Friday, October 14, 2011

असहाय वृद्ध किसकी जिम्मेदारी!

इस साल एक अक्टूबर को वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर अखबारों में वृद्धजनों की समस्याओं पर ढेर सारी सामग्री प्रकाशित हुई। वृद्धजन आज कितने असहाय और असुरक्षित हो चले हैं, इसका अलग-अलग कोणों से विवरण था। कही संयुक्त परिवारों का टूटना कारण था तो कहीं बच्चों के संकीर्ण, स्वार्थी हो जाने को कारण बताया गया। इसमें दो राय नहीं कि हमारे समाज में भी बड़ी संख्या में वृद्ध और अशक्त लोग उपेक्षित और बेसहारा हैं। कहीं बच्चे साथ नहीं दते हैं तो कहीं अकेले पाकर घरेलू नौकरों द्वारा मार दिए जाते हैं। लेकिन पूरी समस्या का विश्लेषण यदि नैतिकता तथा भावनात्मक आधार पर किया जाए तो समाधान के रूप में सिर्फ नसीहतें ही सामने आती हैं। जीवन का आखिरी पड़ाव सम्मानजनक और सुरक्षित बीते, इसके लिए अनेक स्तर पर विचार की जरूरत है। हर व्यक्ति इस पड़ाव में प्रवेश करने से पहले यथासंभव अपनी तैयारी और योजनाएं बनाकर रखे। दूसरे यह भी आम स्वीकृत धारणा है कि बच्चों को माता-पिता और वृद्धजनों की जिम्मेदारी वहन करनी चाहिए। याद रहे कि इस सिलसिले में एक विधेयक भी देश की संसद द्वारा पारित किया गया है जिसके अन्तर्गत माता-पिता या आश्रित वृद्धों को कोई व्यक्ति त्यागने के इरादे से कहीं छोड़ देता है तो उसे तीन महीने की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माना दोनों दंड दिये जा सकते हैं। इस माता-पिता बुजुर्ग अभिभावक देखरेख एवं कल्याण विधेयक 2007’ मे भारतीय समाज ओैर पारंपारिक मूल्यों के तहत बुजुगरें की देखभाल पर जोर दिया गया है। बिल पारित करते वक्त कहा गया था कि संयुक्त परिवार व्यवस्था टूटने से बड़े पैमाने पर उनके परिवार के लोग ध्यान नही दे रहे हैं जिसके कारण बहुत से वृद्ध खासकर विधवाएं भावनात्मक उपेक्षा तथा विपन्न जीवन जीने को मजबूर हैं। ध्यान रहे कि बच्चों द्वारा उठायी जाने वाली जिम्मेदारियों के मामले में हमारा समाज लड़के और लड़की के रूप भेदभावपूर्ण ढंग से सोचता है। अमूमन माना जाता है कि माता-पिता की देखभाल लड़के की जिम्मेदारी है। हाल में दिल्ली के पीतमपुरा के 76 वर्षीय किरन नांगरे का मामला सामने आया। किरन की बेटी मधु पाल ने लन्दन से दिल्ली पुलिस के सीनियर सिटिजन सेल में ऑनलाइन शिकायत की कि उसकी भाभी पूनम अपनी सास यानी उसकी मां की ठीक से देखभाल नहीं करती है। यह ठीक है कि बहू को अपनी सास की देखभाल करनी चाहिए, लेकिन क्या उससे अधिक जवाबदेही बेटी मधु की नहीं बनती? सजा की जहां तक बात है तो वह मधु पाल को भी मिलनी चाहिए। हालांकि यह भी सच है कि माता-पिता की सम्पत्ति पर बेटे-बहू का ही कब्जा रहता है और निर्णय भी माता-पिता को करना होता है कि वे अपनी संतानों के बीच सम्पत्ति का बंटवारा किस तरह करेंगे। कुछ महीने पहले बुजुगरें के लिए काम करनेवाली संस्था हेल्प एज इंडिया ने कुछ महानगरों में वृद्धों की स्थिति पर सव्रेक्षण कराया था। पाया गया कि देश में औसतन 72 फीसद माता-पिता अपने बेटों के साथ रहते हैं। मुम्बई में 86 फीसद वृद्ध अपने बेटे के साथ रहते हैं। सिर्फ चेन्नई एकमात्र ऐसा शहर है जहां 22 फीसद वृद्ध अपनी बेटी के साथ रहते हैं। सवाल है कि क्या बेटियों के लिए यह मुद्दा विचारणीय नहीं होना चाहिए कि उनके अपने घर में माताप्िाता के लिए भी स्थान होगा या नहीं? या कि वे सिर्फ भावनात्मक सहयोग ही करेंगी? तीसरा और सबसे बड़ा मुद्दा सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का है जो जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकार की है। प्रशासन को बाध्य किया जाना चाहिए कि जिला या ब्लॉक स्तर पर इसकी सख्त निगरानी हो कि वृद्ध किसी मुसीबत में तो नही हैं। हेल्पएज इंडिया के सव्रेक्षण में यह बात सामने आयी थी कि 98 फीसद वृद्ध प्रताड़नाओं के बावजूद अपनी सन्तानों के खिलाफ शिकायत नहीं करते हैं। लेकिन मामला जटिल है। उसे सिर्फ परिवार या बच्चों के मत्थे मढ़कर सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अशक्त लोगों के जरूरी खच्रे की जिम्मेदारी उठाये? संविधान के अनुच्छेद 41 में भी वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता दिए जाने की बात है। लेकिन वह नीतिनिर्देशक तत्व के अन्तर्गत है। इसे प्रभावी बनाते हुए सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी हो। संविधान की धारा 21 हर नागरिक को सम्मानजन जीवन जीने का अधिकार देती है। वह सम्मान कैसे प्राप्त होगा, यह मूल मुद्दा है। क्या यह सिर्फ परिवार के अन्दर की व्यवस्था से ठीक होगा या इसका राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए? पश्चिम के अनेक घोर पूंजीवादी देशों में भी व्यवस्था है कि कोई असहाय रूप में धूल-धूप- भूख से प्राण न त्यागे। हालांकि उन्हें भी (और हमें भी) घर के अन्दर के गैर-बराबरीपूर्ण रिश्ते समाप्त करने तथा सदस्यों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। बहरहाल, यह सदिच्छा मूल्यों में कैसे समाहित हो इसके लिए प्रयास होना चाहिए। लेकिन नागरिक अधिकारों की गारंटी तो राज्य को ही सुनिश्चित करनी होगी।

No comments:

Post a Comment