किसी भी सभ्य समाज और राष्ट्र के लिए बच्चे थाती होते हैं। इनकी अनदेखी कर समाज व राष्ट्र को समृद्ध और ताकतवर नहीं बनाया जा सकता। लेकिन सच तो यह है कि देश के इन भावी कर्णधारों का जीवन संकट में फंसता जा रहा है। समाज व सरकार की अतिसक्रियता के बाद भी बच्चों पर होने वाली ज्यादतियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। वैसे तो संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 में मानव तस्करी व बलात् श्रम के अलावा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने या अन्य जोखिम भरे काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाया गया हैं। लेकिन तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी बच्चों की तस्करी के साथ- साथ उनसे बेगार लेने का काम यथावत जारी है। 1976 के बंधुआ मजदूरी उन्मूलन एक्ट के बावजूद भी बच्चे बंधुआ जीवन जीने को अभिशप्त हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास बंधुआ मजदूरी के एक दो नहीं हजारों मामले दर्ज हैं लेकिन गुनाहगारों के खिलाफ सरकार सख्ती नहीं दिखा रही है। पिछले दिनों आयी मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल तकरीबन 40 हजार बच्चों का अपहरण हो जाता है और त्रासदी यह कि इनमें से एक चौथाई बच्चों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिल पाती है। इस अर्थ में देखा जाए तो भारत दुनिया के उन खतरनाक देशों में शुमार हो गया है जहां बच्चों की तस्करी आम बात होती है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में 14 साल के कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिक भारत में मौजूद हैं। इसके अलावा बच्चों के यौन शोषण का मामला भी गहराता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि सरकार इन सामाजिक बुराईयों से अवगत नहीं है लेकिन वह इन दुप्रवृत्तियों पर रोक लगाने में असमर्थ साबित हो रही है। हालांकि पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बाल यौन शोषण पर रोक लगाने से संबंधित एक विधेयक को मंजूरी दी लेकिन समाज की जड़ में पहुंच चुकी बुक्षईयों को खत्म करने के लिए ऐसे विधेयक अभी नाकाफी ही कहे जाएंगे। महज कानूनी दंड के भय से सामाजिक बुराईयों और आपराधिक कृत्यों पर विराम लगना संभव नहीं है, अगर ऐसा होता तो बालश्रम कानून लागू होने के बाद बच्चों पर होने वाले अत्याचारों में कमी देखी जाती। लेकिन स्थिति भिन्न है। सच तो यह है कि कानून का निर्माण तो हो रहा है लेकिन उसका पालन नहीं। दूरदृष्टि रखने वाले समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए समुचित वातावरण का निर्माण करे। लेकिन आजादी के छह दशक गुजर जाने के बाद भी देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कोई कारगर नीति अभी तक अमल में नहीं लायी जा सकी है। विकास के पथ पर अग्रसर बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर मान्यता मिलने के बाद भी बच्चों की मौत के मामले में हम वि में शीर्ष पर खड़े हैं। हर साल देश में पांच साल से कम उम्र के 20 लाख बच्चों की असामयिक मौत हो जाती है। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों के 90 फीसद मामले निमोनिया और डायरिया जैसी आसान रोकथाम वाली बीमारियों से जुड़े होते हैं। इस संस्था ने यह भी कहा है कि भारत में दुनिया के कुपोषित बच्चों की एक तिहाई संख्या बसती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट पर यकीन करें तो दुनिया भर में तकरीबन 15 करोड़ से अधिक बच्चे खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे हैं और इनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की ही है। इन बच्चों में लड़कियों की स्थिति तो और भी भयावह और तकलीफदेह है। यूनिसेफ के ताजा अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब 10 करोड़ लड़कियां विभिन्न खतरनाक उद्योग धंधों में काम कर रहीं हैं। इनमें से कई ऐसी हैं जिनका इस्तेमाल वेश्यावृत्ति, अश्लील फिल्मों के निर्माण और सैन्य हमलों के लिए किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत की राजधानी दिल्ली में ही करीब पांच लाख बच्चे भिखारी, घरेलू नौकर और अनियमित श्रमिक के रूप में जीवन यापन कर रहे हैं। दिल्ली जैसे शहर में भिखारियों की संख्या एक लाख से अधिक है और जिनमें एक चौथाई तादात बच्चों की ही है। जब देश की राजधानी दिल्ली में कानूनी व्यवस्था अपना असर नहीं दिखा पा रही है तो दूरदराज क्षेत्रों में बच्चों के साथ क्या गुजरती होगी इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। अब तो गलत कायरे को अंजाम दिलाने के लिए बच्चे साफ्ट टारगेट बनते जा रहे हैं। हथियारों की तस्करी से लेकर मादक पदाथरे की सप्लाई तक में बच्चों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इससे बच्चों में नशीले पदाथरे के सेवन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। सिर्फ यह कहना कि बालश्रम के लिए गरीबी, भूख और बदहाली ही जिम्मेदार है, उचित नहीं होगा। यह एक कारण हो सकता है। इसके अलावा समाज में जागरुकता की कमी, सामाजिक उत्तरदायित्व से मुंह चुराने की प्रवृत्ति और अपराधियों का दंड से बच निकलना भी अन्य प्रमुख कारण हैं। दुख की बात यह है कि समाज के जिम्मेदार कहे जाने वाले लोगों द्वारा बालश्रम, बच्चों की तस्करी, उनके यौन शोषण जैसी तमाम सामाजिक बुराईयों को लेकर गंभीर चिंता तो जताई जाती रही है लेकिन जमीनी तौर पर उनके संरक्षण के लिए कोई पुख्ता कार्य नहीं किया जा रहा है। अब तो गंभीर गोष्ठियां और सेमिनार भी शोशेबाजी लगने लगे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं बालश्रम, यौन शोषण और बच्चों की तस्करी के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई से लेकर सकारात्मक आंदोलन चलाए। अन्यथा कल के भारत की तस्वीर और धुंधली ही होगी।
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