परिवार नियोजन कार्यक्रम को सकारात्मक नजरिए से देखा जाता रहा है लेकिन आबादी नियंतण्रकी इस आड़ में, खासकर पढ़े-लिखे लोग जिस अनैतिक ढंग से कन्या भ्रूण हत्या को अंजाम दे रहे हैं, वह किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। बहाना महंगाई की मार को दिया जाता है लेकिन संतान को सीमित रखने की यह विवशता लड़कियों के लिए मारक साबित हो रही है। ‘सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च’ का यह सव्रेक्षण इसकी पुष्टि के लिए काफी है। इसके मुताबिक बीते तीन दशकों में बेहद नियोजित तरीके से लगभग सवा करोड़ बच्चियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई। विपरीत तर्क होगा कि इसमें नया क्या है? लड़कियों की पहचान तो सदियों से हमारे देश में अनचाही संतान के बतौर रही है लेकिन इस सव्रेक्षण के नतीजे कन्या भ्रूण हत्या के जिन नए पहलुओं पर रोशनी डालते हैं, वे पढ़े-लिखे तबके के जेहनी अंधकार की हकीकत बयान करते हैं। इस सव्रे में ढाई लाख शिशुओं के जन्म का गहन निरीक्षण किया गया और खास ध्यान परिवारों के दूसरे बच्चे पर आधारित लिंगानुपात पर केंद्रित किया गया। नतीजा यह मिला कि जिन परिवारों में पहली संतान लड़की थी, उनमें वर्ष 1990 में कन्या जन्म दर प्रति हजार लड़कों के मुकाबले महज 906 ही रही। अधिक खौफनाक यह कि वर्ष 2005 के आते-आते कन्या जन्म का औसत 836 के बेहद असंतुलित आंकडे तक पहुंच गया। जबकि जिन परिवारों में पहली संतान लड़के थे, उनमें ऐसी असंगति नदारद थी। यह रपट हमारे उस भ्रम को भी तोड़ती है कि अशिक्षा कन्या जन्म के प्रति अनिच्छा का प्रमुख आधार है। इसके अनुसार अजन्मी लड़कियों से नियोजित छुटकारे की चाह उन परिवारों में अधिक देखी गई जो खाते-पीते कहे जाते हैं और जहां माएं सिर्फ साक्षर ही नहीं बल्कि शिक्षित भी हैं। डरावनी सचाइयों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। रिपोर्ट यह भी बयान करती है कि वर्ष 1991 में केवल देश की दस फीसद आबादी उन राज्यों की निवासी थी जहां प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 915 तक थी लेकिन 2001 में यह तादाद बढ़कर 27 फीसद और 2011 में तो बेहद चिंतनीय 56 फीसद तक पहुंच गई। यानी फिलहाल, हमारी आधी से अधिक आबादी में लड़कियां न केवल अल्पसंख्यक हैं बल्कि उन्हें सीमित रखने की कोशिशें भी जारी हैं। जाहिर है, नारी के भौतिक और आध्यात्मिक वजूद को सराहने और पूजने का दिखावा करने वाला हमारा समाज हकीकत में उनके प्रति आपराधिक हद तक असहिष्णु होता जा रहा है। वैसे तो दूर बैठे और भारत पर सतही नजर रखने वाले व्यक्ति के लिए इस सचाई को पचाना मुमकिन नहीं क्योंकि जिस देश में राष्ट्राध्यक्ष, सत्ताधारी दल के शीर्ष पद और नेता विपक्ष के पदों पर महिलाएं आसीन हों; वहां समाज और व्यवस्था की नारी-हितैषी छवि को दूसरे प्रमाण की दरकार नहीं। यदि नजर जयललिता, मायावती या ममता जैसी सशक्त नेताओं तक पहुंच जाए तो लड़कियों के प्रति अन्याय की सचाई सिरे से बेबुनियाद लगेगी। लेकिन दुर्भाग्य से हकीकत हमेशा आवरण से कहीं परे होती है। इसीलिए अजन्मी बच्चियों की चीख शायद हमें सुनाई नहीं देती। यदि गौर से सुने तो वे यही कहतीं मिलेंगी कि महिला आरक्षण बाद में, पहले हमारे वजूद में आने का इंतजाम तो करो।
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