चेन्नई में 1986 में जब एक सेक्स वर्कर की भारत के पहले एड्स रोगी के रूप में पहचान हुई थी, तब पूरे देश के सामने एक नई चुनौती ने दस्तक दी थी। यह चुनौती थी पूरी दुनिया में महामारी की तरह फैल रहे इस रोग का देश में इलाज उपलब्ध कराना और इसके प्रसार की रोकथाम। 1996 में एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी, बाद में हाइली एक्टिव एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी की खोज, देश में उपलब्धता और एड्स के इलाज में इसके सकारात्मक असर ने चिकित्सकीय चुनौती का मोर्चा काफी हद तक फतह कर लिया लेकिन अब भी भारत में इस रोग को हराने में सामाजिक चुनौतियां पहाड़ की तरह खड़ी हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) ने कुछ महीने पहले जो आंकड़ें जारी किये, उनके अनुसार 2004 के बाद से वयस्कों में एचआईवी पॉजिटिव और एड्स के मामले कम हो गये हैं। नये मामले सामने आने की दर में 56 फीसद की गिरावट आयी है। 2004 में कुल जनसंख्या की 0.41 फीसद एचआईवी व एड्स संक्रमित थी और 2008 में यह आंकड़ा 0.29 फीसद रहा। ये आंकड़ें सुखद लगते हैं लेकिन शंका भी पैदा करते हैं कि इस संक्रमण से पीड़ित लोगों का सामाजिक- आर्थिक स्तर पर जो हश्र सामने आ रहा है, उसकी वजह से तो लोग अपनी बीमारी तो नहीं छिपा रहे हैं? गोरखपुर में एक एड्स पीड़ित ट्रक ड्राइवर की मौत के बाद उसकी पत्नी व बच्चों को गांव से निकाल देने की घटना हो या जौनपुर में एड्स पीड़ित पत्नी को तलाक देने या फिर मुम्बई में इस संक्रमण से ग्रस्त मैनेजर से इस्तीफा लेने के मामले, ये इस रोग के प्रति कम जानकारी और पुरातन सोच को आईना दिखाते हैं। यूनीसेफ के अनुसार भारत में एचआईवी पॉजिटिव और एड्स रोगियों में 39 फीसद महिलाएं हैं। चिंताजनक यह है कि ये महिलाएं जाने-अनजाने बच्चे पैदा कर उन्हें संक्रमण दे रही हैं। सामाजिक तिरस्कार के डर से संक्रमित महिलाएं इलाज के लिए आगे नहीं आतीं। अनेक महिलाओं को अपने संक्रमण के बारे में पता ही नहीं होता है क्योंकि परदेस (अन्य राज्यों व खाड़ी देशों) से कमा कर लौटे उनके पति उन्हें ये संक्रमण देकर वापस लौट जाते हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 22 लाख बच्चे इस संक्रमण से ग्रस्त हैं और हर साल एचआईवी पॉजिटिव माताओं की कोख से जन्म लेकर 55 से 60 हजार बच्चे इस आंकड़ें को बढ़ाते जा रहे हैं। ये आंकड़ें भयावह भविष्य की तस्वीर पेश करते हैं। एक और आंकड़ा चिंता पैदा करता है कि एचआईवी पॉजिटिव और एड्स रोगियों में 35 फीसद 25 वर्ष से कम उम्र के हैं। संक्रमण के नये मामलों में 50 फीसद पीड़ित लोग 15 से 24 वर्ष के हैं। इस रोग के प्रसार की गति देखते हुए कहा जा सकता है कि दुनिया के और देश एड्स पर नियंतण्रपाने में हमसे काफी आगे चल रहे हैं लेकिन हमारे समाज की पुरातनपंथी सोच हर कदम पर आड़े आ रही है। भारत में एड्स रोग की दस्तक के 25 साल बाद भी एचआईवी पॉजिटिव और एड्स पीड़ित सामने आने से डरते हैं। हजार में एक रोगी ही अपनी पहचान का खुलासा करता है। दरअसल, माना जाता है कि एड्स पीड़ित का आचरण अनैतिक होगा, तभी उसे यह रोग हुआ। इसे लेकर अब भी अनेक भ्रम और भ्रांतियां हैं। डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में मान्यता है कि एड्स नैतिक गलती का परिणाम है। यानी जिसे एड्स हुआ या जो एचआईवी पॉजिटिव है, उसका आचरण नैतिकता की सीमा तोड़ चुका है। माना जाता है कि या तो वह सेक्स वर्कर के पास गया होगा, या उसके पत्नी/पति से अलग किसी और से शारीरिक सम्बन्ध हैं या वह होमोसेक्सुअल है। इसी कारण लोग जांच कराने में हिचकते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव हुई तो कैसे सबका सामना करेंगे? एड्स-सोशल डिस्क्रिमिनेशन पर जारी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि धन के अभाव में इलाज न कराने वालों से चार गुना ज्यादा लोग इस भय से इलाज नहीं कराते हैं कि लोग जान जाएंगे। सरकारी स्तर पर 1987 में नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम लांच हुआ। इसके पहले चक्र में रक्त जांच और स्वास्थ्य शिक्षा पर जोर रहा। बावजूद इसके नब्बे के दशक में कोई भी ऐसा राज्य नहीं बचा, जहां इसके मरीज न मिले हों। रोग के फैलाव को देखते हुए नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के दूसरे चक्र में लोगों से व्यवहार में बदलाव लाकर एचआईवी का प्रसार रोकने सम्बन्धी प्रचार किया गया। इसमें निर्धारित सेंटर पर नि:शुल्क एंटी रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट की सुविधा दी भी गयी। तीसरे चक्र में हाई रिस्क ग्रुप (सेक्स वर्कर, मैन टू मैन सेक्स, ड्रग इंजेक्टर आदि) पर फोकस किया गया। अब जिस तरह यह जनसामान्य में फैल रहा है, इसे देखते हुए पूरी जनसंख्या लक्षित कर अभियान चलाने की जरूरत है। अखबारों की सुर्खियां बनते एड्स पीड़ितों के प्रति भेदभाव के समाचार पढ़कर यही लगता है कि मंजिल अभी दूर है। हम एचआईवी पॉजिटिव रोगी को नैतिक तौर पर अपराधी घोषित करने से बाज आएं और उसे सामान्य जीवन जीने में सहयोग करें।
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