गई, जबकि मध्य प्रदेश में 1,182 बच्चों के साथ यौन र्दुव्यवहार हुआ। अपराध की इन दोनों ही श्रेणियों में इन दो राज्यों में सर्वाधिक मामले सामने आए। आंकड़ों के अनुसार, बच्चों की हत्या के महाराष्ट्र में 211, बिहार में 200 और मध्य प्रदेश में 124 मामले सामने आए। पिछले वर्ष महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में बच्चों से यौन उत्पीड़न के क्र मश: 747, 451 और 446 मामले सामने आए। इसी तरह छत्तीसगढ़ और राजस्थान में क्र मश: 382 और 369 मामले देखे गए। दिल्ली में वर्ष 2010 में 29 बच्चों की हत्या हुई और 304 अन्य का बलात्कार हुआ। बच्चों के अपहरण के सबसे ज्यादा 2,982 मामले दिल्ली में हुए। इस तरह की बिहार में 1,359, उत्तर प्रदेश में 1,225, महाराष्ट्र में 749, राजस्थान में 706, आंध्र प्रदेश में 581 और गुजरात में 565 घटनाएं हुईं। हिंसक अपराधों में अव्वल रहे यूपी और बिहार : राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में हिंसक अपराधों में हुई मौत में उत्तर प्रदेश और बिहार शीर्ष पर रहे। इन दोनों राज्यों में एक साल में कुल 7,800 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल पूरे देश में ऐसे अपराधों में 33,908 लोगों की मौत हुई है। मरने वालों में करीब 50 प्रतिशत (15,787) युवा (18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के) हैं। मरने वाले युवाओं में 4,207 युवतियां थीं। ब्यूरो के अनुसार अगर राज्यों अनुसार देखें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 4,456 लोगों की मौत हुई है। दूसरे स्थान पर बिहार है जहां 3,362 लोग मारे गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र (2,837), आंध्रप्रदेश (2,538) और मध्यप्रदेश (2,441) का स्थान आता है। इस दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ऐसी घटनाओं में 119 महिलाओं समेत 577 लोग मारे गए हैं। ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक, वर्ष 2010 में ऐसी घटनाओं में शून्य से 10 साल की उम्र वर्ग में 343 लड़कियों समेत 727 बच्चों की मौत हुई है।
देश के विभिन्न हिस्सों में 5,484 बच्चों से यौन र्दुव्यवहार और 1,408 अन्य की हत्या होने के मामले सामने आए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10,670 बच्चों का या तो अपहरण कर लिया गया या फिर उन्हें बंधक बना लिया गया यूपी में 315 बच्चों की हत्या कर दी गई, जबकि मध्य प्रदेश में 1,182 बच्चों के साथ यौन र्दुव्यवहार हुआ महाराष्ट्र, यूपी और आंध्र में बच्चों से यौन उत्पीड़न के क्र मश: 747, 451 और 446 मामले सामने आए बच्चों के अपहरण के सबसे ज्यादा 2,982 मामले दिल्ली में हुएFriday, October 14, 2011
असहाय वृद्ध किसकी जिम्मेदारी!
इस साल एक अक्टूबर को वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर अखबारों में वृद्धजनों की समस्याओं पर ढेर सारी सामग्री प्रकाशित हुई। वृद्धजन आज कितने असहाय और असुरक्षित हो चले हैं, इसका अलग-अलग कोणों से विवरण था। कही संयुक्त परिवारों का टूटना कारण था तो कहीं बच्चों के संकीर्ण, स्वार्थी हो जाने को कारण बताया गया। इसमें दो राय नहीं कि हमारे समाज में भी बड़ी संख्या में वृद्ध और अशक्त लोग उपेक्षित और बेसहारा हैं। कहीं बच्चे साथ नहीं दते हैं तो कहीं अकेले पाकर घरेलू नौकरों द्वारा मार दिए जाते हैं। लेकिन पूरी समस्या का विश्लेषण यदि नैतिकता तथा भावनात्मक आधार पर किया जाए तो समाधान के रूप में सिर्फ नसीहतें ही सामने आती हैं। जीवन का आखिरी पड़ाव सम्मानजनक और सुरक्षित बीते, इसके लिए अनेक स्तर पर विचार की जरूरत है। हर व्यक्ति इस पड़ाव में प्रवेश करने से पहले यथासंभव अपनी तैयारी और योजनाएं बनाकर रखे। दूसरे यह भी आम स्वीकृत धारणा है कि बच्चों को माता-पिता और वृद्धजनों की जिम्मेदारी वहन करनी चाहिए। याद रहे कि इस सिलसिले में एक विधेयक भी देश की संसद द्वारा पारित किया गया है जिसके अन्तर्गत माता-पिता या आश्रित वृद्धों को कोई व्यक्ति त्यागने के इरादे से कहीं छोड़ देता है तो उसे तीन महीने की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माना दोनों दंड दिये जा सकते हैं। इस ‘माता-पिता बुजुर्ग अभिभावक देखरेख एवं कल्याण विधेयक 2007’ मे भारतीय समाज ओैर पारंपारिक मूल्यों के तहत बुजुगरें की देखभाल पर जोर दिया गया है। बिल पारित करते वक्त कहा गया था कि संयुक्त परिवार व्यवस्था टूटने से बड़े पैमाने पर उनके परिवार के लोग ध्यान नही दे रहे हैं जिसके कारण बहुत से वृद्ध खासकर विधवाएं भावनात्मक उपेक्षा तथा विपन्न जीवन जीने को मजबूर हैं। ध्यान रहे कि बच्चों द्वारा उठायी जाने वाली जिम्मेदारियों के मामले में हमारा समाज लड़के और लड़की के रूप भेदभावपूर्ण ढंग से सोचता है। अमूमन माना जाता है कि माता-पिता की देखभाल लड़के की जिम्मेदारी है। हाल में दिल्ली के पीतमपुरा के 76 वर्षीय किरन नांगरे का मामला सामने आया। किरन की बेटी मधु पाल ने लन्दन से दिल्ली पुलिस के सीनियर सिटिजन सेल में ऑनलाइन शिकायत की कि उसकी भाभी पूनम अपनी सास यानी उसकी मां की ठीक से देखभाल नहीं करती है। यह ठीक है कि बहू को अपनी सास की देखभाल करनी चाहिए, लेकिन क्या उससे अधिक जवाबदेही बेटी मधु की नहीं बनती? सजा की जहां तक बात है तो वह मधु पाल को भी मिलनी चाहिए। हालांकि यह भी सच है कि माता-पिता की सम्पत्ति पर बेटे-बहू का ही कब्जा रहता है और निर्णय भी माता-पिता को करना होता है कि वे अपनी संतानों के बीच सम्पत्ति का बंटवारा किस तरह करेंगे। कुछ महीने पहले बुजुगरें के लिए काम करनेवाली संस्था हेल्प एज इंडिया ने कुछ महानगरों में वृद्धों की स्थिति पर सव्रेक्षण कराया था। पाया गया कि देश में औसतन 72 फीसद माता-पिता अपने बेटों के साथ रहते हैं। मुम्बई में 86 फीसद वृद्ध अपने बेटे के साथ रहते हैं। सिर्फ चेन्नई एकमात्र ऐसा शहर है जहां 22 फीसद वृद्ध अपनी बेटी के साथ रहते हैं। सवाल है कि क्या बेटियों के लिए यह मुद्दा विचारणीय नहीं होना चाहिए कि उनके अपने घर में माताप्िाता के लिए भी स्थान होगा या नहीं? या कि वे सिर्फ भावनात्मक सहयोग ही करेंगी? तीसरा और सबसे बड़ा मुद्दा सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का है जो जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकार की है। प्रशासन को बाध्य किया जाना चाहिए कि जिला या ब्लॉक स्तर पर इसकी सख्त निगरानी हो कि वृद्ध किसी मुसीबत में तो नही हैं। हेल्पएज इंडिया के सव्रेक्षण में यह बात सामने आयी थी कि 98 फीसद वृद्ध प्रताड़नाओं के बावजूद अपनी सन्तानों के खिलाफ शिकायत नहीं करते हैं। लेकिन मामला जटिल है। उसे सिर्फ परिवार या बच्चों के मत्थे मढ़कर सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अशक्त लोगों के जरूरी खच्रे की जिम्मेदारी उठाये? संविधान के अनुच्छेद 41 में भी वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता दिए जाने की बात है। लेकिन वह नीतिनिर्देशक तत्व के अन्तर्गत है। इसे प्रभावी बनाते हुए सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी हो। संविधान की धारा 21 हर नागरिक को सम्मानजन जीवन जीने का अधिकार देती है। वह सम्मान कैसे प्राप्त होगा, यह मूल मुद्दा है। क्या यह सिर्फ परिवार के अन्दर की व्यवस्था से ठीक होगा या इसका राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए? पश्चिम के अनेक घोर पूंजीवादी देशों में भी व्यवस्था है कि कोई असहाय रूप में धूल-धूप- भूख से प्राण न त्यागे। हालांकि उन्हें भी (और हमें भी) घर के अन्दर के गैर-बराबरीपूर्ण रिश्ते समाप्त करने तथा सदस्यों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। बहरहाल, यह सदिच्छा मूल्यों में कैसे समाहित हो इसके लिए प्रयास होना चाहिए। लेकिन नागरिक अधिकारों की गारंटी तो राज्य को ही सुनिश्चित करनी होगी।
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