Tuesday, December 28, 2010

सवाल है इस सोच का

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है कि वहां दो तरह की नागरिकता तय की जाए, वह भी कपड़ों के आधार पर। जाति, संप्रदाय, क्षेत्र या भाषा के आधार पर ऐसा भेदभाव अपने क्षुद्र स्वार्थ साधने के लिए अभी तक कुछ राजनेता जरूर करते रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत में नौकरशाही ने घोषित तौर पर ऐसा कभी नहीं किया। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता से पहले उसकी प्रकृति ऐसी ही रही है और उस पर बार-बार यह आरोप चस्पा किया जाता रहा है कि उसकी प्रेरणा का स्रोत ब्रिटिश अफसरशाही ही है। इसके बावजूद भारत की नौकरशाही ने कभी ऐसा कुछ किया हो, इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता है। नागरिकता के वर्गीकरण का यह काम पंजाब के जालंधर शहर में यूनियन बैंक के अधिकारियों ने किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूरों के लिए रुपये जमा कराने और भुगतान के लिए एक दिन नियत कर दिया है। इसके अलावा किसी और दिन वे बैंक से व्यवहार नहीं कर सकते और इसके पीछे तर्क यह है कि श्रमिकों की लंबी लाइन लगने से दूसरे लोगों को असुविधा होती है। हालांकि इस संबंध में कारण के रूप में सबसे पहले जो बात सामने आई, वह यह थी कि मजदूर गंदे कपड़े पहनकर आते हैं और इससे दूसरे ग्राहकों को परेशानी होती है। इनमें से किसी भी कारण के आधार पर भेदभाव करना, क्या सही ठहराया जा सकता है? यह उस पंजाब में हो रहा है, जहां आम जनता उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों का खुले दिल से स्वागत करती है। हालांकि जागरण द्वारा इस संबंध में समाचार प्रकाशित करने और इसकी चौतरफा निंदा होने के बाद बैंक प्रबंधन ने श्रमिकों को असुविधा के लिए खेद जताया है और सबके लिए समान सुविधाएं बहाल करने की बात की है, लेकिन सवाल यह है कि यह स्थिति आई ही क्यों? ऐसा उस स्थिति में होता रहा है, जबकि राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक का स्पष्ट निर्देश है कि गरीब लोगों को भी बैंकों से जोड़ा जाए। सवाल यह है कि क्या ऐसा व्यवहार गरीबों को बैंकों से जुड़ने देगा? पंजाब में चारों तरफ बैंक के इस व्यवहार की निंदा हो रही है। राज्यसभा सदस्य अविनाश राय खन्ना ने तो इस मामले को संसद में उठाने तक की बात कही है। पंजाब के श्रम और चिकित्सा शिक्षा व अनुसंधान मंत्री तीक्ष्ण सूद ने भी इस पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे बड़ा सामाजिक मसला बताया है और कहा है कि ऐसा भेदभाव सरासर गलत है। युवा अकाली दल के संरक्षक और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा है कि देश की सबसे बड़ी खूबसूरती इसके लोकतंत्र में है, जिसमें गरीब-अमीर सबके लिए समान अधिकार हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र और बलिया के सांसद नीरज शेखर तथा पश्चिमी दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र ने भी इस बैंक की ऐसी नीतियों को मानवता विरोधी बताया है। पंजाब के तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठन बैंक के ऐसे आदेशों के खिलाफ मुखर हो उठे हैं। उनका यह रोष कोई गैर वाजिब नहीं है। भारत का संविधान स्वीकार किए जाने के बाद से यह बात हजार बार कही जा चुकी है कि भारतीय संविधान ऐसे किसी आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है। इसके बावजूद कभी कहीं जाति-धर्म या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव की बात उठ जाती है, तो कभी राज्य या भाषा के नाम पर। अब तक ऐसा काम आम तौर पर राजनेताओं के वेश में क्षुद्र स्वार्थी तत्व करते रहे हैं। पूरा देश जानता है कि खुद को राजनेताओं कहने वाले ऐसे तत्वों की कोशिश हमेशा इन बातों में फंसाकर जनता को बरगलाने की होती है। वे घृणा के बीज बोकर वोटों की फसल काटने की कोशिश करते हैं। ऐसी स्थिति में मुख्य धारा के सभी राजनीतिक संगठन और बड़े राजनेता उनकी निंदा ही करते हैं। जनता भी ऐसे राजनेताओं की हकीकत जानती है और इसीलिए वह इनके बहकावे में नहीं आती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि क्षुद्र स्वार्थो के लिए घृणा फैलाकर राजनीतिक खेल खेलना कतई सही नहीं है। इस हिसाब से देखा जाए तो बैंक का यह कृत्य उनसे भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इससे यह साफ जाहिर होता है कि उनके मन में गरीब तबके के लोगों के प्रति कैसी घृणा भरी हुई है। ध्यान रहे, यूनियन बैंक का उद्घाटन वर्ष 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था, जो भेदभाव के धुर विरोधी थे। क्या यह संविधान की मूल भावना का अपमान नहीं है? भारतीय संविधान देश के नागरिकों के बीच किसी प्रकार के भेदभाव को अपराध मानता है और यहां संविधान ही संप्रभु है। इस तरह देखें तो सही मायने में यह देश की संप्रभुता का अपमान है। रुपये जमा न कराना भी क्या राष्ट्रीय मुद्रा का अपमान नहीं है? आखिर इससे क्या जाहिर होता है? यही न कि अपने राष्ट्र, संविधान और मुद्रा के प्रति हमारी अफसरशाही के मन में कोई सम्मान नहीं है? वह भी ऐसे समय में, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास के लिए पूरे विश्व के एक होने की बात चल रही हो। देशों के बजाय अंतरराष्ट्रीय संघों की मुद्राएं चलाई जा रही हों। यूरोप में तो यूरो चल ही रहा है, दक्षिण एशिया के लिए भी एक साझी मुद्रा की बात चल रही है। तब पिछड़ेपन की इस मानसिकता की वजह क्या है? आजादी के 60 वर्ष बाद तक ऐसी स्थिति बनी क्यों हुई है? इससे जाहिर होता है कि न केवल हमारी अफसरशाही, पूरी व्यवस्था ही अभी तक आभिजात्य मानसिकता से बाहर नहीं निकल सकी है। खासकर अफसरशाही ब्रिटिश दौर के हैंगओवर से उबर नहीं सकी है। हमारे ब्यूरोक्रेट आज भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वे जनता पर शासन के लिए नहीं, उसकी सेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं। चुनाव के बाद अधिकतर राजनेता भी इसी मूड में आ जाते हैं। असंतुलित विकास भी इसका ही नतीजा है। सच तो यह है कि आजादी के 60 साल बाद तक हमारे देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसी समस्याएं समाधान की स्थिति से बहुत दूर दिखाई देती हैं। न तो नौकरशाही ने इस पर कभी ईमानदारी से सोचने की जहमत उठाई और न राजनेताओं ने ही। आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो अहम पदों पर बैठे लोग अपनी संपत्ति की घोषणा करने से ही डर रहे हैं और दूसरी ओर आम जनता दिन-प्रतिदिन लगातार गरीब होती जा रही है? इस सभी मसलों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है। देश और जनता की दुर्दशा की एक बड़ी वजह अफसरशाही की यह सोच भी है। जो लोग मैले-कुचैले कपड़ों में आई जनता को देखना तक बर्दाश्त नहीं कर सकते, वे उससे बातें कैसे करते होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीण विकास की अधिकतर योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बैंक अफसरों को ऐसी ही गरीब जनता से मिलना होता है। सोचा जा सकता है कि ऐसे बैंक अधिकारी ग्रामीण योजनाओं का क्रियान्वयन कितनी ईमानदारी से करते होंगे। क्या सरकार इस सोच का कोई इलाज करेगी? (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

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