बिंदास’ शब्द की हकीकत सामाजिक मूल्यों से आकर जब टकराती है, तब हम गहरे आहत होते हैं। क्षणभर में हमारी नैतिकता, हमारी संस्कृति खतरे में पड़ जाती है। गाहे-बगाहे खुद को बेहद खुला समाज कहने वाले हम किस पल हिंसक हो जाते हैं, हमें पता ही नहीं चल पता। फिर यही बिंदास शब्द हमें मुंह चिढ़ाता हुआ-सा जान पड़ता है। बेशक हम आज 21वीं सदी में हैं। सदियों के बदलाव के हिसाब से हममें व हमारे समाज में परिवर्तन भी काफी आये हैं। काफी कु छ परिवर्तन नयी-नयी तकनीकों पर निर्भर रहने लगा है। सामाजिक बदलाव का असर यह हुआ है कि कु नबों में रहने की परम्परा खत्म हो चुकी है। एकल परिवार की धारणा हमारे इर्द-गिर्द बहुत तेजी से विकसित होती जा रही है। बर्दाश्त करने का जज्बा हमारे भीतर से जाता रहा है। दबंगई पर हम यकीन करने लगे हैं। लेकिन बावजूद इन सब धारणाओं-अवधारणाओं के हमारे समाज का ताना-बाना अब भी उतना नहीं बदल सका है, जितना कि बदलने का हम अक्सर ‘दिखावा’ करते रहते हैं। यह दिखावा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हम भी पश्चिमी समाजों की तरह खुद को, खुले रूप से, बदलने की होड़ में लगे हैं। दिलचस्प बात है कि यह होड़ सामाजिक सोच के दायरों को ‘कुं ठित स्थापनाओं’ से बाहर निकालने से कहीं ज्यादा ‘मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसे’ तक ही सिमटकर रह गयी है। जब हम पश्चिमी समाजों के साथ खुद को बदलने की होड़ कर रहे होते हैं, तब यह भूल जाते हैं कि उनका समाज हमारे समाज से हर मामले में काफी जुदा है। वे बेहद स्वतंत्र है, बेहद जवान है, बेहद उन्मुक्त हैं। वहां के समाज पर लड़कियों के तन पर कपड़े होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, परंतु हमारे यहां बहुत पड़ता है। वहां राह चलती लड़कियों पर न सीटियां बजायी जाती हैं, न फब्तियां कसी जाती हैं, परंतु हमारे यहां यह सब होता है। वे सोच के खुलेपन को स्वीकार करने में हमसे कहीं ज्यादा आगे रहते हैं। मगर हमारे यहां सोच के दायरे अभी भी सीमित हैं। असल में हम जिस बदलाव की बात करते हैं, वे ‘उधार’ और ‘जुगाड़’ का बदलाव है। चंद विकसित परिवारों और शहरों के रहन-सहन को देखकर ही हम यह स्वीकार कर बैठे हैं कि हमारा समाज पूरी तरह से बदल चुका है। अब हम विकसित हैं लेकिन ऐसा है नहीं। अगर वाकई ऐसा होता, तो इस वक्त हम बिग बॉस और राखी का इंसाफ के बिंदासपन पर उंगलियां न उठा रहे होते! नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की दुहाई दे-देकर लम्बी-चौड़ी बहसें न कर रह होते। घर- परिवार के बच्चों के बिगड़ने का खतरा हमें नहीं सता रहा होता। न ही इन प्रोग्रामों पर ‘समय का पहरा’ बैठा रहे होते। यह मानकर चलें कि हम बेहद ‘संवेदनशील समाज’
हैं। समाज की संवेदनशीलता से अलहदा अगर हमारे समाने कु छ भी बिंदास आता है, तो हम पलभर में बिफर उठते हैं। कैसी विडम्बना है कि हमारी सामाजिक संवेदनाएं कभी ‘वाटर’ तो कभी ‘फायर’ फिल्म के प्रदर्शन मात्र से ही आहत हो जाती हैं। भीतर का सच जब निकलकर बाहर आ खड़ा होता है, तब हमारा विवेक, हमारा कथित खुलापन पलभर में ध्वस्त हो जाता है। उस वक्त हमारी मनोवैज्ञानिक स्थिति यह रहती है कि हम अपनी आंखों पर तो उस दृश्य को न देखने का पहरा लगा देते हैं, परंतु हमारा मन उस दबी-ढकी चीज का सच जानने का ही प्रयास करता रहता है। लेकिन हम इस सच को सामने लाने से कतराते हैं, सिर्फ इस वजह से कि लोग क्या कहेंगे? समाज क्या सोचेगा? दरअसल, इसी ‘अविकसित सोच’ के फोबिये ने ही हमारा और हमारे समाज का बेड़ा गर्क किया हुआ है। जिन बातों को हम दिन-रात अपने साथ, अपने आसपास, अपने परिवार के मध्य जीते हैं, जब वही सब परदे पर जीवंत होता है, तब हम उसे देखकर बौखला-से जाते हैं। मुंह से निकल ही जाता है कि हाय! देखो परदे पर यह सब क्या चल रहा है? उस वक्त हम खुद को कोई दोष नहीं देते, दोष देते हैं केवल परदे के पात्रों को। उस समय परदे के ये पात्र हमें हमारा ही आईना दिखा रहे होते हैं कि हम और हमारी बातें हकीकत में क्या हैं? साथ ही, यह न भूलें कि परदे के ये पात्र हमारे ही बीच के सदस्य होते हैं। उन्होंने यह सब हम से ही सीखा व जाना है। फिर बताएं दोषी वे हुए याकि हम? कहते हैं कि सच कड़ुवा होता है। आज हमारी स्थिति ठीक उसी कड़ुवे सच की तरह है, जिसे हम गले के नीचे उतार नहीं पा रहे हैं। उस पर अपनी कथित नैतिकताओं, परंपराओं व आदर्शो की ‘चाश्नी का लेप’ लगाकर मीठा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इस बौराये समय में ये प्रयास व्यर्थ ही हैं। समाज निरंतर उन्मुक्त होता चला जा रहा है। किसी को कु छ भी न समझने का धैर्य समाप्त होता जा रहा है। युवाओं के इरादे अब भगत सिंह की क्रांति को नहीं, सलमान खान की दबंगई को आत्मसात करने को फौरन तैयार रहते हैं। समाज में क्रांति की सम्भावनाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं। यह निरंतर बदलता और बिंदास होता समाज आगे और कौन-कौन से अकूत कारनामों से हमें रू-ब-रू करवाएगा, अभी देखा शेष है।
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